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72 की भारत-इंग्लैंड टेस्ट सीरीज और टॉम ऑल्टर की सुनहरी यादें

सुबह 9 बजे – 20 दिसंबर 1972 की सुबह – भारत और इंग्लैंड की टेस्ट सीरीज के पहले मैच की सुबह

Updated On: Nov 29, 2016 09:14 AM IST

FP Staff

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72 की भारत-इंग्लैंड टेस्ट सीरीज और टॉम ऑल्टर की सुनहरी यादें

-टॉम अॉल्टर

20 दिसंबर 1972

दिल्ली की सुंदर सर्दी- नर्म धूप गुलज़ार साहिब की - और मैं तन्हाई की भीड़ में, उस पेट्रोल पंप के सामने, जो कोटला के सामने उतना ही तन्हा था.

सुबह 9 बजे – 20 दिसंबर 1972 की सुबह – भारत और इंग्लैंड की टेस्ट सीरीज के पहले मैच की सुबह – और मैं बृज भइया के इंतजार में – वो बृज भइया, जो मसूरी के 'बेस्ट कैप्टन' माने जाते थे, जो इलाहाबाद के हीरो हुआ करते थे, जो मेरे यार थे और आज भी हैं.

वो बृज भइया जिनके पास उस पहले टेस्ट मैच के टिकट थे, जो मेरठ से दिल्ली आ रहे थे, जिनके साथ पोस्टकार्ड के जरिए ये तय किया गया था कि हम 20 दिसंबर की सुबह उसी पेट्रोल पंप के सामने मिलेंगे.

मैं पूना से आया था, ट्रेन में, बगैर टिकट – मैं पकड़ा भी गया, बगैर टिकट – मुझे छोड़ भी दिया गया, इस बात पर कि मैं दिल्ली मैच देखने जा रहा हूं, और मैच के टिकट के लिए पैसे थे, ट्रेन की टिकट के लिए नहीं. फिर बृज भइया का वहां पहुंच जाना.

जसु भैया के साथ- दोस्ती की गालियां, गले मिलना, हंसी मज़ाक- फिर लंबी-लंबी लाइन में खड़े हो जाना, हजारों दूसरे बृज भइया जैसे भाइयों के साथ — फिर क्रिकेट की बातें – टोनी ग्रेग का ऊंचा कद, कीथ फ्लेचर का अनोखा अंदाज, एलन नॉट की बेहतरीन विकेटकीपिंग – लेकिन, क्या अपने फार्रुख की कीपिंग कुछ कम है?

और क्या अंडरवुड और बेदी की बॉलिंग में सिर्फ फर्क ही फर्क है, दोनों लेफ्ट आर्म स्पिनर्स होने के बावजूद? -- और क्या इंग्लैंड तो बदला लेने के पूरे मूड में ही था, पिछली सीरीज इंग्लैंड में हारने के बाद?

और क्या चंद्रा का जादू फिर से चलने वाला है? – और क्या वेंकट या प्रसन्ना को खिलाना चाहिए, या फिर दोनों को? और ये नए खिलाड़ी इंग्लैंड के – ग्रेग, एमिस, आर्नोल्ड, वुड – नए कैप्टन , टोनी लुईस – क्या ये भारत के पिचों पर अपना कमाल दिखा पाएंगे?

गावस्कर की पहली होम सीरीज

और सबसे बड़ा सवाल – क्या गावस्कर – जी हां, सुनील गावस्कर – अपनी पहली होम सीरीज़ में वो ही फॉर्म मेंटेन कर पाएंगे जो उन्होंने वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड में दिखाया?

ये सब सोचते-सोचते, बोलते-बोलते – हम कोटला के ईस्ट स्टैंड में दाखिल हुए— मैं वो पल जिंदगी भर कभी भूल नहीं पाउंगा – वो पल, जब मैं पहली बार एक टेस्ट ग्राउंड में दाखिल हुआ – लोगों का वो हुजूम, वो स्कोरबोर्ड, जिसपर हमारे तमाम हीरोज के नाम बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे हुए थे

वो मैदान, वो घास, वो सफेद बाउंड्री लाइन वो तीन-तीन स्टंप्स की पहरेदारी – और फिर अपनी सीट्स ढूंढना, अपने लिए उस हुजूम में जगह निकालना- वो सीट्स, वो जगह, जो अब पांच दिन तक हमारा घर, हमारा मंजिलें थीं.

और फिर बृज भइया का अपने थैले से पराठे और ऑमलेट निकालना — वो पराठे, वो ऑमलेट जो वॉयला भाभी ने इतने प्यार से बनाये – और फिर जैसे भइया के कंधे से चाय के थर्मस का उतरना – और जन्नत की सैर शुरू

आज मैंने उस मैच का स्कोरबोर्ड गूगल से निकाला – जी, हम हारे थे – जी, गावस्कर की बैटिंग नहीं चली – लेकिन, हां – चंद्रा की बॉलिंग चली थी, बेदी की भी, सोलकर ने भी कमाल के कैच लिए, और बहुत अच्छी बैटिंग की सेकेंड इनिंग में – फार्रुख ने खूब साथ दिया, गजब की स्टंपिंग भी की – और, हां, टोनी ग्रेग ने एक नया अंदाज दिखाया बैटिंग में – वो अपने स्टांस में बैट को हवा में रखते थे – ये हमने भी पहली बार देखा – जो आज आम है

मैच इंग्लैंड जीत गई, लेकिन सीरीज हम ले गए – ये तीसरी लगातार सीरीज थी जो हम अजीत वाडेकर की कप्तानी में जीते थे – तीसरी सीरीज लगातार – कमाल – कमाल

कोटला की यादें 

कोटला की दो यादें आज भी आंखों के सामने और दिल के अंदर जिंदा हैं

एक, चंद्रा का फ्लेचर को क्लीन बोल्ड करना – स्टंप क्या उड़ा, चंद्रा क्या उछला और फ्लेचर साहिब एक पल के लिए क्या बेचैन हुए --

दूसरी – विशी का स्क्वेयर कट – बॉथम की बोलिंग पर – बैरी वुड प्वाइंट पर – पहला स्क्वेयर कट – बुलेट – लेकिन सीधा वुड की तरफ — दूसरा स्क्वेयर कट – फिर बुलेट – लेकिन वुड डाइव मारकर उस बुलेट को रोक लेते – तीसरा स्क्वेयर कट - एक और बुलेट – फिर वुड का डाइव – पर नाकाम – ये बुलेट बाउंड्री के पार जा के रुका

वक्त उस पल थम गया – और आज तक थमा हुआ है.

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