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संडे स्पेशल: इस क्रिकेटर की वजह से दो दशक तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए तरसती रही थी साउथ अफ्रीका

साउथ अफ्रीका के मिश्रित वर्ण के खिलाड़ी थे बेसिल डी'ओलिविएरा, इंग्लैंड की टेस्ट टीम से खेले, उनके साउथ अफ्रीका दौरे पर जाने से दौरा हुआ रद         

Updated On: Feb 11, 2018 11:24 AM IST

Rajendra Dhodapkar

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संडे स्पेशल: इस क्रिकेटर की वजह से दो दशक तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए तरसती रही थी साउथ अफ्रीका

भारतीय टीम का साउथ अफ्रीका का दौरा अभी चल ही रहा है. भारत और साउथ अफ्रीका का क्रिकेट का रिश्ता बहुत पुराना नहीं है. सन 1992 में जब साउथ अफ्रीका में रंगभेद सत्ता खत्म हुई तब साउथ अफ्रीका का अंतरराष्ट्रीय बॉयकॉट खत्म हुआ और उसके बाद उसकी टीम ने पहला दौरा भारत का ही किया. इस संदर्भ में उस घटना को याद करना प्रासंगिक होगा जिसे खेलों में साउथ अफ्रीका के खिलाफ बॉयकॉट में मील के पत्थर माना जाता है. इस सारे घटनाक्रम को पचास साल हो रहे हैं इसलिए भी इसे याद करना प्रासंगिक होगा.

साउथ अफ्रीका में रंगभेद तो तभी से था जबसे यूरोप से गए गोरों ने उसे अपना उपनिवेश बनाया था. लेकिन बीसवीं शताब्दी में जहां सारी दुनिया में रंगभेद की दीवारें ढह रही थीं, साउथ अफ्रीका में रंगभेद ज्यादा कट्टर हो रहा था और अश्वेत निवासियों पर सख्ती और बढ़ रही थी. साउथ अफ्रीका में अश्वेत और मिश्रित वर्ण के लोग गोरे लोगों के साथ खेल नहीं सकते थे इसलिए साउथ अफ्रीका में कोई अश्वेत खिलाड़ी देश की टीम में खेल नहीं सकता था. साउथ अफ्रीका की टीम भारत, पाकिस्तान और वेस्टइंडीज के साथ तो खेलती ही नहीं थी, सिर्फ इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ ही उसके खेल के रिश्ते थे.

1964 ओलिंपिक से बाहर होने पर साउथ अफ्रीका को लगा झटका

दूसरे महायुद्ध के बाद साउथ अफ्रीका के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग होने लगी. साठ के दशक में फीफा ने साउथ अफ्रीका पर पाबंदी लगा दी. इससे तो साउथ अफ्रीका को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, लेकिन सन 1964 के ओलिंपिक से साउथ अफ्रीका को बाहर कर देने से जरूर उसे झटका लगा. इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के क्रिकेट रिश्ते साउथ अफ्रीका से बदस्तूर जारी थे, लेकिन उन पर भी दबाव पड़ रहा था.

इन देशों के खिलाड़ी साउथ अफ्रीका की यात्रा करना विशेष रूप से पसंद करते थे क्योंकि वहां उनकी बहुत आवभगत होती थी. रंगभेद से बंटे हुए देश में वे देख ही नहीं पाते थे कि वहां ग़रीब अश्वेत लोग किन हालात में रहते हैं. पहली बार अश्वेत नागरिकों की हालत देखने और उससे विचलित होने वाले शख्स थे प्रसिद्ध अंग्रेज क्रिकेट कमेंटेटर जॉन अरलॉट. अरलॉट ने अन्य खिलाड़ियों को भी इस वास्तविकता को दिखाया और इससे कई खिलाड़ियों के मन में रंगभेद का विरोध भी जागा, लेकिन वे जानते थे कि उनका क्रिकेट प्रतिष्ठान भी साउथ अफ्रीका से रिश्ते बनाए रखने के पक्ष में है इसलिए वे चुप ही रहे.

डेविड शेपर्ड ने उठाई थी सबसे  पहले आवाज

रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाने वाले पहले खिलाड़ी थे रेवरेंड डेविड शेपर्ड. शेपर्ड के बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं. वह एक पादरी थे और टेस्ट बल्लेबाज भी. सन 1960 में साउथ अफ्रीका ने इंग्लैंड का दौरा किया. साउथ अफ्रीका की टीम को एक मैच ससेक्स के खिलाफ़ खेलना था. ससेक्स के कप्तान थे डेविड शेपर्ड. शेपर्ड ने एमसीसी को चिट्ठी लिखी कि वे साउथ अफ्रीका की सारे गोरे खिलाड़ियों वाली टीम के खिलाफ नहीं खेलेंगे. उन्होंने कहा कि वे एमसीसी के सदस्यों के सामने अपनी बात रखने को तैयार हैं. उस वक्त एमसीसी में शेपर्ड की काफी आलोचना हुई कि वे खेल में राजनीति ला रहे हैं, लेकिन चिंगारी तो पड़ चुकी थी. शेपर्ड का नाम इंग्लैंड के कप्तान के लिए भी चल रहा था, लेकिन इस बात ने उस संभावना को खत्म कर दिया.

छह साल बाद साउथ अफ्रीका के मिश्रित वर्ण के एक खिलाड़ी ने ऑरलॉट को चिट्ठी लिखी कि अपने देश में तो उसका भविष्य नहीं है. अगर ऑरलॉट इंग्लैंड में उसके लिए कुछ इंतजाम कर सकें तो अच्छा होगा. ऑरलॉट ने इंग्लिश क्लब क्रिकेट में उसके खेलने का इंतजाम किया. यह खिलाड़ी था बेसिल डी'ओलिविएरा. डी'ओलिविएरा ने क्लब क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन किया और उन्हें वारविकशर ने अनुबंधित कर लिया. काउंटी क्रिकेट में अच्छे प्रदर्शन और इस बीच इंग्लैंड के अप्रवासी नियमों पर खरा उतरने के बाद यह संभावना मज़बूत हो गई कि वह इंग्लैंड की टेस्ट टीम में आ सकते हैं. तब साउथ अफ्रीका सरकार को फिक्र होना शुरू हुई कि अगर वह टेस्ट क्रिकेट खेलने लगे और साउथ अफ्रीका की टीम के लिए चुन लिए गए तो क्या होगा. पर्दे के पीछे साउथ अफ्रीका सरकार सक्रिय हो गई कि इस परिस्थिति से बचा जा सके.

1967 में टेस्ट क्रिकेट में डोलिवेरा का पदार्पण

इसी बीच जनवरी 1967 में टेस्ट क्रिकेट में डी'ओलिविएरा का पदार्पण हुआ. अब यह संभावना और मजबूत हो गई कि डोलिवेरा अगले साल के दक्षिण अफ्रीका दौरे के लिए चुने जा सकते हैं. साउथ अफ्रीका की सरकार ने यह साफ कर दिया कि अगर वह टीम में होंगे तो दौरा नहीं हो सकता. पर्दे के पीछे ऐसी कोशिशें जारी रहीं कि डी'ओलिविएरा खुद ही मना कर दें, या डी'ओलिविएरा को बड़ी रकम देकर उनसे यह कहलवाया जाए कि वे इंग्लैंड से नही खेलना चाहते, बल्कि जब साउथ अफ्रीका में रंगभेद खत्म होगा तब वे वहां से खेलेंगे. उन्हें फुसलाने और लालच देने की बहुत कोशिशें हुईं पर वह नहीं माने. एमसीसी का बहुमत नहीं चाहता था कि दौरा रद हो जाए, न ही वे यह बताना चाहते थे कि वह साउथ अफ्रीका दबाव में झुक गए इसलिए वह कुछ बीच का रास्ता निकालने में जुट गए. एमसीसी के कर्ताधर्ताओं ने साउथ अफ्रीका के कड़े रुख के बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं दी और पर्दे के पीछे साउथ अफ्रीका सरकार और बोर्ड से बात करते रहे.

तमाम किस्म के दबावों की वजह से डी'ओलिविएरा वेस्टइंडीज के दौरे पर नाकाम रहे. इसलिए एमसीसी को लगा कि उन्हें डोलिवेरा को ना चुनने का मौका मिल जाएगा. लेकिन सन 1968 में आई ऑस्ट्रेलिया की टीम के खिलाफ उन्हें पहले टेस्ट के लिए चुन लिया गया. उन्होंने 78 रन बनाए और दो विकेट भी लिए, लेकिन अगले तीन टेस्ट के लिए वह बाहर कर दिए गए. अनेक वजहों से ऐसा हुआ कि आखिरी टेस्ट में वह फिर टीम में थे और उन्होंने 158 रन की पारी खेली. हालांकि उन्हें कुछ जीवनदान मिले, लेकिन जैसे विवादों के केंद्र में वह थे उसे देखते हए यह बहुत अच्छा प्रदर्शन था.

चयनकर्ताओं ने किया नजरअंदाज

लेकिन जब चयनकर्ता साउथ अफ्रीका के दौरे के टीम चुनने बैठे तो डी'ओलिविएरा को उन्होंने नहीं चुना. उनका कहना था कि यह चयन पूरी तरह खेल के आधार पर हुआ है. यह अर्धसत्य जैसा कुछ था, यानी चयनकर्ता बेईमानी करना नहीं चाहते थे, लेकिन कहीं ना कहीं दौरा रद न होने की इच्छा भी काम रह रही थी. लेकिन डी'ओलिविएरा को ना चुने जाने पर बहुत बवाल हो गया. राजनीतिक, मीडिया और खेल जगत में रंगभेद विरोधियों ने आरोप लगाया कि चयनकर्ता रंगभेद के आगे झुक गए. साउथ अफ्रीका में सरकार समर्थकों ने डोलिवेरा के ना चुने जाने का बड़ा जश्न मनाया. कप्तान कॉलिन काउड्री, डेविड शेपर्ड के दोस्त थे.

शेपर्ड उनसे मिले और डी'ओलिविएरा को ना चुनने का कारण पूछा. काउड्री ने कहा कि हमें एक बॉलिंग ऑलराउंडर की जरूरत थी और डी'ओलिविएरा की गेंदबाजी बस यूं ही है. शेपर्ड ने एमसीसी में और बाहर जनमत का समर्थन जुटाना शुरू कर दिया. एमसीसी के कई सदस्यों ने विरोध में इस्तीफा दे दिया और हजारों लोगों ने चिट्ठियां लिखकर विरोध दर्ज करवाया. इस बीच डी'ओलिविएरा  की जगह चुने गए टॉम कार्टराइट ने खुद ही अनफिट होने की घोषणा करके दौरे से हटने की घोषणा कर दी, जबकि वह फिटनेस टेस्ट में सफल रहे थे. वास्तविकता यह थी कि वह खुद रंगभेद समर्थकों का मोहरा नहीं बनना चाहते थे, ना विवाद में पड़ना चाहते थे. बहुत बाद में कार्टराइट ने बताया कि जब डी'ओलिविएरा के ना चुने जाने पर साउथ अफ्रीका में जश्न होने की खबर आई तभी उन्होंने दौरे पर ना जाने का फैसला कर लिया था.

 

1970 में आखिरी बार किसी टीम ने किया था साउथ अफ्रीका का दौरा

अब चयनकर्ताओं ने डी'ओलिविएरा को चुन लिया जिन्हें पहले वह बॉलिंग ऑलराउंडर ना होने की वजह से नामंजूर कर चुके थे. साउथ अफ्रीका के प्रधानमंत्री जॉन वोर्स्टर ने दौरा रद करने की घोषणा कर दी. डेविड शेपर्ड ने एमसीसी की बैठक में एमसीसी के ढुलमुल रवैये पर निंदा प्रस्ताव लाने की कोशिश की, लेकिन उसे बहुमत नहीं मिला. फिर भी साउथ अफ्रीका के रंगभेद के खिलाफ माहौल उग्र होने लगा था. एमसीसी ने इसके बाद सन1970 में साउथ अफ्रीका की टीम के इंग्लैंड दौरे को मंजूरी दी, लेकिन तब तक इतना उग्र विरोध सारे देश में व्याप्त हो गया था कि वह दौरा रद करना पड़ा. सन 1970 में ऑस्ट्रेलिया ने साउथ अफ्रीका का दौरा कियावह किसी विदेशी टीम का वहां आखिरी आधिकारिक दौरा थाउसके बाद लगभग बीस साल साउथ अफ्रीका अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से बाहर रहा.

इन तमाम विवादों के खत्म होने के बाद डी'ओलिविएरा ऑलराउंडर की तरह स्थापित हुए, लेकिन अगर रंगभेद ने उनके जीवन के महत्वपूर्ण साल बरबाद ना किए होते तो वह और भी बड़े खिलाड़ी की तरह दिखाई देते. उन्होंने अपना पहला प्रथम श्रेणी मैच 28 साल की उम्र में खेला और उन्हें पहला टेस्ट खेलने का मौका 31 साल की उम्र में मिला.

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