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प्रिंस ऑफ कोलकाता को क्यों बताए जाने की जरूरत है कि 'दिस इज नॉट एनफ'

सौरव गांगुली की किताब अ सेंचुरी इज नॉट एनफ उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Mar 01, 2018 11:08 AM IST

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प्रिंस ऑफ कोलकाता को क्यों बताए जाने की जरूरत है कि 'दिस इज नॉट एनफ'

कप्तान के तौर पर सौरव गांगुली टीम इंडिया में तब आए थे, जब घना अंधियारा था. फिक्सिंग की कालिख में टीम इंडिया पुती हुई थी. गांगुली उस वक्त आए और वहां से भारतीय क्रिकेट को ऊंचाइयां दीं, विदेश में जीतने का भरोसा दिया. टीम को चैंपियन बनाया. इसीलिए जब पता चला कि सौरव की किताब आ रही है, तो उम्मीद थी कि भारतीय क्रिकेटरों की निराश करने वाली किताबों के बीच यह अपना अलग मुकाम बनाएगी. अफसोस, सौरव इसमें बुरी तरह फेल हुए हैं

सौरव की किताब अ सेंचुरी इज नॉट एनफ उस परंपरा को ही आगे बढ़ाती है, जिसमें अपने बारे में बुरा न लिखना.. उस क्लब के बारे में बुरा न लिखना, जिनसे कभी काम पड़ सकता है, नियमों का हिस्सा है. ज्यादातर भारतीय क्रिकेटरों की ऑटोबायोग्राफी में ध्यान रखा जाता है कि ऐसे किसी शख्स की आलोचना न की जाए, तो भविष्य में कभी पावरफुल हो सकता है. उस परंपरा को गांगुली ने कायम रखा है.

जीवनी या खुद की किताब में माना जाता है कि आप खुद से जुड़ी उन कमियों को भी ईमानदारी से सामने रखेंगे, जिन्होंने आपको नुकसान पहुंचाया. या जो कमियां जीवन का हिस्सा रही हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि भारतीय क्रिकेटर नहीं मानते कि उनमें कभी कोई कमी रही है.

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सौरव गांगुली की किताब में उम्मीद थी कि 1991-92 के उस दौरे का जिक्र करेंगे, जब उन्होंने मैदान पर पानी ले जाने से मना कर दिया था. जिक्र है, लेकिन उस दौरे से जुड़े लोगों ने जो कुछ बताया, उससे अलग है. उनसे उम्मीद थी कि वो मैच फिक्सिंग के उस दौरे से निकलने के लिए टीम को मानसिक तौर पर कैसे तैयार किया, उस पर चर्चा करेंगे. लेकिन यहां वो सरसरे तौर पर जिक्र करते हुए आगे निकल गए हैं.

सचिन की कप्तानी से जुड़े विवादों से दूर रहे गांगुली

उन्हीं के दौर में सचिन तेंदुलकर ने हताशा में कप्तानी छोड़ी थी. उम्मीद थी कि वो उस मामले में कुछ नया बताएंगे. वो भी नहीं है. ग्रेग चैपल प्रकरण में कुछ और बातें सामने आएंगी. कुछ आई हैं. लेकिन जो बातें सौरव पिछले कई सालों से कह रहे हैं, उनमें कुछ खास इजाफा नहीं करतीं. कतई उम्मीद नहीं थी कि नगमा का जिक्र होगा. नहीं हुआ. उन्होंने स्टीव वॉ को कैसे परेशान किया, उसका जिक्र तो है. लेकिन यह नहीं कि टॉस पर जाते हुए या बैटिंग पर आते हुए ऑस्ट्रेलियन टीम उन्हें किस तरह स्लेज करती थी. 2001 के उस दौरे में नगमा के इर्द-गिर्द गांगुली की स्लेजिंग हुई थी. हालांकि हम उम्मीद नहीं कर सकते कि सौरव उस पर चर्चा करते.

घटना का जिक्र, नामों का नहीं

वो जिस पर चर्चा कर सकते थे, उस पर भी नहीं की है. जैसे किताब में 1991-92 के ऑस्ट्रेलिया दौरे का जिक्र है. इसमें उन्होंने बताया है कि एक बड़े खिलाड़ी ने उन्हें अपनी राय बताई. उन्होंने बताया कि वो नहीं मानते कि सौरव की जगह टीम में बनती थी. उनके मुताबिक दिल्ली के एक खिलाड़ी को टीम में होना चाहिए था. सौरव ने न तो उस दिग्गज का नाम लिखा. न दिल्ली के खिलाड़ी का. क्रिकेट पत्रकार को समझ आ जाएगा. लेकिन किताब सिर्फ पत्रकारों के लिए नहीं होती. अगर आप क्रिकेट प्रेमियों के लिए किताब लिख रहे हैं, तो उनका नाम आना ही चाहिए था. अगर लगता है कि नाम देना ठीक नहीं है, तो उस किस्से से बचना चाहिए. ऐसी कई घटनाएं किताब में हैं, जहां पढ़ते हुए लगता है कि अगर नाम नहीं ले सकते, तो उस घटना को लिखना ही क्यों.

कहीं भी अपनी तारीफ करने का मौका नहीं भूले

हर जगह जहां सौरव ने अपनी निराशा जताई है, वहां वो जिक्र करना नहीं भूले कि वो हैं कौन. जैसे उन्हें वनडे सीरीज से बाहर किया. वहां उन्होंने बाकायदा जिक्र किया कि वो सौरव गांगुली, जिसने पिछले साल या पिछली सीरीज में इतने रन बनाए थे. जहां ग्रेग चैपल के विवाद का जिक्र है, वहां बार-बार वो बताना नहीं भूलने कि यह वही सौरव गांगुली हैं, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को इतनी ऊंचाई तक पहुंचाया. जहां आईपीएल का जिक्र है, वहां वो बताना नहीं भूले कि जिस युवराज को उन्होंने एक तरह से उंगली पकड़ के चलना सिखाया, वो अब उनका कप्तान है. कुछ जगहों पर वैसी भाषा नहीं है. लेकिन उसका मतलब वही है. greg-chappell-sourav-ganguly

कुछेक जगह समझ आता है, जब आप अपनी तारीफ करते हैं. लेकिन अगर हर पेज पर ऐसी कोई लाइन मिले, तो झल्लाहट होने लगती है. कम से कम सौरव को इतना भरोसा तो होना चाहिए कि लोगों को भारतीय क्रिकेट में उनका योगदान अच्छी तरह याद होगा. यह किताब आई, मी, माइसेल्फ जैसी दिखने लगती है. जो लोग सौरव के फैन नहीं हैं, उन्हें हो सकता है कि इससे फर्क न पड़े. लेकिन एक कट्टर सौरव फैन उनसे ईमानदारी चाहेगा. वो चाहेगा कि सौरव उसे भी तारीफ का मौका दें. खुद ही अपनी तारीफ में सब कुछ न कह लें.

मानसिक तैयारी पर कुछ रोचक हिस्से हैं किताब में

किताब में कुछ रोचक हिस्से हैं. जैसे डेसमंड हेंस और इमरान खां ने सौरव की जिस तरह मदद की, वो रोचक है. सिर्फ क्रिकेटर ही नहीं, जिंदगी की हर फील्ड में लोग उस सलाह से फायदा उठा सकते हैं, जो हेंस या इमरान ने उन्हें दी. चैपल से क्रिकेट सीखने का जिक्र है, जिसमें सीखने के बहाने वो रेकी भी करना चाहते थे. हालांकि यह बात भी तमाम अखबार पहले छाप चुके हैं.

पाकिस्तान दौरे का जिक्र रोचक है. शायद यही वो चैप्टर है, जहां वो अपनी तारीफ से अलग, पूरी तरह घटनाओं पर आधारित बातें लिख रहे थे. पाकिस्तान के खिलाफ मुकाबले में जावेद मियांदाद का जिक्र है. मियांदाद कोच थे. एक मैच में वो ड्रेसिंग रूम से हिदायत दे रहे थे. उस हिदायत के हिसाब से सौरव ने कैसे मैदान के भीतर अपने खेल को एडजस्ट किया और कैसे मोइन खान ने कुछ देर बाद भांप लिया, वो किस्सा रोचक है. वह भी रोचक है, जब सिक्योरिटी तोड़कर सौरव लाहौर के अनारकली बाजार में खाना खाने गए थे. वहां बीजेपी मंत्री रवि शंकर प्रसाद के साथ आए पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने उन्हें पहचान कर आवाज लगाना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से वो फंस गए.

तस्वीर- यूट्यूब स्क्रीन ग्रैब

तस्वीर- यूट्यूब स्क्रीन ग्रैब

हालांकि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की हिदायत के बारे में वो पहले भी कई इंटरव्यू में बता चुके हैं. लेकिन यहां एक किस्सा वो भी है, जब मुशर्रफ ने उनसे कहा कि आप इस तरह सिक्योरिटी तोड़कर बाहर न जाया करें. मानसिक तौर पर कैसे तैयार होना है, इसे लेकर कुछ रोचक बातें हैं. लेकिन कुल मिलाकर अगर किताब के लिहाज से देखें, तो अ सेंचुरी इज नॉट एनफ का टाइटल थोड़ा बदला जा सकता है. यहां कहा जा सकता है दिस इज नॉट एनफ.

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