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संडे स्पेशल: एक विनम्र क्रांतिकारी धार्मिक नेता और क्रिकेटर की कहानी

रेवरेंड डेविड शेपर्ड एक अच्छा क्रिकेटर लेकिन महान इंसान

Rajendra Dhodapkar Updated On: May 21, 2017 02:27 PM IST

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संडे स्पेशल: एक विनम्र क्रांतिकारी धार्मिक नेता और क्रिकेटर की कहानी

रेवरेंड डेविड शेपर्ड की आत्मकथा बहुत पहले, लगभग चालीस साल हुए पढ़ी थी. उसमें से यही याद रह गया कि वे एंग्लिकन चर्च के एक बिशप यानी पादरी थे जो इंग्लैंड के लिए टेस्ट क्रिकेट खेले थे और दो टेस्ट मैचों मे कप्तानी भी की थी. उनके बारे यह भी पढ़ने में कई बार आया कि उनका कवर ड्राइव लाजवाब था और सन 1962 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर उनकी फील्डिंग इतनी खराब थी कि उसके कई किस्से और चुटकुले बने थे. शेपर्ड के बारे में कुछ खास बाद में पढ़ने में नहीं आया. अभी फिर उनके बारे में पढ़ना शुरू किया तो यह पता लगा कि वे कितने असाधारण इंसान थे, जिनका मैदान और उसके बाहर भी बहुत बड़ा योगदान है.

शेपर्ड कैंब्रिज विश्वविद्यालय और ससेक्स से प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेले और ससेक्स के बहुत सफल कप्तान भी रहे. वे शुरुआती दिनों में बहुत चमकदार प्रतिभा वाले खिलाड़ी की तरह नहीं देखे गए और हर स्तर पर उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा. जानकारों मे मुताबिक उनमें लगन और एकाग्रता जबरदस्त थी, जिससे वे कामयाब होते गए. सन 1950 में वेस्टइंडीज टीम के दौरे के दौरान उन्होंने मेहमान टीम के खिलाफ बढ़िया प्रदर्शन किया जिससे वे टेस्ट टीम में जगह बना पाए. लगभग दो साल के संघर्ष और औसत प्रदर्शन के बाद उन्होंने भारत के खिलाफ अपना पहला टेस्ट शतक लगाया.

जब धर्म की ओर आकर्षित हुए डेविड शेपर्ड

जब वे क्रिकेट में कामयाब हो रहे थे तभी वे धर्म की ओर आकर्षित हुए और उन्होंने पादरी बनने के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया. लेकिन क्रिकेट उन्हें खींचता रहा और चयनकर्ता भी उन्हें बार बार टीम में चुनते रहे. बीच में उन्हें लेन हटन की अनुपस्थिति में दो टेस्ट के लिए कप्तान भी बनाया गया. एक टेस्ट वे जीते, दूसरा बारिश की वजह से पूरा नहीं हुआ.

कप्तान वे बहुत अच्छे थे, विकेटकीपर जिम पार्क्स जो इंग्लैंड के तमाम कामयाब कप्तानों के साथ खेले थे. वे सिर्फ इन दो टेस्ट के आधार पर अपना सर्वश्रेष्ठ कप्तान मानते थे. उनके जिन गुणों ने उन्हें चर्च के जीवन में लोकप्रियता और कामयाब बनाया वे गुण उनकी कप्तानी में भी दिखते थे. वे साहसी कप्तान थे जो शॉर्ट लेग पर खुद फील्डिंग करते थे. टीम के सदस्यों मे इतने लोकप्रिय होते थे कि टीम के सदस्य उनकी खातिर पूरा जी जान लगा देते थे.

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धार्मिक जीवन की व्यस्तताओं की वजह से वे बारह साल में कुल बाईस टेस्ट मैच खेल पाए. सन 1962 के ऑस्ट्रेलिया दौरे के बाद उन्होंने क्रिकेट को अलविदा कह दिया. यह दौरा इंग्लैंड के लिए बुरा रहा, जिसमें शेपर्ड ने जुझारू बल्लेबाजी की लेकिन चर्चा उनकी खराब फील्डिंग की ज्यादा हुई.

डेविड शेपर्ड का महत्व इस सब से बहुत ज्यादा है. जब 1960 में साउथ अफ्रीका की टीम इंग्लैंड दौरे पर आई तो उन्होंने रंगभेद की नीति के विरोध में उस टीम के खिलाफ खेलने से मना कर दिया. आमतौर पर यह माना जाता है कि धार्मिक व्यक्ति अनुदार और प्रगति विरोधी ताकतों के साथ होते हैं लेकिन शेपर्ड के धार्मिक विश्वासों ने उन्हें अन्याय के खिलाफ लड़ने और समाज के दबे कुचले लोगों के साथ संघर्ष करने की ताकत दी. वे पहले क्रिकेटर थे जिन्होंने साउथ अफ्रीका के खिलाफ न खेलने के पक्ष में आवाज उठाई. उनका कहना था कि यह कदम उन्होंने अपने धार्मिक कर्तव्य की तरह उठाया है.

साउथ अफ्रीका के काले नागरिकों के लिए खड़े हुए शेपर्ड

साउथ अफ्रीका के काले नागरिकों को ताने मारे जाते थे कि ईसाइयत ने उन्हें गोरे लोगों के हाथ की कठपुतली बना दिया है, क्योंकि चर्च तो गोरों का साथ देता है. वे कहते हैं कि मैं बताना चाहता था कि नहीं, चर्च मे एक व्यक्ति ऐसा भी है जो काले लोगों के साथ खड़ा है. उसके बाद वे लगातार साउथ अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ जनमत बनाते रहे.

जब 1970 में काले खिलाड़ी बेसिल डॉलिवेरा को साउथ अफ्रीका जाने वाली अंग्रेज टीम में शामिल करने पर विवाद हुआ तो दौरा रद्द करने के पक्षधरों ने शेपर्ड को एमसीसी में अपना प्रतिनिधि बनाया. एमसीसी में शेपर्ड ने दौरा रद्द करने की जोरदार वकालत की. इस सिलसिले में उन्हें कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी और पीटर मे जैसे पुराने दोस्तों से उनके रिश्ते भी खराब हुए. लेकिन दौरा रद्द ही नहीं हुआ बल्कि साउथ अफ्रीका के साथ इंग्लैंड के खेल संबंध भी खत्म हो गए.

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खेल के बाहर भी उनका जीवन ऐसे ही आदर्शों पर आधारित रहा. जब वे पादरी बनें तो लीवरपूल के आलीशान इलाके में स्थित बिशप के भव्य बंगले मे रहने की बजाय गरीबों के इलाके मे रहना उन्होंने पसंद किया. उन दिनों स्थानीय उद्योगों के खत्म होने से वहां लोगों की हालत बहुत खराब थी, उन्होंने लोगों की मदद करने के साथ ही उन्हें सरकारी मदद दिलवाने और उनके हक में सरकारी योजनाएं बनवाने के लिए कोशिशें की और कई आंदोलनों का नेतृत्व किया.

सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार और लापरवाही के खिलाफ उन्होंने लड़ाई लड़ी. काले लोगों और महिलाओं को बराबरी देने के वे सक्रिय पक्षधर थे. मार्गरेट थैचर के अनुदारवादी दौर में सरकारी कंजरवेटिव नेतृत्व उनसे बहुत नाराज रहा, कई नेताओं ने उन पर मार्क्सवादी होने का आरोप भी लगाया, लेकिन उनका प्रभाव और सम्मान बढ़ता ही गया.

गरीबों के बीच रहकर काम करने के अपने निश्चय की वजह से उन्होंने दूसरे बेहतर इलाकों में पद लेना ठुकरा दिया, न वे प्रवचन के दौरों पर जाते थे. उनका मानना था कि धार्मिक प्रवचन देने से बेहतर लोगों से व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ना है. एक वक्त में उन्हें अंग्रेजी चर्च के सर्वोच्च पद आर्कबिशप ऑफ कैंटरबरी के लिए सबसे हकदार माना जाता था लेकिन चर्च ने तत्कालीन थैचर सरकार साथ साथ विवाद से बचने के लिए एक अन्य बिशप को यह पद दे दिया. वे अपने देश की संसद के उच्च सदन में भी मनोनीत हुए, जहां कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर नीति निर्माण में उन्होंने योगदान दिया. उनकी पत्नी ग्रेस उनके कामों में सक्रिय मददगार थी और लीवरपूल में वे भी बहुत लोकप्रिय और सम्मानित थीं.

इस विनम्र क्रांतिकारी धार्मिक नेता और क्रिकेटर की मृत्यु 2005 में आंतों के कैंसर से हुई और उनकी पत्नी ग्रेस की मृत्यु 2010 में हुई. दुनिया में ऐसे लोग होते हैं तभी इंसानियत पर यकीन भी बना रहता है.

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