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किस्सा-ए-फिक्सिंग : 'पुख्ता सबूतों' के बावजूद कैसे बरी हुए श्रीसंत

बेहद कमजोर है फिक्सिंग का कानून, दोषी पाए जाते तो भी मामूली सजा मिलती

Updated On: Aug 16, 2017 07:35 PM IST

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu

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किस्सा-ए-फिक्सिंग : 'पुख्ता सबूतों' के बावजूद कैसे बरी हुए श्रीसंत

एस. श्रीसंत हाईकोर्ट के आदेश के बाद से खबरों में हैं. वह दोबारा क्रिकेट खेलना चाहते हैं. उन पर लगे 2013 में स्पॉट फिक्सिंग के आरोपों को दिल्ली और केरल की अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया है.

असल में दिल्ली पुलिस का दावा था कि उसके पास आईपीएल की टीम राजस्थान रॉयल्स के श्रीसंत, अंकित चव्हाण और अजीत चंदीला के खिलाफ पुख्ता सूबुत हैं. इसके बावजूद श्रीसंत का छूट जाना एक बेहद ही रोचक कहानी हैं जो देश की न्याय व्यवस्था को लेकर काफी सवाल उठाती है.

श्रीसंत के मामले में दिल्ली पुलिस ने उसके साथी जीजू जनार्दन, अजीत चंदीला और बुकियों के बीच हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग अदालत में पेश की थी. रिकॉर्डिंग में जनार्दन कथित तौर पर कह रहा है कि श्रीसंत मैच में यह करने जा रहा है और वे लोग उसी के हिसाब से मैच बना सकते हैं.

दिल्ली की अदालत ने इन सुबूतों के बावजूद श्रीसंत व उनके साथियों को बरी कर दिया था और इस तेज गेंदबाज ने केरल की अदालत में भी इस फैसले का सहारा लिया है. पहली नजर में तीनों के खिलाफ पुख्ता सूबुत थे जिसे दिल्ली की जज ने खारिज नहीं किया.

फैसला तकनीकी तौर पर पुलिस के खिलाफ गया. जानते हैं क्यों ?

फैसले में कहा गया कि पुलिस की ओर से पेश श्रीसंत और जनार्दन की कॉल डिटेल्स में काफी विसंगतियां हैं. साथ ही इन दोनों के फोन टेप करना टेलीग्राफ एक्ट के सेक्शन 5 का उल्लंघन है. इसलिए कोर्ट ने फोन पर हुई बातचीत को सुबूत मानने से इनकार कर दिया. अपने फैसले में कोर्ट ने यूपी बनाम शिंगारा सिंग व अन्य के बीच एआईआर 1964 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया.

तकनीकी पहलू यह है कि पुलिस ने खिलाड़ियों और बुकियों की बातचीत रिकॉर्ड करने से पहले योग्य अधिकारी से अनुमति नहीं ली थी. जिन कुछ लोगों के लिए अनुमति थी भी, उसमें अनुमति से अधिक समय की रिकॉर्डिग की गई.

जाहिर है कि श्रीसंत और अन्य खिलाड़ी बेहद करीब से कानून के शिकंजे में आने से बचे हैं. वैसे श्रीसंत के मामले में दिल्ली पुलिस ने स्वीकार किया था कि उनकी बुकियों के साथ बातचीत का टेप नहीं है. लेकिन जनार्दन उनकी तरफ से मनन नामक कथित बुकी के संपर्क में था.

इसी तरह एक टेप में चंदीला दिल्ली के कथित बुकी भूपिंदर नागर और अमित सिंह के साथ टच में था. उसने 5 मई 2013 को राजस्थान रॉयल्स और पुणे वॉरियर के बीच मैच में अमित सिंह को अपने बॉलिंग स्पेल के दूसरे ओवर में 14 या उससे अधिक रन देने का वादा किया था. कथित तौर पर 14 रन देने से पहले चंदीला को इशारा करना था जो वह भूल गया. 14 रन ओवर में आने के बावजूद बुकी इशारा न मिलने के कारण पैसा नहीं लगा पाया.

दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के अनुसार एक टेप में जनार्दन और श्रीसंत आपस में बात कर रहे हैं. जिसका ब्योरा इस तरह हैं.

श्रीसंत : तीन चाहिए

जनार्दन : ओके. मैं देखता हूं. बाकी लगा देगा... पैसा क्यों खर्च करना है. अभी दस हैं. तीन लेता हूं. सात तेरे को दे दूंगा. तुझे कब चाहिए बताना.

दिल्ली की कोर्ट ने पुलिस से पूछा कि कहां पर ये दोनों दस लाख किसी से मिलने और सात लाख श्रीसंत को देने की बात कर रहे हैं. इस बातचीत में कहीं भी साबित नहीं होता की बात पैसे की हो रही है.

कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि श्रीसंत सिर्फ जनार्दन से तीन मोबाइल फोन खरीदने की बात कर रहे थे.

2013 की फिक्सिंग के इस फैसले के बाद साफ है कि कानून में कई खामियां हैं जिसके चलते खेल में फिक्सिंग जैसे अपराध पर फिलहाल लगाम नहीं लगाई जा सकती.

खेलों में फिक्सिंग करने वालों को जेल भेजने वाला बिल तैयार है. लेकिन पिछली और मौजूदा सरकार ने अभी इस पर कोई फैसला नहीं किया है.

आखिरी और जरूरी बात. अगर कोर्ट इन तीनों को दोषी मान भी लेती को 1964 के गैंबलिंग एक्ट में एक देसी शराब की बोतल की कीमत तक का जुर्माना ही होता.

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