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संडे स्पेशल: बुमराह और मयंक जैसे खिलाड़ी सबूत हैं कि भारत का घरेलू स्तर कितना सुधरा है

अब हर स्तर पर प्रतिस्पर्धा बहुत तगड़ी है और सुविधाएं भी बेहतर हैं इसलिए घरेलू क्रिकेट का स्तर काफी ऊंचा हो गया है

Updated On: Jan 13, 2019 07:57 AM IST

Rajendra Dhodapkar

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संडे स्पेशल: बुमराह और मयंक जैसे खिलाड़ी सबूत हैं कि भारत का घरेलू स्तर कितना सुधरा है

तीसरे टेस्ट के पहले पूर्व ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज कैरी ओ'कीफ ने मयंक अग्रवाल के रणजी ट्रॉफी में तिहरे शतक पर तंज कसा कि शायद उन्होंने रेलवे कैंटीन के स्टाफ के खिलाफ यह तिहरा शतक बनाया होगा. बहरहाल अपनी बल्लेबाजी से मयंक अग्रवाल ने ओ'कीफ को सटीक उत्तर दिया और उसके बाद विराट कोहली ने भारतीय घरेलू क्रिकेट के तंत्र की बड़ी तारीफ की. यह सच है कि भारतीय क्रिकेट तंत्र में काफी अराजकता, राजनीति और भ्रष्टाचार है जैसा कि भारत के हर तंत्र में है, तब भी भारतीय घरेलू क्रिकेट में बहुत दम है और उसकी चक्की से पिस कर खिलाड़ी का असली हुनर निखरता है. पिछले कुछ दशकों से यह तंत्र ज्यादा समावेशी हुआ है और इससे दूरदराज के गांवों, कस्बों और शहरों के प्रतिभावान खिलाड़ी सामने आ रहे हैं.

पहले छोटे शहरों से नहीं आते थे खिलाड़ी 

एक दौर में भारतीय घरेलू क्रिकेट कुछेक शहरों तक महदूद था. मुंबई, दिल्ली, चेन्नई जैसे शहरों को छोड़ भी दें तो अन्य राज्यों की टीमें भी एकाध शहर के खिलाड़ियों से भरी होती थीं, जैसे मुझे याद है मध्य प्रदेश की टीम में लगभग दस खिलाड़ी इंदौर से होते थे. एकाध मैच में एकाध खिलाड़ी भोपाल या भिलाई से होता भी था तो वह बेचारा अपने आप को अजनबी और उपेक्षित पाता था. यह तब की बात थी जब रणजी ट्रॉफी क्षेत्रीय आधार पर होती थी और हर क्षेत्र से दो टीमें नॉकआउट दौर में पहुंचती थीं. तब मध्य प्रदेश की टीम कभी कभार ही नॉकआउट दौर तक जा पाती थी. जब अस्सी के दशक में स्थिति बदलने लगी तो मध्य प्रदेश के तमाम शहरों के खिलाड़ी टीम में आने लगे और टीम का प्रदर्शन भी बेहतर हुआ. कायदे से मध्य प्रदेश से पहले टेस्ट खिलाड़ी राजेश चौहान थे जो रायपुर के थे, नरेंद्र हिरवानी गोरखपुर के थे जो क्रिकेट खेलने इंदौर आए थे.

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एक जमाना वह था जब दिल्ली के टेस्ट खिलाड़ी को भी भारतीय टीम में वैसा ही महसूस होता होगा जैसा किसी कस्बे के खिलाड़ी को किसी रणजी ट्रॉफी टीम में लगता होगा. दिल्ली में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की कमी नहीं थी, लेकिन आज से चालीस-पचास साल पहले कितने दिल्ली के खिलाड़ी भारतीय टीम के नियमित सदस्य बन पाए? लेकिन आज दिल्ली ही नहीं छोटे-छोटे शहरों से कितने लोग भारतीय टीम में खेल रहे हैं.

गेंदबाजों की बात करें तो जसप्रीत बुमराह ने टीम के लिए अहम योगदान दिया है. उन्होंने इस सीरीज में 2.18 के एकनॉमी रेट से 21 विकेट झटके हैं. उन्होंने मेलबर्न टेस्ट की दूसरी पारी में 33 रन देकर छह विकेट हासिल किए जो टीम की जीत में बेहद अहम रहे. मेलबर्न टेस्ट में नौ विकेट लेने वाले बुमराह ने इस साल 78 विकेट लिए जिसके साथ वह इस साल के कैलेंडर इयर में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज गए हैं

भारतीय क्रिकेट भारत की विविधता का आइना है. गुजरात में बसे हुए पंजाबी निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से आए हुए जसप्रीत बुमराह आजकल भारत के सबसे सफल गेंदबाज हैं. भारतीय एक दिवसीय टीम के उपकप्तान रोहित शर्मा मुंबई के हैं, लेकिन मराठी परिवार के नहीं हैं, मूलत: उनका परिवार आंध्र का है. मुंबई के सूर्यकुमार यादव और श्रेयस अय्यर भी मराठी नहीं हैं. बंगाल की टीम के दो सबसे सफल बल्लेबाज अभिमन्यु ईश्वरन और मनोज तिवारी हैं जो बंगाली नहीं हैं. मोहम्मद शमी उत्तर प्रदेश के हैं और वह भी क्रिकेट बंगाल से खेलते रहे हैं. महेंद्र सिंह धोनी पहाड़ी हैं जिनका परिवार झारखंड में बसा हुआ है. अब खिलाड़ी चाहे उत्तर प्रदेश के कस्बे से आए या गुजरात के किसी गांव से, वह भारतीय टीम में अजनबी या बाहरी महसूस नहीं करता होगा.

सुधरा है भारतीय घरेलू क्रिकेट का स्तर

भारतीय घरेलू क्रिकेट के बारे में यह कभी कहा जाता रहा है कि उसका स्तर बहुत अच्छा नहीं है, लेकिन अब ऐसा नहीं कहा जा सकता. अब हर स्तर पर प्रतिस्पर्धा बहुत तगड़ी है और सुविधाएं भी बेहतर हैं इसलिए घरेलू क्रिकेट का स्तर काफी ऊंचा हो गया है. अगर हम ध्यान से देखें तो पाएंगे कि इस कड़ी प्रतिस्पर्धा में बने रहना और लगातार अच्छा प्रदर्शन करना बहुत मुश्किल है.

ऑस्ट्रेलिया जैसे देश के लोगों को सवा सौ करोड़ के देश की और उसके खेल तंत्र की जटिलताओं और बारीकियों को समझना बहुत मुश्किल है. इतने बड़े देश में ऑस्ट्रेलिया की शैफील्ड शील्ड जैसी पांच टीमों की प्रतियोगिता नहीं चल सकती. उनके लिए यह समझना भी मुश्किल होगा कि भारत में रेलवे का क्या महत्व है. वे नहीं जान सकते कि भारत के जीवन में रेलवे की भूमिका कितनी बड़ी है. या ये कि एक वक्त में रेलवे का बजट आम बजट जितना बड़ा होता था और अभी तक रेलवे बजट, आम बजट से अलग पेश किया जाता था.

vidarbha ranji trophy champion

कैरी ओ'कीफ यह भी नहीं जान सकते कि भारतीय रेलवे खेलों की कितनी बड़ी संरक्षक है और तमाम खेलों के कितने अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रेलवे में नौकरी करते हैं. और रेलवे की क्रिकेट टीम में रेलवे का कैंटीन स्टाफ नहीं, आला दर्जे के क्रिकेट खिलाड़ी खेलते हैं. भारतीय टीम के बल्लेबाजी कोच संजय बांगर भी रेलवे से खेलते थे और अभी कमेंट्री कर रहे मुरली कार्तिक भी रेलवे से खेलते थे और दोनों भारतीय टीम में खेल चुके हैं. खैर, ओ'कीफ किसी और पीढ़ी के खिलाड़ी हैं जो भारत के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया की नई पीढ़ी के खिलाड़ी यह जानते हैं कि अब भारतीय क्रिकेट को ठीक से जानना पहचाना किसी भी खिलाड़ी के लिए कितना जरूरी है.

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