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संडे स्पेशल: तकनीक से बाहर आकर देखिए, क्रिकेट ज्यादा रोमांचक लगता है

कोचिंग की किताबें ठीक हैं. लेकिन उन्हें अंतिम सत्य मान लेना खतरनाक हो सकता है

Rajendra Dhodapkar Updated On: Feb 26, 2017 12:44 PM IST

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संडे स्पेशल: तकनीक से बाहर आकर देखिए, क्रिकेट ज्यादा रोमांचक लगता है

सन 1969 में बिल लॉरी की ऑस्ट्रेलियाई टीम में लॉरी के ओपनिंग पार्टनर थे कीथ स्टैकपोल. स्टैकपोल से एक इंटरव्यू के दौरान उनकी तकनीक को लेकर जब सवाल किया गया. उन्होंने कहा कि मेरी तकनीक बहुत आसान है, गेंद अगर आगे हो तो ड्राइव करो, शॉर्ट हो तो कट या पुल करो.

क्या यह तकनीक अपने वीरेंद्र सहवाग की याद नहीं दिलाती? सहवाग और स्टैकपोल में फर्क यह था कि स्टैकपोल हुक और पुल बहुत करते थे. सहवाग का हाथ लेग साइड में जरा तंग था. लेकिन ऑफ साइड में सहवाग उसकी भरपाई कर लेते थे. अपर कट से लेकर तो ऑफ ड्राइव तक सहवाग का अपना राज चलता था.

सहवाग तकनीकी रूप से बहुत मजबूत बल्लेबाज नहीं थे. उनके खेल का आधार उनकी स्वाभाविक प्रतिभा या जिसे "हैंड आई कोऑर्डिनेशन" कहते हैं, वह था. सामान्यतः ऐसे खिलाड़ी मुश्किल पिच पर अच्छा नहीं खेल पाते, क्योंकि वहां अच्छी तकनीक की जरूरत होती है. लेकिन सहवाग की विशेषता यह थी कि अक्सर वे जब धुआंधार शतक बना कर वापस लौटते थे और दूसरे बल्लेबाज़ खेलने थे तब पता चलता था कि  पिच तो बहुत ही टेढ़ी थी. उनके सामने हर पिच आसान और हर आक्रमण औसत नजर आता था.

तकनीक के बिना भी सहवाग और चंद्रपॉल सफल हुए

क्रिकेट में ही नहीं बल्कि सारे खेलों में या कि जीवन के सारे ही क्षेत्रों में स्वाभाविक प्रतिभा बनाम प्रशिक्षण का एक सवाल शाश्वत बना रहता है. आम तौर पर प्रशिक्षण से प्रतिभा निखरती है. लेकिन  गलत प्रशिक्षण से गड़बड़ भी हो सकती है. पता नहीं किसी ने सहवाग को तकनीकी रूप से सुधारने की कोशिश की या नहीं. या किसी ने शिवनारायण चंद्रपॉल का स्टांस ठीक करने की कोशिश की या नहीं. उनका स्टांस क्रिकेट की कोचिंग की किताबों के कतई अनुरूप नहीं है.

कोचिंग की किताबें अपनी जगह ठीक हैं. लेकिन उन्हें अंतिम सत्य मान लेना खतरनाक हो सकता है. ऐसा करने पर फैक्टरी से निकले माल की तरह एक जैसे साधारण खिलाड़ी बाहर आएंगे. इस मायने में अंग्रेज सबसे आगे होते हैं. एक व्यवस्थित तंत्र बनाने और उसका पालन करने में उनका जवाब नहीं है. भारत की नौकरशाही भी उनकी ही बनाई हुई है.

सन उन्नीस सौ अस्सी के बाद अंग्रेजों के क्रिकेट का तेजी से पतन हुआ. पहले वेस्टइंडीज ने उन्हें बुरी तरह रौंदा. फिर ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें लगातार पीटा. एक दौर ऐसा आया जब उनके घरेलू क्रिकेट में भी संभावनाशील खिलाड़ी दिखना बंद हो गए. काउंटी क्रिकेट में जो अच्छा खेल रहे थे वे ज़्यादातर विदेशी खिलाड़ी थे.

इसकी जो वजहें जानकारों ने बताईं, उनमें से मुख्य यह थी कि इंग्लैंड का प्रशिक्षण तंत्र इतना हावी हो गया था कि वह व्यक्तिगत प्रतिभा और विशिष्टता पर हावी हो गया. इसलिए इंग्लैंड में  निजी व्यक्तित्व और शैली के खिलाड़ियों का आना बंद हो गया. जो ऐसे खिलाड़ी आते भी थे, वे सिस्टम में न ढल पाने की वजह से झगड़ों में फंस जाते थे. इयान बॉथम, डेविड गॉवर जैसे कई खिलाड़ी इसके उदाहरण हैं .

क्रिकेट लेखकों की यह भी शिकायत थी कि दिलचस्प "कैरेक्टर्स" के न होने से क्रिकेट में लोगों की दिलचस्पी कम होती जा रही है. फिर इंग्लिश काउंटी क्रिकेट का चरित्र ऐसा था कि क्रिकेटर रोज की नौकरी की तरह खेलते थे. इससे उनके खेल में रोमांच और नएपन का तत्व गायब हो गया.

खेलों में प्रशिक्षण और एक व्यवस्थित तंत्र की कमी से होने वाले नुकसान की कहानियां हम सुनते रहते हैं. लेकिन इंग्लैंड के क्रिकेट में यह भी देखने को मिला कि ज्यादा व्यवस्था भी नुकसानदेह हो सकती है क्योंकि वह निजी प्रतिभा और अद्वितीयता को दबा सकती है.

उस स्थिति से बाहर निकलने के लिए इंग्लिश क्रिकेट को काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ी. बल्कि वहां काम क्रिकेट सचमुच फिर जानदार तब हुआ जब कई सारे दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ी वहां से खेलने लगे और जिंबाब्वे के एंडी फ्लावर उनके कोच बने. कुछ बरस पहले एक स्थिति यह आई थी कि इंग्लैंड की टीम के लगभग आधे सदस्य दक्षिण अफ्रीका के थे.

जब जेफ्री बॉयकॉट ने ली गैरी सोबर्स से राय 

बहरहाल, तकनीक को लेकर एक दिलचस्प किस्सा, जो कुछ दिन पहले ही पढ़ा था. जब गैरी सोबर्स नॉटिंघमशर से काउंटी क्रिकेट खेलते थे तो जैफ्री बॉयकॉट उनके पास आकर बोले - गैरी मुझे इनस्विंग खेलने में कुछ दिक्कत होती है.

ऐसा क्यों है, तुम बता सकते हो? सोबर्स जानते थे कि बॉयकॉट को अपनी तकनीक का बड़ा गुमान है. इसलिए जानबूझकर उन्होंने कहा - तुम अपनी तकनीक को बहुत शानदार मानते हो, लेकिन ऐसा है नहीं. तुम्हारी तकनीक में एक कमी यह है कि तुम जब फ्रंटफुट पर आते हो तो तुम्हारा पैर कुछ ज्यादा अक्रॉस आ जाता  है. इससे अंदर आती गेंद या तो पैड और बैट के बीच से निकल जाती है या पैड पर लगती है.

कुछ दिन बाद नॉटिंघमशर का मैच यॉर्कशर से था. उसमें जब सोबर्स, बॉयकॉट को गेंद फेंकने आए तो बॉयकॉट स्वाभाविक रूप से इनस्विंगर की उम्मीद कर रहे थे. सोबर्स ने जो पहली गेंद फेंकी वह ऑफ स्टंप पर थी और आउटस्विंगर थी. बॉयकॉट के बल्ले का बाहरी किनारा लगा और वे स्लिप में कैच हो गए. जब बॉयकॉट वापस जा रहे थे तो सोबर्स ने उनसे कहा - जेफ्री, दूसरी कमी के बारे में तो तुमने पूछा ही नहीं था.

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