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संडे स्पेशल: सलामी बल्लेबाजों को सलाम

भारत के सबसे बड़े सलामी बल्लेबाज सुनील गावस्कर थे

Rajendra Dhodapkar Updated On: Feb 05, 2017 01:28 PM IST

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संडे स्पेशल: सलामी बल्लेबाजों को सलाम

क्रिकेट आमतौर पर बल्लेबाजों के पक्ष में झुका हुआ खेल है. लेकिन सलामी बल्लेबाजों को इस झुकाव का फायदा सबसे कम मिलता है.

क्रिकेट में यह भी कहा जाता है कि पहला घंटा गेंदबाजों के नाम होता है. उसके बाद बल्लेबाजों की चलती है. सलामी बल्लेबाज को पहले घंटे में गेंदबाजों को झेलना होता है, इसलिए उसका काम सबसे कठिन होता है.

तेज गेंदबाजी झेलना कोई पसंद नहीं करता और सलामी बल्लेबाज का तो काम ही यह होता है. जब पिच में सबसे ज्यादा जान होती है. गेंद नई होती है और गेंदबाज में सबसे ज्यादा जान होती है, तभी उसका काम शुरू होता है. उसका काम टीम के लिए नींव तैयार करना होता है. अक्सर उसे अपनी नींव पर दूसरे बल्लेबाजों को रनों की इमारत बनाते देखना पड़ता है.

इसके अलावा इनिंग्स शुरू करने के लिए कुछ अलग किस्म की प्रतिभा की भी जरूरत होती है. इसीलिए हर कोई ओपनिंग बल्लेबाज नहीं हो सकता. नंबर तीन के बल्लेबाज को पहला विकेट जल्दी गिरने पर अक्सर तकनीकी रूप से ओपनर की भूमिका निभानी पड़ती है. लेकिन कोई भी नंबर तीन बल्लेबाज ओपनिंग करना पसंद नहीं करता.

गॉर्डन ग्रीनिज और डेसमंड हेंस वेस्टइंडीज की सर्वश्रेष्ठ सलामी जोड़ी

इसी वजह से टीमों को अच्छा सलामी बल्लेबाज मुश्किल से ही मिलता है. सलामी जोड़ी मिलना और भी मुश्किल होता है. दूसरे महायुद्ध के बाद लगभग चालीस साल तक वेस्टइंडीज की टीम विश्व क्रिकेट पर छाई रही. लेकिन उसे पहली (और आखिरी भी) अच्छी सलामी जोड़ी गॉर्डन ग्रीनिज और डेसमंड हेंस के रूप में सत्तर के दशक में मिली.

भारत में इस दौर के सबसे बड़े सलामी बल्लेबाज सुनील गावस्कर थे और उन्होंने कितने जोड़ीदारों के साथ शुरुआत की यह शायद उन्हें भी याद न हो.

वेस्टइंडीज़ के पहले बड़े सलामी बल्लेबाज कॉनराड हंट थे, जिनका टेस्ट करियर जनवरी 1958 में शुरू हुआ. लगभग नौ साल के इस करियर में उन्होंने तेरह बल्लेबाज़ों के साथ इनिंग्स की शुरुआत की. हंट कुछ उस तरह के बल्लेबाज़ थे जैसे बाद के दौर में ग्रीनिज और हेंस थे यानी वे तकनीकी रूप से सुनील गावस्कर की तरह बहुत मजबूत थे. लेकिन वीरेंद्र सहवाग की तरह धुआंधार बल्लेबाजी करते थे.

हंट ने ‘प्लेइंग टू विन’ नाम से आत्मकथा लिखी है. इसमें उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ अपनी पहली टेस्ट इनिंग्स की शुरुआत का जो वर्णन किया है, उससे पता चलता है कि वे कैसे बल्लेबाज थे. यह किताब अभी मेरे पास नहीं है इसलिए मैं याददाश्त के आधार पर लिख रहा हूं.

हंट लिखते हैं कि जब मैं ओपनिंग करने पैवेलियन के बाहर निकला तो मुझे कुछ घबराहट हो रही थी. फजल महमूद की पहली गेंद ऑफ़ स्टंप पर आगे थी और मैंने फ्रंटफुट पर कवर में चौका जड़ दिया. मेरी घबराहट खत्म हो गई. हंट ने अगली गेंद पर भी चौका जड़ा. अपने टेस्ट करियर का ऐसा आगाज करने वाले हंट ने अपने इसी अंदाज को जारी रखा.

वे बताते हैं कि 1963 के इंग्लैंड दौरे में पहले टेस्ट की पहली तीन गेंदों पर उन्होंने चौके जड़े थे. गेंदबाज थे फ्रेडी ट्रुमन, जिन्हें फायरी फ्रेड कहा जाता था. जिनके नाम सबसे ज्यादा टेस्ट विकेटों का रिकॉर्ड लंबे वक्त तक बना रहा था.

बहरहाल, अपनी पहली ही पारी में हंट ने 142 रन बनाए. हालांकि वह टेस्ट पाकिस्तान की दूसरी इनिंग्स में एक और महान सलामी बल्लेबाज हनीफ मोहम्मद की 337 रनों की पारी के लिए याद किया जाता है.

पाकिस्तान को पहली इनिंग्स में फॉलोऑन मिला था. उसके बाद हनीफ ने इस महान पारी के जरिए मैच को ड्रॉ करवाया. हनीफ ने 970 मिनट तक लगातार बल्लेबाजी की, जो आज तक टेस्ट क्रिकेट की सबसे लंबी पारी का रिकॉर्ड है.

गारफील्ड सोबर्स की वो यादगार पारी

प्रसंगवश इस सीरीज के तीसरे टेस्ट में हंट ने दोहरा शतक जड़ा और एक अन्य युवा बाएं हाथ के बल्लेबाज के साथ 400 से ज्यादा रन की लंबी साझेदारी की, जिसने अपना पहला शतक लगाया. इस युवा खिलाड़ी का नाम था गारफील्ड सोबर्स, जिन्होंने 365 रन बनाए. यह स्कोर टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा रनों का रिकॉर्ड तब तक बना रहा, जब तक सोबर्स की याद दिलाने वाले एक अन्य बल्लेबाज ब्रायन लारा ने उसे 1994 में नहीं तोड़ दिया.

हंट का करियर सफल रहा. लेकिन वे मॉरल रिआर्मामेंट मूवमेंट नामक एक आध्यात्मिक समाजसेवी संगठन से जुड़ गए और क्रिकेट छोड़कर उसी में पूरी तरह व्यस्त हो गए. हालाँकि वे कुछ और वक़्त तक खेल सकते थे.

हंट को कभी कोई स्थायी पार्टनर नहीं मिला. वेस्टइंडीज़ के दूसरे बड़े सलामी बल्लेबाज रॉय फ्रेड्रिक्स की भी यही कहानी रही. वे हंट के रिटायरमेंट के एक साल बाद टीम में आए और जब वे जाने को थे, तब गॉर्डन ग्रीनिज का आगमन हुआ. उन्हें जरूर हेंस मिले और उन दोनों की जोड़ी को दूसरे महायुद्ध के बाद की महानतम सलामी जोड़ी कहा जा सकता है.

दुनिया के किसी भी बल्लेबाज़ से, खासकर किसी पुराने दौर के बल्लेबाज़ से पूछा जाए कि उसके लिए सबसे डरावनी कल्पना क्या है तो शायद वह यही कहेगा कि पर्थ की तेज,उछाल लेती हुई पिच पर सुपरफास्ट गेंदबाजों का मुकाबला करना.

अब तो पर्थ की विकेट भी वैसी नहीं रही. और तमाम किस्म के कवच कुंडलों ने बल्लेबाज को भी सुरक्षित कर दिया है. वरना जिन्होंने वहां हेल्मेट और तमाम रक्षा कवचों के बिना लिली, थॉम्पसन का मुकाबला किया है, उसका अनुभव वे ही बता सकते है. और कुछ नहीं तो फ्रेड्रिक्स को इसलिए याद किया जाएगा कि उन्होंने लिली और थॉम्पसन के खिलाफ पर्थ में लगभग टी-20 के अंदाज में शतक बना कर टेस्ट मैच जिताया था.

उन्होंने 169 रन बनाए जिसमें से पहले सौ रन उन्होंने सिर्फ 71 गेंदों में बनाए. फ्रेड्रिक्स हुक करने में उस्ताद बल्लेबाज थे. खैर, सलामी बल्लेबाजों की लंबी कहानी अभी बहुत सारी बाकी है.

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