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संडे स्पेशल : गैरपरंपरागत केंद्रों से आए खिलाड़ियों ने बदला भारतीय क्रिकेट का मिजाज

भारतीयों के खेल में पिछले दो-तीन दशकों में जो आक्रामकता आई है, उसकी एक बड़ी वजह इन नए केंद्रों से आए खिलाड़ी हैं

Updated On: Nov 26, 2017 12:08 PM IST

Rajendra Dhodapkar

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संडे स्पेशल : गैरपरंपरागत केंद्रों से आए खिलाड़ियों ने बदला भारतीय क्रिकेट का मिजाज

पिछली बार रणजी ट्रॉफी में हमने मुंबई और उसके वर्चस्व की चर्चा की. इस बार बात दूसरी टीमों और घरेलू क्रिकेट के मंजर में बदलाव की. जब मैं लगभग तीस साल पहले भोपाल से दिल्ली आया तब तक पूरे मध्यप्रदेश में सिर्फ इंदौर और भिलाई (तब तक छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुआ था) इन दो जगहों पर टर्फ विकेट हुआ करते थे. जब दिल्ली आकर मैंने देखा कि यहां तो स्कूल कॉलेजों के मैदानों में भी टर्फ विकेट हैं तो यह बड़ी आश्चर्य की बात लगी.

राजा यशवंतराव ने रखी थी होल्कर टीम की नींव

आजादी के पहले इंदौर के राजा यशवंतराव होलकर क्रिकेट के बड़े शौकीन थे सो उन्होंने देश भर से अच्छे खिलाड़ियों को बुलाकर अपनी रियासती सेना में नौकरियां दीं. सीके नायडू इसी तरह कर्नल नायडू कहलाए और इंदौर में ही पैदा हुए क्रिकेट के पहले सुपरस्टार मुश्ताक अली, कैप्टन मुश्ताक अली बने.

होलकर्स की टीम आजादी के पहले देश की बड़ी टीमों में थी और दो बार उसने रणजी ट्रॉफी भी जीती थी, इसीलिए बाद में भी इंदौर ही मध्य प्रदेश के क्रिकेट का केंद्र बना रहा. मध्य प्रदेश की क्रिकेट टीम लगभग पूरी ही इंदौर के खिलाड़ियों से बनती थी. नाममात्र के लिए एक-दो खिलाड़ी किसी दूसरे शहर के होते थे. इंदौर के खिलाड़ी बाहरी खिलाड़ियों को बहुत घास नहीं डालते थे.

मुझे एक मित्र ने बताया कि गोरखपुर से आए नरेंद्र हिरवानी को भी इंदौर वालों से काफी उपेक्षा सहनी पड़ी थी. हालांकि संजय जगदाले ने उन्हें संवारने में बहुत मेहनत की थी. इसका अर्थ यह नहीं कि मध्य प्रदेश की टीम बड़ी मजबूत थी. उस दौर में रणजी ट्रॉफी के शुरुआती मुकाबले क्षेत्रीय आधार पर होते थे और क्षेत्र में पहली दो टीमें नॉकआउट दौर में खेलती थीं. तब मध्य क्षेत्र की सबसे मजबूत टीम राजस्थान थी. जो हमेशा नॉकआउट दौर में पहुंचती थी, बल्कि मुंबई के वर्चस्व के दौर में उसने छह बार फाइनल में मुंबई को चुनौती दी थी. मध्य प्रदेश की स्थिति यह थी कि अगर वह कभी नॉकआउट दौर में पहुंच जाए तो वह बड़ी उपलब्धि थी.

संदीप पटिल ने किया टीम में बड़ा परिवर्तन

यह स्थिति अस्सी के दशक में बदली. मध्य प्रदेश में बतौर पेशेवर खिलाड़ी और कप्तान संदीप पाटिल जब आए तो उन्होंने बड़ा परिवर्तन किया. इसी दौर में दूसरी जगहों पर सुविधाएं बेहतर हुईं, कोचिंग का इंतजाम हुआ और टीवी की पहुंच की वजह से लोगों को श्रेष्ठ दर्जे का क्रिकेट देखने को मिलने लगा. घरेलू क्रिकेट में मध्य प्रदेश का प्रदर्शन बेहतर होने लगा और होलकर के स्वर्णिम दौर के बाद पहली बार नरेंद्र हिरवानी, राजेश चौहान, अमय खुरासिया जैसे खिलाड़ी भारतीय टीम में आए.

Sandeep-Patil

अस्सी के दशक में छोटे शहर के खिलाड़ियों ने दिखाया दमखम

मध्य प्रदेश की कहानी एक उदाहरण है. अस्सी के दशक में तमाम टीमों में यह परिवर्तन हुआ. सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि खिलाड़ी सिर्फ महानगरों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे शहरों से, बल्कि गांवों तक से आने लगे. इसके पहले कोई सोच नहीं सकता था कि मुंबई, दिल्ली , चेन्नई, हैदराबाद या बेंगलुरु जैसे महानगरों के अलावा भी कहीं से क्रिकेट खिलाड़ी आ सकते हैं, या ओडिशा और केरल का कोई खिलाड़ी भारतीय टीम में जगह बना सकता है.

देवाशीष मोहंती , श्यामसुंदर दास या टीनू योहानन और अहमदनगर के जहीर खान, मेरठ के प्रवीण कुमार या इकट नाम के एक गांव से आए मुनाफ पटेल की भारतीय क्रिकेट टीम में आमद एक बहुत बड़े लोकतांत्रिक परिवर्तन को दिखाती है. इसमें भी कोई शक नहीं कि मुंबई, कर्नाटक या तमिलनाडु जैसे परंपरागत क्रिकेट शक्ति केंद्र अब भी बहुत मजबूत हैं, क्योंकि वहां क्रिकेट की लंबी परंपरा है और उसे उन लोगों ने बनाए रखा है, लेकिन गैरपरंपरागत केंद्रों से आए खिलाड़ियों की वजह से खेल में एक नए किस्म की ताकत आई है. वीरेंद्र सहवाग भले ही दिल्ली के कहलाए जाते हों, लेकिन वह दिल्ली में भी नजफगढ़ जैसे बाहरी इलाके के हैं.

नए केंद्रों से आए खिलाड़ियों ने भारतीय क्रिकेट के मिजाज में फर्क

इन नए केंद्रों से आए खिलाड़ियों ने भारतीय क्रिकेट के मिजाज में भी बड़ा फर्क डाला. एक तो इन्हें बहुत संघर्ष करके आगे बढ़ना पड़ा इसलिए उनमें एक किस्म का कड़ियलपन और जुझारूपन था. दूसरे क्योंकि वे किसी परंपरा से नहीं आए थे इसलिए उन पर परंपरा का बोझ नहीं था. अक्सर परंपरागत केंद्रों के खिलाड़ी बड़े खिलाड़ियों के नाम और ख्याति के बोझ से दबे रहते थे. भारतीयों के खेल में पिछले दो-तीन दशकों में जो आक्रामकता आई है, उसकी एक बड़ी वजह इन नए केंद्रों से आए खिलाड़ी हैं जो किसी के नाम और ख्याति से दबते नहीं थे.

India's Zaheer Khan celebrates taking the wicket of Sri Lankan captain Sanath Jayasuriya during the ICC Champions Trophy Tournament final match between Sri Lanka and India in Colombo Sri Lanka September 30, 2002. REUTERS/Anuruddha Lokuhapuararchch AL/JS - RP3DRIEYPJAA

लेकिन परंपराबोध खिलाड़ियों को ज्यादी लंबी पारी खेलने और ज्यादा अनुशासित होने के लिए भी प्रेरित करता है और संकट से निकलने में भी मददगार होता है. इसीलिए यह भी हुआ है कि अक्सर लंबी पारी खेलने वाले यानी ज्यादा दिन तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कामयाब खिलाड़ी अब भी परंपरागत केंद्रों से आते हैं और परंपरागत केंद्रों का रणजी ट्रॉफी में प्रदर्शन भी ज्यादा निरंतरता लिए हुए होता है.

लगातार अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती नए केंद्रों की टीमें

जो दूसरी टीमें हैं वे किसी वक्त कुछ अच्छे खिलाड़ियों की वजह से या किसी अच्छे कोच की वजह से एक दो साल बेहतर प्रदर्शन करती हैं फिर पुराने ढर्रे पर आ जाती हैं. जैसे बीच में कुछ साल हरियाणा के थे, दो-तीन साल रेलवे ने अच्छा प्रदर्शन किया. बीच में एक दौर उत्तर प्रदेश का रहा. तारक सिन्हा के कोच बनने और ह्रषिकेश कानिटकर, आकाश चोपड़ा और रॉबिन बिष्ट के टीम में खेलने की वजह से दो साल राजस्थान ने रणजी ट्रॉफी जीत ली, लेकिन बाद में वैसा प्रदर्शन राजस्थान की टीम नहीं कर पाई.

इसीलिए आज भी मुंबई , कर्नाटक और तमिलनाडु जैसी टीमों का प्रदर्शन लगातार अच्छा बना रहता है, लेकिन उन्हें अन्य टीमों से भी कड़ी चुनौती मिलती है.  भले ही उनमें से हर टीम लगातार कई साल तक अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती. अब भी रणजी ट्रॉफी चैंपियन का खिताब गुजरात के पास है जो पहली बार चैंपियन बनी है. लेकिन आज देश के छोटे से छोटे गांव और कस्बे का लड़का भी भारत की टीम में खेलने की महत्वाकांक्षा रख सकता है. यह क्रिकेट के लिए अच्छा है.

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