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संडे स्पेशल : अनजाने में एक बड़े विवाद में फंस गए थे महान खिलाड़ी सर गारफील्ड सोबर्स

एक डबल विकेट टूर्नामेंट के लिए सोबर्स की जिंबाब्वे यात्रा से वेस्टइंडीज में बड़ा तूफान खड़ा हो गया

Updated On: Feb 18, 2018 10:16 AM IST

Rajendra Dhodapkar

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संडे स्पेशल : अनजाने में एक बड़े विवाद में फंस गए थे महान खिलाड़ी सर गारफील्ड सोबर्स

खिलाड़ी आमतौर पर राजनीति से दूर रहते हैं या रहने में भलाई समझते हैं. एक वजह तो यह है कि वे राजनीति नहीं समझतेदूसरे राजनीति में पड़ने से किसी के खुश तो किसी के नाराज होने का खतरा होता है. ऐसे में खिलाड़ी कुछ सरकारी कार्यक्रमों और कुछ देशभक्ति से जुड़े आयोजनों से जुड़ने के अलावा राजनीति से दूर ही रहते हैं. लेकिन आखिरकार वे किसी देश के नागरिक होते हैं और चाहे अनचाहे उनकी क्षेत्रीयनस्लीधार्मिक पहचान भी होती ही है. फिर वे अपने समाज के मशहूर व्यक्ति भी होते हैं इसलिए अक्सर वे चाहे अनचाहे राजनीति में उलझ जाते हैं. कुछ ऐसे उद्देश्य भी होते हैं जिनके लिए कभी-कभी राजनैतिक मुद्दों पर कोई स्टैंड लेना या सक्रिय होना भी जरूरी होता है. जैसे रंगभेद के मुद्दे पर कई खिलाड़ियों ने किया और कुछ ने बहादुरी के साथ इसकी कीमत भी चुकाई. कुछ खिलाड़ी अपने अज्ञान या भोलेपन में गलत पक्ष की तरफ जाकर भी पछताए.

पिछली बार हमने साउथ अफ्रीका के रंगभेदी शासन के खिलाफ संघर्ष के एक महत्वपूर्ण अध्याय की कहानी कही थी जिसकी रंगभूमि क्रिकेट की पिच थी. अब उससे जुड़ी एक और कहानी जिसके मुख्य पात्र महान खिलाड़ी सर गारफील्ड सोबर्स थे जो अनजाने में एक बड़े विवाद में फंस गए थे. जैसा कि पिछली बार जिक्र किया गया था, इंग्लैंड के सन 1969 के साउथ अफ्रीका दौरे के बाद साउथ अफ्रीका का सन 1970 का इंग्लैंड दौरा भी रद हो गया था.

इंग्लैंज के कप्तान इलिंगवर्थ और रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड के कप्तान सर गैरी सोबर्स

इंग्लैंज के कप्तान इलिंगवर्थ और रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड के कप्तान सर गैरी सोबर्स

इस दौरे की जगह लेने के लिए एक रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड की टीम बनाई गई जिसने इंग्लैंड का दौरा किया. इस टीम के ज्यादातर खिलाड़ी इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेलने वाले लोग थे. गैरी सोबर्स इसके कप्तान थे और इसमें साउथ अफ्रीका के पांच दिग्गज खिलाड़ी भी थे. इस सीरीज के दौरान साउथ अफ्रीकी खिलाड़ी एडी बार्लो से सोबर्स ने रोडेशिया (जो अब जिंबाब्वे कहलाता है) में एक डबल विकेट टूर्नामेंट में खेलने का प्रस्ताव किया. बार्लो साउथ अफ्रीका के बड़े ऑलराउंडर थे और बाद में वह साउथ अफ्रीका क्रिकेट से रंगभेद मिटाने के लिए सक्रिय रहे. रोडेशिया में रंगभेदी सरकार थी, लेकिन बार्लो ने सोबर्स से कहा कि टूर्नामेंट में कोई रंगभेद नहीं होगा. सोबर्स ने हामी भर दी. सोबर्स के इस फैसले की इंग्लैंड के कुछ अखबारों में आलोचना भी हुई, लेकिन सोबर्स ने स्थिति की गंभीरता को नहीं समझा.

गोरे और काले नागरिकों ने सोबर्स का भव्य स्वागत किया

सोबर्स 12 सितंबर, 1970 को रोडेशिया की राजधानी सैल्सबरी पहुंचे, जिसे अब हरारे कहा जाता है. वहां तमाम गोरे और काले नागरिकों ने सोबर्स का भव्य स्वागत किया. सैल्सबरी क्रिकेट स्टेडियम में टूर्नामेंट देखने के लिए ज्यादातर गोरे दर्शक ही थे, उन्होंने भी सोबर्स का जोरदार अभिवादन किया. डबल विकेट टूर्नामेंट में सोबर्स के जोड़ीदार थे साउथ अफ्रीका के कप्तान अली बाकर. यह जोड़ी टूर्नामेंट में हार गई, सोबर्स भी बहुत अच्छा नहीं खेल पाए. लंबी हवाई यात्रा करके सुबह ही वहां पहुंचने से वह काफी थक गए थे. सोबर्स ने काफी वक्त रोडेशिया के प्रधानमंत्री इयान स्मिथ के साथ बिताया. स्मिथ खेलप्रेमी थे, खुद भी अच्छे खिलाड़ी रह चुके थे. सोबर्स ने बाद में कहा कि वह स्मिथ से बहुत प्रभावित हुए हैं और भविष्य में भी वह ऐसे कार्यक्रमों के लिए रोडेशिया आते रहना चाहेंगे. सोबर्स को इस टूर्नामेंट में खेलने के लिए 600 पाउंड मिले. वह अगले दिन इंग्लैंड लौट आए.

वेस्टइंडीज के तमाम द्वीपों में सोबर्स की आलोचना

सोबर्स को नहीं पता था कि उनकी इस यात्रा से वेस्टइंडीज में इतना बड़ा तूफान खड़ा हो जाएगा. एक अखबार ने सोबर्स पर आरोप लगाया कि सोबर्स ने अफ्रीकियों और अश्वेत लोगों के प्रति अपनी वफादारी छोड़ दी है. तमाम राजनैतिक पार्टियों ने सोबर्स की कड़ी आलोचना कीयहां तक कि सोबर्स के कई मित्रों ने उनके कदम को गलत बताया.

Frank Worrell, left, and Garfield Sobers coming out to bat during the Third England vs West Indies Test at Trent Bridge, Nottingham, July 1957. (Photo by Central Press/Hulton Archive/Getty Images)

जमैका लेबर पार्टी ने उन्हें वेस्टइंडीज की कप्तानी से हटाने की मांग की. सोबर्स ने कहा कि मैंने सोचा कि मेरे रोडेशिया जाने से क्रिकेट का हित होगा. उन्हें कप्तानी से हटाने की मांग के बारे उन्होंने कहा कि मैं पेशेवर खिलाड़ी हूं और मैं वहां क्रिकेट खेलने गया था. मैं नहीं सोचता कि मेरे इस फैसले से मेरी कप्तानी पर कोई असर होना चाहिए. सोबर्स को थोड़ा बहुत समर्थन अपने देश बारबाडोस में मिलाबाकी तमाम द्वीपों में उनकी आलोचना हो रही थी.

माफी ना मांगने तक गुयाना में नहीं खेलने देने की धमकी

 संकट और गहरा गया जब गुयाना के राष्ट्रपति फोर्ब्स बर्नहम ने कहा कि जब तक सोबर्स माफी नहीं मांगते तब तक उन्हें गुयाना में नहीं खेलने दिया जा सकता. जॉर्जटाउन गुयाना तो एक बड़ा केंद्र था और अगले साल भारत की टीम के साथ एक टेस्ट मैच वहां खेला जाना था. अगर जॉर्जटाउन में मैच ना भी होता तो गुयाना सरकार रोहन कन्हाई और क्लाइव लॉयड जैसे गुयाना के खिलाड़ियों को सोबर्स की कप्तानी में ना खेलने का आदेश दे सकती थी. दूसरी ओर अगर सोबर्स को हटाया जाता तो बारबाडोस में बवाल हो जाता. इस विवाद से वेस्टइंडीज द्वीपसमूहों और क्रिकेट टीम की एकता खतरे में पड़ती दिख रही थी. दूसरी ओर सोबर्स की ओर से माफी मांगने का कोई संकेत नहीं दिख रहा था. तभी भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने घोषणा कर दी कि सोबर्स अगर वेस्टइंडीज से खेलेंगे तो 1971 का भारत की टीम का दौरा नहीं होगा.

सोबर्स ने मांगी माफी

जमैका के पूर्व प्रधानमंत्री और वेस्टइंडीज क्रिकेट का इतिहास लिखने वाले माइकल मैन्ली ने लिखा है कि सोबर्स राजनैतिक रूप से सजग नहीं थे. यह बात सही लगती है, क्योंकि ऐसा लगता है कि सोबर्स काफी वक्त तक स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं पाए. आखिरकार ट्रिनिडाड एंड टोबेगो के राष्ट्रपति ऐरिक विलियम्स ने पहल की और वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष नाइजेल पीयर्स के नाम एक माफी के पत्र का मसौदा बनाया जिसे सोबर्स तक पहुंचाने के लिए इंग्लैंड से उनके मित्र वेस्ली हॉल को बुलाया गया.

West Indian cricket legend Sir Garfield Sobers watches the first day of the second Test cricket match between Sri Lanka and the West Indies at the P. Sara Oval Cricket Stadium in Colombo on October 22, 2015. AFP PHOTO/ Ishara S. KODIKARA / AFP PHOTO / Ishara S.KODIKARA

माफीनामे में लिखा गया था कि मुझे अंदाजा नहीं था कि मेरे रोडेशिया जाने से इतना बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा. मैं यह सोच कर वहां गया था कि इस तरह मैं क्रिकेट और वेस्टइंडियन लोगों की गरिमा को बढ़ाऊंगा. मैं नहीं जानता था कि वेस्टइंडीज के लोगों में रोडेशिया के खिलाफ इतनी उग्र भावनाएं हैं. आइंदा मैं रोडेशिया कभी नहीं जाऊंगा.

संकट टलने पर सबने ली राहत की सांस

सोबर्स ने बारबाडोस के राष्ट्रपति से बात करके उस पत्र पर दस्तखत कर दिए और संकट टलने पर सारे वेस्टइंडीज ने राहत की सांस ली. कोई और खिलाड़ी होता तो शायद इतनी आसानी से उसे माफी नहीं मिलती, लेकिन सोबर्स तो वेस्टइंडीज के सबसे प्यारे खिलाड़ी और हीरो थे.  इसलिए सबने सोबर्स को बिना तुरंत माफ कर दिया. हम जानते हैं कि भारत का दौरा भी हुआ और जॉर्जटाउन टेस्ट में सोबर्स ने 108 रन बनाए.

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