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संडे स्पेशल: क्या नंबर वन होने के साथ अजेय भी बन सकती है टीम इंडिया?

संभावनाएं तो इस टीम में हैं, लेकिन उसे कई मंजिलें अभी पार करनी हैं

Rajendra Dhodapkar Updated On: Oct 08, 2017 11:59 AM IST

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संडे स्पेशल: क्या नंबर वन होने के साथ अजेय भी बन सकती है टीम इंडिया?

पहली बार ऐसा हुआ है कि भारतीय क्रिकेट टीम टेस्ट और वनडे की आईसीसी रैंकिंग में पहले नंबर पर है. यह रैंकिंग किसी संयोग से नहीं मिली है और भारतीय टीम का प्रदर्शन पिछले कुछ वक्त में इतना अच्छा हुआ है कि भारतीय क्रिकेटप्रेमियों को भारतीय टीम के जीतने की आदत  सी हो गई है.

अब सवाल यह है कि क्या यह टीम दुनिया की महानतम अजेय टीमों में अपनी जगह बना सकती है? यह सवाल पूछना थोड़ी जल्दबाजी है, लेकिन फिर भी इस पर थोड़ी चकल्लस करने में हर्ज क्या है? संभावनाएं तो इस टीम में हैं इसलिए यह देखना होगा कि इसे कितनी मंजिलें अभी पार करनी हैं. इस बहाने महान टीमों की खासियतें क्या थीं यह भी ज़रा देख लिया जाए.

दूसरे महायुद्ध के बाद जिन टीमों ने अपनी महानता के झंडे गाड़े हैं उनमें दो खासियतें थीं. पहली वे हर परिस्थिति में अच्छा प्रदर्शन कर सकती थीं, जाहिर है इस टीम की श्रेष्ठता की बड़ी  परीक्षा विदेशी धरती पर होगी. अगर यह  टीम भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर भी अजेय रह पाई तो इसे एक बड़ी कसौटी पर खरा उतरा हुआ माना जाएगा. अभी दुनिया में जितनी भी मजबूत टीमें हैं, वे अपनी परिस्थितियों के बाहर कमजोर साबित होती हैं. इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया सभी टीमों का ताजा रिकॉर्ड यही बताता है.

अगर भारतीय टीम बाहर अच्छा खेल गई तो वह इन सभी टीमों से एक दर्जा ऊपर मानी जाएगी. दूसरी बड़ी कसौटी है लंबे वक्त तक सबसे ऊपर की पायदान पर बने रहना. एक दो साल श्रेष्ठ प्रदर्शन से कोई टीम महान नहीं बनती. जाहिर है इस बात की परीक्षा तो वक्त के साथ ही होती है, तो देखते हैं.

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डॉन ब्रैडमैन की टीम थी "द इनविंसिबल"

दूसरे महायुद्ध के बाद जिस टीम को पहली बार अजेय होने का खिताब मिला वह थी डॉन ब्रैडमैन के नेतृत्व में 1948 में इंग्लैंड गई टीम. इस टीम को "द इनविंसिबल" इसलिए कहा गया कि यह ऐसी पहली टीम थी जो इंग्लैंड के दौरे पर एक भी मैच नहीं हारी थी. याद रहे उस जमाने में दौरे पर टेस्ट मैचों से दोगुने प्रथम श्रेणी मैच खेले जाते थे और इतने सारे मैचों में अपराजित रहना बड़ी चुनौती थी. ब्रैडमैन की उस टीम में ब्रैडमैन के अलावा लिंडसे हैसेट, नील हार्वे, कीथ मिलर, रे लिंडवाल, इयान जॉनसन, बिल जॉनस्टन जैसे दिग्गज खिलाड़ी थे. जिन्हें  ऑस्ट्रेलिया के महानतम खिलाड़ियों में गिना जाता है. लेकिन इस टीम में ब्रैडमैन समेत कई ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होने विश्वयुद्ध के पहले खेलना शुरू किया था और  जिनके करियर के सात-आठ साल विश्वयुद्ध की भेंट चढ़ गए थे और जो रिटायर होने वाले थे. खुद ब्रैडमैन की उम्र लगभग चालीस की थी और इसी दौरे में उन्होंने अपना आखिरी टेस्ट मैच खेला.

वॉरेल और सोबर्स की टीम ने किया लंबे समय तक राज

ऐसी पहली टीम जिसने लंबे वक्त तक राज किया वह थी सर फ्रैंक वॉरेल और उसके बाद सोबर्स की कप्तानी वाली वेस्टइंडीज टीम जिसका राज लगभग पूरे साठ के दशक पर चला. वॉरेल को 1961 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर कप्तानी मिली और उन्होंने विभिन्न देशों के प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को एक टीम की तरह खेलना सिखाया. तब बाकी दोनों "डब्ल्यू" यानी वीक्स और वॉलकॉट रिटायर हो गए थे, लेकिन कॉनराड हंट, रोहन कन्हाई, जो सॉलोमन, बेसिल बुचर जैसे बल्लेबाजों, वेस्ली हॉल, चार्ली ग्रिफिथ, लांस गिब्स जैसे गेंदबाजों और सबसे ऊपर सोबर्स नामक पॉवरहाउस ने ऐसी टीम बनाई जिसका डंका लगभग एक दशक तक बजता रहा. इस टीम ने वेस्टइंडियन अंदाज के क्रिकेट को दुनिया भर में प्रतिष्ठा दिलवाई जिसमें मौलिकता,आक्रामकता और पेशेवर कौशल के साथ ही एक बेफिक्री और आनंद का तत्व भी था. यह ऐसी टीम थी जो दूसरे देशों में जाकर सिर्फ़ मैच नहीं, दर्शकों के दिल भी जीतती थी.

Frank Worrell, left, and Garfield Sobers coming out to bat during the Third England vs West Indies Test at Trent Bridge, Nottingham, July 1957. (Photo by Central Press/Hulton Archive/Getty Images)

इस दशक के ढलते-ढलते ग्रिफिथ बाहर हो गए, हॉल को चोटों की वजह से रिटायर होना पड़ा. हंट, बुचर और सेम्योर नर्स भी रिटायर हो गए. सोबर्स और कन्हाई चार -पांच साल और खेलते रहे, लेकिन बाकी टीम में आना जाना लगा रहा. भारत के 1971 के ऐतिहासिक वेस्टइंडीज दौरे पर पांच टेस्ट मैचों में बाईस खिलाड़ियों को वेस्टइंडीज ने आज़माया, जिनमें से खुद क्लाइव लॉयड को छोड़ कर कोई भी लॉयड की अजेय टीम का हिस्सा नहीं बन पाया.

लॉयड ने रखी वेस्टइंडीज के वर्चस्व की दूसरी पारी की नींव

1974 के भारत दौरे पर वेस्टइंडीज के वर्चस्व की दूसरी पारी की नींव रखी गई. दो बल्लेबाजों गॉर्डन ग्रीनिज,विवियन रिचडर्स और तेज गेंदबाज एंडी रॉबर्ट्स के करियर का यह आगाज था जो वेस्टइंडीज की दिग्विजय में बड़ी भूमिका निभाने वाले थे. लॉयड की रणनीति का केंद्र चार तेज गेंदबाज थे जो किसी भी विकेट पर सामने वाली टीम को धराशाई कर सकते थे. लॉयड को इस रणनीति पर इतना भरोसा था कि उन्होंने पांचवे गेंदबाज़ की जरूरत कभी महसूस नहीं की और भारतीय उपमहाद्वीप की धीमी विकेटों पर भी उन्हें किसी स्पिनर की दरकार नहीं हुई. यह वेस्टइंडियन बुलडोजर लगभग डेढ़ दशक तक दुनिया भर की क्रिकेट टीमों को रौंदता रहा.

इसके कुछ वक्त बाद ऑस्ट्रेलियाई वर्चस्व की शुरुआत एलन बॉर्डर के दौर में शुरू हुई जो रिकी  पॉंटिंग के दौर तक चली.

इन टीमों के पास थे महान गेंदबाज

इन सारी दिग्विजय टीमों की खासियत यह तो थी ही कि उनके पास महान खिलाड़ी, खासकर महान गेंदबाज थे. गेंदबाजी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बीस विकेट सस्ते में निकालने का काम गेंदबाज ही कर सकते हैं और सामने वाली टीम में खौफ़ भी पैदा गेंदबाजी से ही होता है. दुनिया में किसी भी स्तर पर विजेता टीमें अच्छे गेंदबाजों से ही चली हैं. महायुद्ध के बाद इंग्लैंड में मिडिलसेक्स या साठ और सत्तर के दशक में मुंबई अपवाद हैं जो बल्लेबाजी के दम पर घरेलू क्रिकेट में छाए रहे. सहवाग, द्रविड़, तेंदुलकर,गांगुली और लक्ष्मण वाली भारतीय टीम की बल्लेबाजी इन विश्वविजेता टीमों जितनी ही अच्छी थी, लेकिन तब सामने वाली टीमों को रौंदने वाले गेंदबाज नहीं थे. जाहिर है गेंदबाजों का खौफ बनाए रखने के लिए बहुत अच्छी फील्डिंग की भी जरूरत है.

MUMBAI, INDIA - NOVEMBER 5: Cricket legend Sachin Tendulkar with his former teammates Sourav Ganguly, Rahul Dravid and VVS Laxman at the launch of his autobiography "Playing It My Way" on November 5, 2014 in Mumbai, India. The nicknamed the fabulous four, together they formed one of strongest battling line up ever. The book is co-authored by Boria Majumdar. (Photo by Satish Bate/Hindustan Times via Getty Images)

कभी आक्रामक होकर नहीं खेले अंग्रेज

इस सबके अलावा यह भी महत्वपूर्ण है कि ये सारी टीमें बहुत आक्रामक क्रिकेट खेलती थीं. इनकी एकमात्र रणनीति आक्रमण और सिर्फ आक्रमण हुआ करती थी. इनका उद्देश्य सामने वाली टीम को सिर्फ़ हराना नहीं,बुरी तरह हराना होता था. यह आक्रामक मानसिकता और सिर्फ जीत को लक्ष्य बनाना सचमुच नंबर एक टीम बनाने के लिए जरूरी है. पचास और साठ के दशक में इंग्लैंड की टीम हमेशा अच्छी रही और उसका प्रदर्शन भी अच्छा ही था, लेकिन उसका ऐसा आतंक कभी नहीं था, जैसे वेस्टइंडीज का या ऑस्ट्रेलिया का था.

इसकी वजह शायद यही थी कि अंग्रेज कभी वैसे खुलकर आक्रामक खेल नहीं खेले जैसे वे खेल सकते थे. क्या हम सोच सकते हैं कि पीटर मे, टॉम ग्रेवेनी, टेड डेक्स्टर, डेविड शेपर्ड और कॉलिन काउड्रे जैसे बल्लेबाजों की और ट्रूमन, स्टेथम, टिटमस और जिम लेकर जैसे गेंदबाजों की टीम धीमा खेलने का रिकॉर्ड बनाएगी जैसा उसने 1956 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर बनाया था.

अंग्रेज़ अक्सर ही नकारात्मक और धीमे खेलने का रिकॉर्ड बनाते रहे हैं. इससे वे कई बार हारने से बचते रहे, लेकिन वे विश्वविजेता कभी नहीं बने. उन पर टेस्ट क्रिकेट को उबाऊ बनाने और दर्शकों को मैदान से दूर रखने का आरोप भी लगा. जो विश्वविजयी टीमें रही हैं वे अपनी आक्रामकता के चलते दो ही विकल्प रखती थीं, हार या जीत. इस रवैये के चलते वे कभी-कभार हार भी गईं,  लेकिन जीतीं ज्यादा बार.

अब देखना है क्या विराट कोहली की टीम इन कसौटियों पर भविष्य में खरी उतरेगी. अच्छी बात यह है कि उसका इरादा ऐसा करने का है.

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