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जब गांगुली-चैपल एपिसोड से कुछ नहीं सीखा गया, तो क्या मिताली-पोवार से सीखा जाएगा?

जब मिताली राज के पक्ष में सौरव गांगुली का बयान आया था तब यह अंदाजा नहीं था कि रमेश पोवार और मिताली के मेल वैसे ही लीक होंगे, जैसे एक समय ग्रेग चैपल का मेल लीक हुआ था.

Updated On: Nov 29, 2018 05:49 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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जब गांगुली-चैपल एपिसोड से कुछ नहीं सीखा गया, तो क्या मिताली-पोवार से सीखा जाएगा?

मेल लीक होना... कोच का सीनियर खिलाड़ी के साथ विवाद होना.. खिलाड़ी का कहना कि उसका करियर बर्बाद करने की कोशिश हो रही हो... कोच का कहना कि खिलाड़ी की वजह से माहौल खराब हो रहा था. कुछ सुना-सुना नहीं लग रहा? कुछ ऐसी ही बातें मिताली राज और रमेश पोवार के बीच विवादों से निकल कर आई हैं. कुछ इसी तरह की बातें पहले भी आई थीं. उस घटना को एक दशक से ज्यादा वक्त हो गया.

भारतीय क्रिकेट में कप्तान और कोच के बीच सबसे बड़ा विवाद कहा जाने वाला गांगुली-चैपल एपिसोड एक बार फिर याद आया है. चंद रोज पहले सौरव गांगुली ने कहा भी था कि मुझे भी करियर के पीक पर टीम से बाहर किया गया था. इसलिए मिताली को परेशान होने की जरूरत नहीं है. लेकिन जिस रोज बयान आया था, तब यह अंदाजा नहीं था कि रमेश पोवार और मिताली राज के मेल वैसे ही लीक होंगे, जैसे एक समय ग्रेग चैपल का मेल लीक हुआ था.

ग्रेग चैपल ने उस वक्त सौरव गांगुली को टीम के लिए बुरा प्रभाव जैसा बताया था. उन्होंने गांगुली को बाहर करने की हिमायत की थी. तब भी चैपल का मेल लीक हुआ था. पोवार का जो मेल लीक हुआ है, उसमें मिताली राज के लिए कुछ ऐसी ही बातें हैं. हालांकि पोवार न्यूज एजेंसी की खबर को गलत बता रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद अब इतनी बातें सामने आ गई हैं, जिससे विवाद थमेगा तो नहीं ही. ऐसे में होगा क्या? क्या पिछले एपिसोड की तरह शुरुआत में कोच का साथ देने के बाद उसकी विदाई तय होगी? या फिर इस बार शुरू में ही मिताली को बता दिया जाएगा कि अब आप जाइए. इस बीच हरमनप्रीत कौर का रोल उस दौर के राहुल द्रविड़ की तरह रह जाएगा.

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तबसे अब तक जो फर्क है, वो यही है कि उस वक्त बीसीसीआई हुआ करती थी. आज बीसीसीआई के नाम पर दंतहीन जैसी संस्था है. पूरी तरह सीओए का राज चलता है. सीओए का पूरा कार्यकाल विवादित फैसलों से भरा रहा है.

अब बारी सवालों की? पहला सवाल यही है कि जब ग्रेग चैपल और सौरव गांगुली का विवाद पहले तूल पकड़ चुका है, तो उससे सबक लेते हुए क्या किया गया? सिर्फ बीसीसीआई की तरफ से ही नहीं, जो कोच जुड़े हैं, उनकी और खिलाड़ी की तरफ से भी. सबसे पहले यह बात समझ लेनी चाहिए कि सीनियर टीम में कोच का रोल मैनेजर का होता है. खासतौर पर क्रिकेट जैसे खेल में, जहां उस स्तर पर आप बहुत ज्यादा कोचिंग नहीं दे सकते.

बाकी खेलों में भी ऐसा होता है. हालांकि उन खेलों में कप्तान के मुकाबले कोच हमेशा बड़ा होता है. लेकिन उसे समझ आना चाहिए कि बड़े खिलाड़ी के साथ कैसे डील करना है. जैसे हाल ही में अर्जेंटीना की फुटबॉल टीम अपने कोच से नाखुश थी. खासतौर पर लियोनेल मेसी, जिन्हें कोच से तमाम शिकायतें थीं.

भारतीय खेलों में भी ऐसा रहा है. याद होगा 1990 के करीब जब बिशन सिंह बेदी ने पूरी टीम को समुद्र में फेंक देने का बयान दिया था. टीम की नाराजगी जाहिर हुई थी. डेविस कप टीम में कोच या नॉन प्लेइंग कैप्टन के रोल को लेकर विवाद होते रहे हैं. हॉकी में तो कोच को लेकर विवाद बड़ा आम रहा है. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में धनराज पिल्लै रहे हैं, जिनका कोच या उस दौर के हॉकी फेडरेशन, आईएचएफ से विवाद रहा. इन सबमें एक बात देखने में आई है कि लोगों ने कोच की जगह खिलाड़ी का साथ दिया है. धनराज पिल्लै के लिए लोगों ने सड़क पर मोर्चा निकाला था. सौरव गांगुली के लिए सिर्फ कोलकाता में ही बवाल नहीं हुआ. बहुत से शहरों में खेल प्रेमी खासे नाराज दिखे.

इस व्यवहार की अपनी एक वजह है. खिलाड़ी मैदान पर होता है. वो मेहनत करता दिखता है. हम उसके साथ खुद को जोड़ते हैं. वो कभी जिताता है, कभी हंसता है, कभी खुशी मनाता है, कभी रोता है. उसके हर इमोशन के साथ खेल प्रेमियों की भावनाएं जुड़ती हैं. कोच के साथ ऐसा नहीं होता. यह सही है कि हार पर नाराजगी भी खिलाड़ी को लेकर ही ज्यादा होती है. लेकिन जब बात कोच बनाम खिलाड़ी की हो, तो खिलाड़ी की तरफ ही ज्यादा लोग नजर आते हैं.

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सवाल यह भी है कि आखिर कोच क्या करे? जरा सोचिए कि अगर महिला वर्ल्ड कप का वो मैच भारत जीत जाता, तब भी क्या मिताली राज की नाराजगी का मतलब रहता? उससे एक मैच पहले भी तो मिताली नहीं खेली थीं. किसने आवाज उठाई थी? अगर 2007 के वर्ल्ड कप में पुरुष टीम कमाल कर जाती, तो क्या ग्रेग चैपल के खिलाफ वैसे ही आवाज उठती, जैसी उठी? तब तो शायद कई ऐसे खिलाड़ियों पर गाज गिरती, जो कोच को नापसंद थे.

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समस्या यही है कि अगर एक टीम कोच को दी गई है, तो उसे सभी खिलाड़ियों को इस्तेमाल करना आना चाहिए. 1998 के एशियन गेम्स में हॉकी का गोल्ड जीतने वाली टीम के कोच एमके कौशिक कहते रहे हैं कि उस टीम को हैंडल करने से ज्यादा मुश्किल नहीं हो सकता. बशर्ते आप बाहर से देखें. वो मानते रहे हैं कि उस टीम में खिलाड़ी सवाल पूछते थे. कोच के फैसलों पर सवाल उठाते थे. आमतौर पर कोच इसे पसंद नहीं करते. उन्होंने बताया था कि भले ही बाहर से लगे कि धनराज पिल्लै को हैंडल करना मुश्किल है. लेकिन उस टीम में दरअसल, आशीष बलाल को संभालना सबसे मुश्किल था. क्योंकि वो हर बात तर्क के साथ रखते थे और जब तक उसका जवाब न मिल जाए, तब तक अड़े रहते थे.

दरअसल, यही सीनियर खिलाड़ी के साथ होता है. ग्रेग चैपल भी ज्यादातर उन खिलाड़ियों को बाहर करना चाहते थे, जो सवाल उठाते थे. उन्हें राहुल द्रविड़ से कोई दिक्कत नहीं थी. अब रमेश पोवार ने भी कुछ ऐसी ही बात कही है. नहीं पता कि पोवार और मिताली में से किसका सच कितना सच है? लेकिन यह सही है कि सीनियर्स को हैंडल करने का एक तरीका होता है. शायद रमेश पोवार उसमें चूक गए हैं. चैपल और गांगुली प्रकरण से यह सीखा जाना चाहिए था कि किसी सीनियर या स्टार खिलाड़ी को हैंडल कैसे किया जाए. यह बात एक दशक बाद भी समझ नहीं आई है.

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