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आखिर क्यों कभी नहीं पकड़ा जाएगा भेड़ की खाल में छिपा क्रिकेट का यह भेड़िया!

जस्टिस लोढ़ा ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों की कमेटी से कहा है कि उसे बुकी से संपर्क रखने वाले एक स्टार क्रिकेटर के बारे में जांच करनी चाहिए

Updated On: Aug 24, 2018 05:48 PM IST

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu

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आखिर क्यों कभी नहीं पकड़ा जाएगा भेड़ की खाल में छिपा क्रिकेट का यह भेड़िया!
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पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया राजेंदर मल लोढ़ा ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों की कमेटी से कहा है कि उसे बुकी से संपर्क रखने वाले एक स्टार क्रिकेटर के बारे में जांच करनी चाहिए.

सबसे पहले बताना जरूरी है कि जिस क्रिकेटर के बारे में बात हो रही है, उसके बारे में स्पोर्ट्स इलेस्ट्रेटड पत्रिका ने बिना नाम लिए एक लेख 2011 में छापा था. पत्रिका का दावा था कि उसने 2011 विश्व कप में भारतीय टीम का हिस्सा रहे उस खिलाड़ी के बारे में साक्ष्य इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) और बीसीसीआई को भी मुहैया करवाए थे.

जांचकर्ता को नहीं मिली थी टेप में आपत्तिजनक बात

अब 2013 की आईपीएल की स्पॉट फिक्सिंग की जांच करने वाले जासूस बीबी मिश्रा ने कहा है कि उस क्रिकेटर के बारे में उन्होंने जांच की थी और पहली नजर में वह बुकी के साथ फोन पर बातचीत करने का दोषी नजर आता है. जानना जरूरी है कि बुकी और उस उक्त क्रिकेटर की बीच बातचीत का टेप पत्रिका ने ही सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त जांचकर्ता बीबी मिश्रा को उपलब्ध करवाया था.

यह भी समझ लेना जरुरी है कि बातचीत उस बुकी ने 2007-2008 में एक अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान टेप की थी ताकि किसी तरह की वित्तीय गड़बड़ होने पर भरपाई की जा सके.

सब जानती है बीसीसीआई और आईसीसी

साफ है कि बीसीसीआई और आईसीसी की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई के अधिकारियों को 2011 से पता है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यहां है कि क्या किसी ने जांच करने की जरूरत समझी.

ताजा मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा है जिस क्रिकेटर पर आरोप लगाए गए हैं वह दो साल पहले तक भारतीय टीम का हिस्सा भी रहा. जाहिर है कि टेप मिलने के बाद मामले की जांच होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ उसके कई कारण हैं.

अदालती पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता कोई 

मसलन बीसीसीआई और आईसीसी ऐसे मामलों में किसी भी अदालती पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते. भारत में एक बार नहीं अनेक बार हुआ है जब साक्ष्य के रूप में बातचीत के टेप को अदालत में सुबूत मानने से इनकार कर दिया. सबसे ताजा उदहारण 2013 आईपीएल में हुई स्पॉट फिक्सिंग का है. उस मामले में दिल्ली की अदालत ने आरोपी क्रिकेटर एस श्रीसंत और उसके दोस्त वीजू जनार्दन के साथ बातचीत के टेप को सिरे से खारिज कर दिया था.

कोर्ट ने टेलीग्राफ एक्ट का हवाला देते हुए ऑडियो रिकॉर्डिंग यह कह कर भी खारिज कर दी कि पुलिस ने खिलाड़ियों और बुकियों की बातचीत रिकॉर्ड करने से पहले योग्य अधिकारी से अनुमति नहीं ली थी. जिन कुछ लोगों के लिए अनुमति थी भी, उसमें अनुमति से अधिक समय की रिकॉर्डिग की गई.

प्रतिबंधित करने के सिवा कोई सजा नहीं दे सकते

बीसीसीआई या आईसीसी ऐसे मामलों में कुछ करने की स्थिति में है ही नहीं सिवाय कि वह आरोपी क्रिकेटर को कुछ समय के लिए प्रतिबंधित कर दे. न ही वह किसी बुकी का नाम सार्वजनिक करने की स्थिति में है, क्योंकि कोर्ट में साबित करना आसान नहीं है कि फलां व्यक्ति बुकी है.

अगर आरोपित बुकी अपनी प्रतिष्ठा की तबाही की दुहाई देकर कोर्ट में मानहानि का मुकदमा करता है तो बीसीसीआई या आईसीसी के लिए संभालना मुश्किल हो जाएगा. ये सारे तर्क किसी और के नहीं, बल्कि बीसीसीआई और आईसीसी की लीगल टीम के हैं. लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कुछ करने की स्थिति में है क्योंकि उसकी कमेटी बीसीसीआई का काम संभाले हुए हैं. वह आदेश दे सकती है कि आरोपी क्रिकेटर की आवाज का सैंपल तुरंत लिया जाए और उसे फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा जाए.

क्या किसी जांच एजेंसी को दिया जा सकता था मामला!

जरूरी पड़े तो मामला किसी भी जांच एजेंसी को दिया जा सकता है. लेकिन क्या ऐसा होगा! जिस तरह से 2013 की मैच फिक्सिंग के मामले में कोर्ट ने बीबी मिश्रा की टीम की पूरी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है, उसे देखते हुए लगता नहीं कि कुछ होगा.

सुप्रीम कोर्ट के पास अपने जायज तर्क थे, क्योंकि वह जांच सिर्फ आईपीएल की दो टीमों और उसके अधिकारियों के सट्टेबाजी में लिप्त होने के बारे में पता लगाने तक ही सीमित थी. लेकिन कोर्ट चाहे तो इसे नया मामला मान कर नई जांच का आदेश दे सकती है. हालांकि सवाल अब भी कायम है कि क्या बातचीत के टेप को साक्ष्य माना जाएगा?

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