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यो-यो टेस्ट के हिमायतियों से कई सवाल करते हैं क्रिकेटरों के गोल-मटोल पेट

यो-यो टेस्ट के आने से सवाल उठना शुरू हो गया है कि क्या यह क्रिकेट के लिए जरुरी स्किल से ज्यादा अहम है?

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu Updated On: Jun 19, 2018 01:17 PM IST

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यो-यो टेस्ट के हिमायतियों से कई सवाल करते हैं क्रिकेटरों के गोल-मटोल पेट

डेनमार्क के फुटबॉल फिजियो जेंस बांग्स्बो के दिमाग की उपज यो-यो टेस्ट को लेकर कई तर्कों वाली बहस चल रही है. भारतीय क्रिकेट में अपने पैर रख रहे युवा बल्लेबाज संजू सैमसन भी यह टेस्ट पास करने में नाकाम रहे हैं. अब सवाल यह है कि फुटबॉल और रग्बी जैसे जिस्म की परीक्षा लेने वाले खेलों के लिए बना यह टेस्ट क्रिकेटरों के लिए कितना कारगर व जरूरी है!

कई बड़े क्रिकेटरों को लेकर बने थे मजाक

अगर आप क्रिकेट देखते हैं और उसे जेहन में रखते हैं तो आपको बरमुडा के ड्वायन लेवरॉक जरूर याद होंगे. चेहरा नहीं तो 2011 के विश्व कप में उनके 128 किलो के हैवीवेट शरीर का हवा में तैर कर स्लिप में हैरान कर देने वाला एक हाथ से पकड़ा रॉबिन उथप्पा का असंभव कैच यकीनन याद होगा.

यू-टयूब पर जाकर जरूर देखिए. लेवरॉक को देखने के बाद अपने इलाके में किसी मेहनती गुप्ता या बंसल अंकल की छवि याद आएगी, जिनका पेट उनके कारोबार की तरह पर दिन फलता-फूलता है.

फिर इंजमाम उल हक के शुरुआती दिन का खेल भी देख सकते हैं, जिस पर उनके भारी शरीर पर कभी असर नहीं पड़ा. हां, अर्जुन रणतुंगा भी तो हैं. उनके पेट के बारे में कई मजाक थे, अब भी हैं. लेकिन रिकॉर्ड बुक में श्रीलंका क्रिकेट के इस महानायक का कोई सानी नहीं है. सिंगल के लिए विकेट की बीच उनकी रनिंग कमाल की थी.

ड्वायन लेवरॉक

ड्वायन लेवरॉक

लेवरॉक, इंजमाम और रणतुंगा जैसे कई क्रिकेटर भारतीय क्रिकेट को चलाने वाले धुरंधरों के लिए केस स्टडी हो सकते हैं. क्रिकेट में फिटनेस के मायने हैं, लेकिन इसमें  बेहतर प्रदर्शन के लिए शारीरिक फिटनेस पर निर्भर फुटबॉल या हॉकी जैसे खेलों के स्तर की फिटनेस न भी हो तो खेल ज्यादा प्रभावित नहीं होता. क्रिकेट बैटिंग, फील्डिंग, कैचिंग, टाइमिंग, रिफ्लेक्सिज, बैट स्पीड, हाथों व कंधों की पावर, हाथ और आंख के बीच तालमेल का खेल है. गेंद का सामना करते समय खिलाड़ी का फुटवर्क, शरीर व सिर की पॉजिशन में सही बैलेंस लंबी पारियां खेलने और रन बनाने में मदद करते हैं.

यह भी साबित हो चुका है कि तकनीकी तौर पर सही एक्शन से साथ भी तेज गेंदबाज अपनी गेंद में स्पीड पैदा कर सकता है. इसके लिए उसे यूसेन बोल्ट होना जरूरी नहीं है. जहीर खान और मुनाफ पटेल जैसे पेसर महज उदहारण हैं.

नया विवाद ना बन जाए यो-यो टेस्ट

यकीनन आज अगर जहीर या मुनाफ को यो-यो टेस्ट से गुजरना पड़ता तो उनकी रिपोर्ट कार्ड भी लाल रंग के गोलों से रंगी होती. भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए सबसे जरूरी है किसी बल्लेबाज का लगातार रन बनाना और गेंदबाज का विकेट हासिल करना.

लंबी पारियों और थका देने वाले मैराथन स्पैल के बिना यह संभव नहीं है. इस मानदंड पर खरा उतरने के बाद ही उसका चयन टीम में होता है. लेकिन यो-यो टेस्ट के आने से सवाल उठना शुरू हो गया है कि क्या यह क्रिकेट के लिए जरुरी स्किल से ज्यादा अहम है! यह आधिकारिक तो नहीं है लेकिन कहा जा रहा है कि टीम के चीफ कोच रवि शास्त्री यो-यो को और कड़ा करने के पक्षधर रहे हैं.

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18 साल के क्रिकेटर के फेल होने की खबर को बीसीसीआई आधिकारिक कर रही है जो उसके लिए हौसला तोड़ देने वाला है.

दूसरी तरफ भारतीय कप्तान विराट कोहली जैसे टॉप खिलाड़ियों का टेस्ट बेहद गुपचुप ढंग से लिया जा रहा है. उसके परिणामों को सार्वजनिक करने की बजाय फैलाया जा रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि यह पूरा टेस्ट भविष्य में भारतीय क्रिकेट में एक और बड़े विवाद को जन्म न दे !

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