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संडे स्पेशल: घूमती हुई गेंद के खिलाफ कमजोर हुए हैं बल्लेबाज

मुश्किल हालात में खेलने का कौशल घटा है, लेकिन क्रिकेट ज्यादा तेज और आक्रामक हुआ है

Rajendra Dhodapkar Updated On: Dec 10, 2017 12:44 PM IST

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संडे स्पेशल: घूमती हुई गेंद के खिलाफ कमजोर हुए हैं बल्लेबाज

हम जैसे छोटे शहर के लोगों ने ऊंचे दर्जे का क्रिकेट अस्सी के दशक में टेलीविजन के प्रसार के बाद ही देखा. हमारे शहर भोपाल में नवाब मंसूर अली खान पटौदी अपने पिता इफ्तिखार अली खान पटौदी की याद में एक क्रिकेट टूर्नामेंट करवाया करते थे. यह टूर्नामेंट, गंभीर प्रतियोगिता कम, कुछ प्रदर्शनी मैचों का एक आयोजन ज्यादा होता था, जिसमें पटौदी काफी बड़े खिलाड़ियों को बुलाया करते थे. हमने हनुमंत सिंह, जयसिम्हा, सुनील गावस्कर, बिशन सिंह बेदी, चंद्रशेखर जैसे खिलाड़ियों को इसी टूर्नामेंट में देखा, लेकिन यह गंभीर क्रिकेट नहीं था. किसी विदेशी टीम के भारत आने पर उसका कोई प्रथम श्रेणी मैच इंदौर में होता था वह देखने कभी-कभी हम चले जाते थे, लेकिन सचमुच के आला दर्जे के क्रिकेट से हमारा परिचय कमेंट्री के जरिए ही होता था. इसलिए जो बल्लेबाजी के उपकरणों में सुधार और बदलाव हुए हैं उन्हें कमेंट्री में हुए बदलाव से भी समझा जा सकता है.

बैट एंड पैड टुगेदर

पहले रेडियो पर कमेंट्री में एक वाक्य नियमित रूप से सुना जाता था वह अब सुनाई नहीं देता. पहले जब बल्लेबाज फॉरवर्ड डिफेंसिव खेलता था तो कमेंटेटर कहता था, बैट एंड पैड टुगेदर. यह टीवी आने के बाद भी होता था कि अगर आगे बढ़कर खेलने में बल्ले और पैड के बीच जगह होती तो कमेंटेटर इसे ऐसे बताता जैसे कोई बड़ी तकनीकी भूल हो गई हो. बैट और पैड के बीच की जगह से अगर गेंद निकल गई तब तो इसका जिक्र बार-बार होता. और इस तरह बल्लेबाज का बोल्ड हो जाना तो आउट होने का सबसे बुरा तरीका माना जाता था.

नहीं बचा फॉरवर्ड डिफेंसिव स्ट्रोक

इन दिनों बैट एंड पैड टुगेदर का खास कोई मतलब नहीं बचा. इसका जिक्र भी कमेंट्री में नहीं होता, बल्कि एक जमाने में फारवर्ड डिफेंसिव स्ट्रोक जैसा होता था, वैसा ही नहीं बचा. कोचिंग की पुरानी किताबों में लिखा जाता था कि डिफेंस स्ट्रोक के बाद गेंद को बल्ले के सामने गीले स्पंज की तरह वही गिर जाना चाहिए, जरा भी लुढ़कना नहीं चाहिए.

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अब नए किस्म के बल्लों की वजह से गेंद का इस तरह वहीं गिर पड़ना मुश्किल है, इसके अलावा बल्लेबाजों की मानसिकता भी गेंद को पुश करने यानी धकेलने की हो गई है. यह सीमित ओवरों के खेल में असर में आई आक्रामकता की वजह से है, लेकिन इससे खिलाड़ियों का डिफेंसिव खेल कमजोर हुआ है, खासकर स्पिन के खिलाफ. नए दौर में स्पिन गेंदबाजों के फिर से कामयाब होने की एक वजह यह भी है.

टेस्ट में एक दिन में तीन सौ रन बनना हुआ आम

एक मुहावरा जिसने बैट एंड पैड टुगेदर की जगह ली है वह है मेकिंग द रूम या जगह बनाना. अब क्योंकि खेल ज्यादा आक्रामक हुआ है इसलिए शॉट खेलने के लिए बल्ले और शरीर के बीच जगह बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. यानी बल्ले के पैड के साथ रहने के बजाए दोनों के बीच अंतर बनाना नई तकनीक का हिस्सा है जो कि रक्षात्मक खेल में भी आ गया है. इसलिए किसी भी तरह से घूमती हुई गेंद, चाहे वह स्विंग या कट हो रही हो या स्पिन हो रही हो, उसके खिलाफ बल्लेबाज कमजोर हुए हैं. इसके चलते मुश्किल हालात में खेलने का कौशल घटा है. लेकिन मुश्किल पिचें भी कम हुई हैं और क्रिकेट ज्यादा तेज और आक्रामक हुआ है. अच्छी बात यह है कि टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में तीन सौ रन बनना आज आम बात हो गई है, हमने वे दिन भी देखे हैं जब दिन में दो सौ रन बनना भी मुश्किल होता था.

बैकफुट का खेल कम हुआ

एक बड़ा फर्क जो देखने में आया है वह बैकफुट खेलने में है. अब सचमुच बैकफुट का खेल कम हो गया है. ज्यादातर खिलाड़ियों की पहली या बुनियादी प्रवृत्ति आगे जाने की होती है और अगर गेंद शॉर्ट होती है, तो वे सिर्फ पिछले पैर पर अपना वजन डाल लेते हैं. पहले यह वीरता सिर्फ विवियन रिचर्ड्स जैसे बहादुर दिखा पाते थे. अब हैलमेट और तमाम रक्षात्मक उपकरणों के साथ ग्यारहवें नंबर का खिलाड़ी भी ऐसा कर लेता है. पहले खिलाड़ी बैकफुट पर ज्यादा खेलते थे, बल्कि तमाम नामी खिलाड़ी मूलत: बैकफुट के खिलाड़ी थे.

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सीएलआर जेम्स लिखते हैं कि डॉन ब्रैडमैन और ब्लैक ब्रैडमैन के नाम से मशहूर  जॉर्ज हैडली दोनों मूलत: बैकफुट बल्लेबाज थे. दरअसल जब इतने रक्षात्मक उपकरण नहीं होते थे और पिचें भी इतनी सपाट नहीं होती थीं तब बैकफुट पर खेलना ज्यादा मुफीद था, क्योंकि एक कदम पीछे खेलने पर थोड़ा ज्यादा समय गेंद की गति और उछाल को देखने के लिए मिल जाता है और शरीर के बहुत नजदीक खेलने से गेंद बेहतर ढंग से खेली जाती है. जब गेंद की उछाल और दिशा निश्चित हो तो गेंद की लाइन देखकर, आगे पैर बढ़ाकर गेंद की लाइन में बल्ला चला देना कामयाब रणनीति होती है जो कि आजकल के ज्यादातर बल्लेबाज अपनाते हैं. गेंदबाज भी समझ गए कौन से नुस्खे ज्यादा कारगर

क्रिकेट ज्यादा आक्रामक होने से आकर्षक तो हुआ है, लेकिन अच्छी बात यह हुई है कि अब गेंदबाजों को भी यह समझ में आ गया है कि गेंदबाजी के कौन से नुस्खे ज्यादा कारगर होंगे. बीच में एक दौर यह था जब लोग सोचते थे कि नए दौर के क्रिकेट में गेंदबाज का काम यथासंभव रक्षात्मक होना है. इसी दौर में तेज गेंदबाजों ने अपनी गेंदों की लेंग्थ थोड़ी छोटी कर ली थी और कई प्रतिभाशाली स्पिनर फ्लाइट करना खतरनाक मान चुके थे. लेकिन धीरे-धीरे तेज गेंदबाजों को समझ में आया कि लेंथ को आगे रखकर ज्यादा स्विंग हासिल करना ज्यादा मुफीद है और स्पिनर तो टी-ट्वेंटी में भी गेंद को फ्लाइट देने लगे. क्रिकेट संगठनों को भी यह समझ में आ रहा है कि खेल बल्लेबाजों के पक्ष में ज्यादा झुक गया है और यह खेल के हित में नहीं है इसलिए वे भी कुछ बदलाव कर रहे हैं. ठीक-ठीक संतुलन तो कभी कहीं नहीं होता, लेकिन उसकी कोशिश तो होती ही रहनी चाहिए.

 

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