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संडे स्पेशल : क्या यह वही खेल है, जिससे हम प्यार करते थे...

अगर इतना पैसा न आता तो क्रिकेट क्या बच पाता... दूसरा सवाल यह कि पैसे की मार से क्या क्रिकेट बच पाएगा?

Rajendra Dhodapkar Updated On: Apr 08, 2018 11:56 AM IST

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संडे स्पेशल : क्या यह वही खेल है, जिससे हम प्यार करते थे...

पिछले दिनों क्रिकेट में ऑस्ट्रेलियाई टीम के गेंद से छेड़छाड़ करने की खबर के बाद दूसरी बड़ी खबर बीसीसीआई द्वारा अरबों रुपए में टेलीविजन प्रसारण के अधिकार बेचने की है. अगर तीसरी ख़बर का जिक्र करें तो वह आईपीएल की हवा बनाने को लेकर है. हम जैसे पुराने क़िस्म के क्रिकेट प्रेमियों के लिए तीनों ही खबरें कोई बहुत सुखद नहीं हैं. गेंद से छेड़छाड़ तो खैर बुरी खबर ही है, लेकिन बाकी दोनों खबरों के बारे में यह कहा जा सकता है कि खेल में पैसा आ रहा है, इसके कुछ फायदे हैं.

खिलाड़ियों को अब अच्छा पैसा मिलता है, आमतौर पर खेल की सुविधाएं बेहतर हुई हैं, यह बहुत अच्छी बात हैं. लेकिन हम जैसे मध्यमवर्गीय लोग जब बीस पचीस हजार करोड़ की बातें सुनते हैं, तो एक परायापन महसूस होता है. ऐसा लगता है कि जो खेल हमें प्रिय है वह और जिस खेल में पैसा उड़ेला जा रहा है, वे दो अलग-अलग खेल हैं. हम जिस खेल को देखते रहे हैं और जिसके क़िस्से पढ़ते सुनते रहे हैं, वह क्रिकेट यह नहीं है. आईपीएल तो खैर अलग ही खेल है, जो खेल, ग्लैमर, मनोरंजन, सनसनी और जुए की कुछ मिलीजुली भेलपूरी है. खेल में पैसा होना बुरा नहीं है. कम से कम दरिद्रता से तो अच्छा ही है. लेकिन ज्यादा पैसा होना भी बहुत बुरा है. सब से ज्यादा बुरा यह है कि अब क्रिकेट न खिलाड़ियों के हाथ में है, न दर्शकों के, न ही खेल संगठनों के. अब खेल पैसे और पैसे वालों के हाथ है और इस वजह से खेल बदल रहा है.

खेल दरअसल इंसानी चरित्र के रंग समझने का मंच है

खेल में हम कौशल के अलावा मानवीय चरित्र की तरह-तरह की रंगतें भी देखते हैं जो खेल को वास्तव में दिलचस्प बनाती हैं. ये रंगतें सुखद ज्यादा होती हैं, उदारता, साहस, हिम्मत, जूझने का जज्बा और कठिन हालात में भी ईमानदारी से खेलने का तत्व ऐसे गुण हैं, जो खेल में महत्वपूर्ण होते हैं. बल्कि इन गुणों को विकसित करने के लिए ही क्रिकेट जैसे खेलों को उन्नीसवीं सदी में विकसित किया गया. खेल में चालाकियां और बुराइयां भी होती हैं. लेकिन इन्हें नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है.

लेकिन जब एक मैच के टीवी प्रसारण के लिए पचास करोड़ रुपया खर्च किया जाता है तो खेल बदल जाता है. तब खेल का मुख्य उद्देश्य उस पैसे की वसूली और मुनाफा कमाना हो जाता है. जब इतना पैसा खेल पर लगा है तो खिलाड़ी भी मजे में नहीं खेल सकता. वह किसी भी कीमत पर जीतने के लिए खेलता है. किसी भी कीमत पर जीतने की कोशिश का ही नतीजा है कि आजकल किसी बड़ी सीरीज के पहले तैयारी के लिए मैच नहीं होते. पहले किसी भी सीरीज के पहले कम से कम दो मैच दौरा करने वाली टीम दो मजबूत स्थानीय टीमों के साथ खेलती थी. अब घरेलू क्रिकेट संगठन की कोशिश यह होती है कि एकाध मैच अगर हो भी तो उसमें कोई मजबूत टीम न हो ताकि आगंतुक टीम को अच्छी प्रैक्टिस न मिल पाए.

प्रैक्टिस मैच में अब किसी की रुचि नहीं होती

अक्सर आगंतुक या मेहमान टीम के संगठन की भी अच्छी प्रैक्टिस में कोई दिलचस्पी नहीं होती, क्योंकि प्रायोजकों और टीवी प्रसारणकर्ताओं को उसमें दिलचस्पी नहीं होती. उनके लिए प्रैक्टिस मैच समय की बर्बादी हैं. प्रैक्टिस मैचों से उन्हें कोई कमाई नहीं होती. उसके बजाय वे चाहते हैं कि टीम दो चार फालतू एक दिवसीय मैच या टी ट्वंटी मैच खेल ले, जैसे दक्षिण अफ्रीका के दौरे से पहले भारतीय टीम ने खेले थे. लेकिन क्या एक आधी अधूरी तैयारी वाली टीम को खिलाना दर्शकों के साथ धोखा नहीं है?

बहरहाल, जैसे सीएलआर जेम्स ने लिखा है कि क्रिकेट के पेशेवराना होने की वजह से तीस के दशक में बैकफ़ुट खेलना कम हो गया और आगे बढ़कर रक्षात्मक खेलना बल्लेबाजी का मुख्य आधार हो गया. इस नजरिये से इस नए व्यावसायिक क्रिकेट का शॉट कौनसा है? मेरा खयाल है कि पॉइंट से लेकर मिडऑफ तक फील्डरों के सिर के ऊपर से जो शॉट खेला जाता है, वो इस दौर का प्रतिनिधि शॉट है. पचीस-तीस साल पहले यह शॉट नहीं था या था भी तो बहुत ही दुस्साहसी बल्लेबाज जैसे विवियन रिचर्ड्स या कृष्णामचारी श्रीकांत ही इसे खेलते थे.

जो शॉट नामुमकिन दिखते थे अब रुटीन हैं

उस दौर में इस शॉट को खेलना बहुत मुश्किल इसलिए था और आज कोई भी बल्लेबाज इसलिए इसे खेल लेता है क्योंकि अब बल्ले दूसरी किस्म के हो गए हैं, जिनसे मिस हिट होने पर भी गेंद सीमा रेखा के पार हो जाती है. तब हवा में स्क्वायर कट या कवर ड्राइव खेलना खतरनाक होता था. बल्कि कोचिंग मैन्युअल में कहीं ऐसा जिक्र नहीं मिलेगा कि ये शॉट हवा में खेले जाते हैं. इसीलिए रिचर्ड्स को ऐसे शॉट खेलते हुए देखकर रोमांच होता था.

अगर देखना हो तो यू ट्यूब पर 1983 के विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ रिचर्ड्स की 183 रन की पारी देख लीजिए, जिसमें वे बॉब विलिस और इयान बॉथम जैसे तेज गेंदबाजों की लेग स्टंप की गेंदों को बार-बार कवर और मिड ऑफ के ऊपर से सीमा रेखा पार कराते हैं. अब तो कोई भी बल्लेबाज ऑफ स्टंप के बाहर की गेंद पर बल्ला चला देता है और गेंद सीमा रेखा के बाहर जाकर गिरती है क्योंकि यह शॉट बल्लेबाज से ज्यादा बल्ले का कमाल है. टी ट्वंटी में तो सीमाएं भी नजदीक होती हैं इसलिए छह रन मिलना आसान हो जाता है. दर्शक इससे भले ही रोमांचित हो जाएं लेकिन वास्तव में यह हथौड़ा छाप शॉट गेंदबाज पर अन्याय है. लेकिन सीमित ओवरों के क्रिकेट का यह मुख्य शॉट है जिसे देख देखकर अज्ञानी दर्शक खुश होते रहते हैं.

इन सबके बीच यह भी लगता है कि अगर इतना पैसा न आता तो क्रिकेट क्या बच पाता? तभी दूसरा सवाल यह मन में आता है कि इस पैसे की मार से क्या क्रिकेट बच पाएगा? खैर दोनों ही बातें अपने बस के बाहर हैं लेकिन सोच तो सकते ही हैं.

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