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'दागदार' अज़हर के कीचड़ भरे एचसीए में उतरने पर हलचल

अज़हर के चुनाव में कूदने पर बंटी है लोगों की राय

T S Sudhir Updated On: Jan 13, 2017 06:35 PM IST

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'दागदार' अज़हर के कीचड़ भरे एचसीए में उतरने पर हलचल

17 साल पहले अज़हरुद्दीन क्रीज पर अकेले पड़ गए थे. 99 टेस्ट खेलने के बाद. अब उन्होंने शतक बनाने का फैसला किया है. वो भी हैदराबाद क्रिकेट एसोसिएशन (एचसीए) की कप्तानी करते हुए. क्रीज पर जमे हुए कई क्रिकेट प्रशासक लोढ़ा कमेटी की आक्रामक गेंदबाजी के आगे क्लीन बोल्ड हो चुके हैं. ऐसे में पूर्व भारतीय कप्तान को अपने मौके नजर आने लगे हैं. लेकिन एचसीए प्रमुख बनने के लिए कलाइयों की कलाकारी से कहीं ज्यादा कुछ चाहिए.

हैदराबाद क्रिकेट में लोग अज़हर के नाम पर बंटे हुए हैं. उन्हें साल 2000 में मैच फिक्संग के आरोप में आजीवन प्रतिबंधित किया गया था. ऐसे में अज़हर के आने से तमाम लोग नाखुश हैं. उनके दागदार अतीत को लेकर खुसुर-फुसुर की जा रही है.

हैदराबाद के एक पूर्व क्रिकेटर का कहना है, ‘एचसीए की बड़ी समस्या पदाधिकारियों की ईमानदारी है. पूर्वाग्रह और पैसों का लेनदेन खिलाड़ियों के चयन में रोल अदा करता है. ऐसे माहौल में अब एक पूर्व भारतीय कप्तान आने वाला है, जिसका नाम मैच फिक्सिंग में जुड़ा रहा है. हैदराबाद क्रिकेट को फैसला करना होगा कि क्या ऐसा व्यक्ति प्रशासनिक कामों के लिए सही है?’

पीआर मानसिंह हैं अज़हर के साथ

जो लोग अजहर के साथ हैं, उनमें 1983 की विश्व कप विजेता भारतीय टीम के मैनेजर पीआर मानसिंह भी हैं. उन्हें लगता है कि अजहर का एक कद है, जिसे नजरअंदाज नहीं कर सकते. मानसिंह कहते हैं, ‘वैसे भी आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 2012 में उन्हें मैच फिक्सिंग के आरोपों से बरी कर दिया था. उसके बाद बीसीसीआई ने उच्चतम न्यायालय में इसे चुनौती नहीं दी. ऐसे में उन्हें साफ-सुथरा माना जाना चाहिए.’

अजहर ने खुद भी माना है कि उनके दिमाग में काफी समय से था कि खेल प्रशासन में आना है. हैदराबाद के पूर्व क्रिकेटर विजय मोहन राज कहते हैं कि अब तक भले ही अजहर का हैदराबाद क्रिकेट से जुड़ाव बहुत कम रहा है, लेकिन उनका आना स्वागत करने लायक कदम है. राज कहते हैं, ‘वह न तो प्रशासनिक काम से जुड़े रहे, न ही कोचिंग से. लेकिन ऐसे आदमी का आना सुखद है, जो पावर सेंटर का हिस्सा न रहे हों. खेल उनके लिए जुनून जैसा है और वह सौ फीसदी कोशिश करते हैं.’

216 क्लबों में से किसी के सदस्य नहीं हैं अज़हर

जो लोग अज़हर का विरोध कर रहे हैं, वो तकनीकी आधार पर आपत्ति दर्ज करा रहे हैं. पहली बात कि वो वोटिंग अधिकार वाले 216 क्लब में से किसी के सदस्य नहीं हैं. एचसीए का नियम कहता है कि अध्यक्ष पद के लिए खड़ा होने वाला सदस्य कम से कम एक टर्म एक्जीक्यूटिव काउंसिल का सदस्य रहा हो. एक और टर्म पदाधिकारी के तौर पर रहे हों. अज़हर इन बातों पर खरे नहीं उतरते.

एचसीए के पूर्व अध्यक्ष और भारत के लिए खेले ऑफ स्पिनर अरशद अयूब कहते हैं, ‘हमारा कहना है कि बीसीसीआई ने उन पर जो आजीवन प्रतिबंध लगाया था, वो अब तक हटाया नहीं है. एचसीए बीसीसीआई के नियमों पर चलती है.’ लोढ़ा पैनल की सिफारिशों की वजह से अरशद अयूब को हटना पडड रहा है, जिसकी वजह से जगह बन रही है. अजहर के करीबी मोहम्मद खलीलुर्रहमान का अयूब के तर्कों पर कहना है कि बीसीसीआई देश की अदालत से ऊपर थोड़ी है.

2011 में पीआर मानसिंह ने की थी शिकायत

अज़हर का फोकस हैदराबाद क्रिकेट की गंदगी पर है. 2011 में मानसिंह ने संघ में चल रही गड़बड़ियों के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो में शिकायत दर्ज कराई थी. छह साल होने को आए, लेकिन यह मामला अब भी पूरा होता नहीं दिख रहा. मामले में 22 लोगों पर आरोप थे. इनमें ज्यादातर एचसीए के अधिकारी थे. अयूब का नाम भी शामिल था.

मानसिंह कहते हैं, ‘जांच के शुरुआत में एसीबी को हमारी शिकायत से ज्यादा ही मिला. एसीबी ने करीब 190 सवाल वित्तीय मामलों पर पूछे.’ एसीबी की जांच में 2004 से 2011 के बीच 87 करोड़ की गड़बड़ी का मामले का आरोप लगा. एचसीए सदस्य कहते हैं कि संघ भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का गढ़ है. राज कहते हैं, ‘क्रिकेटर अंबाति रायडू, प्रज्ञान ओझा, हनुमा विहारी, रवि तेजा हैदराबाद छोड़कर चले गए. क्यों? हर टीम में ऐसे चौकाने वाले खिलाड़ी लिए गए, जिनका प्रदर्शन बेहद औसत था.’

पूर्व क्रिकेटर बताते हैं कि भ्रष्टाचार की जड़ें बड़ी गहरी हैं. हैदराबाद के एक पूर्व बल्लेबाज का कहना है, ‘अगर आप औसत दर्जे के गेंदबाजी हैं, तो भी आपको मैच में लंबे स्पैल का मौका मिलेगा. बस, आपको लीग क्रिकेट के कुछ मैच के लिए 15 हजार रुपये खर्च करने पड़ेंगे. ऐसा ही कमजोर बल्लेबाजों के लिए है, जिन्हें इतने ही पैसों में बल्लेबाजी में ऊपर खेलने का मौका मिल सकता है.’

एक स्पिन गेंदबाज का उदाहरण दिया जाता है, जिसने 2011 के आसपास साधारण से प्रदर्शन के बाद क्रिकेट छोड़ी थी. एचसीए के एक सदस्य का नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘तमाम लोगों को चकित करते हुए वह हैदराबाद रणजी टीम में सीधे आ गए. दो सीजन खेले. अब उन्होंने फिर खेल छोड़ दिया है.’

पांच लाख रुपये घूस देने की हुई थी कोशिश

एक पूर्व सचिव ने उन्हें पांच लाख रुपये घूस दिए जाने की कोशिश का जिक्र किया. युवा क्रिकेटर के पिता ने हैदराबाद की पूर्व आईपीएल टीम डेक्कन चार्जर्स के लिए ये पैसे ऑफर किए थे. सचिव महोदय ने बताया, ‘मैंने उस आदमी को कमरे से बाहर भगा दिया. लेकिन मुझे अचंभा हुआ कि वही क्रिकेटर कुछ समय बाद रणजी ट्रॉफी खेल रहा था.’

ये सारी घटनाएं बताती हैं कि एचसीए में क्रिकेट प्राथमिकता नहीं रहा. एक समय भारतीय क्रिकेट को तमाम बड़े नाम देने वाले हैदराबाद के पास ऐसा कोई क्रिकेर नहीं है. मानसिंह कहते हैं, ‘क्रिकेट प्राथमिकता नहीं है. सिर्फ पैसे बनाना प्राथमिकता है. फर्जी बिल जमा किए जाते हैं. यहां तक कि कैटरिंग के बिल फर्जी होते हैं. 700 लोगों के लिए खाना बनवाया जाता है और बिल दिया जाता है 1100 लोगों का.’

एचसीए की एक अजीब परंपरा है. वे हर साल सभी 216 क्लबों को तीन-तीन लाख रुपये देते हैं. हर क्लब सेक्रेटरी का वोट होता है. इसे तमाम लोग सांस्थानिक भ्रष्टाचार की तरह देखते हैं. अयूब इस आरोप को सच नहीं मानते. उनका कहना है कि क्लबों को किट खरीदने होते हैं, नेट्स की किराया वगैरह देना होता है. हमें बीसीसीआई से पैसे मिलते हैं, जो इन्हें दिए जाते हैं, ताकि खेल को बढ़ावा दिया जा सके.

इस साल हैदराबाद के नाम कुछ कामयाबियां रहीं. टीम ने रणजी क्वार्टर फाइनल तक पहुंचाया. हालांकि ये कारनामा दो ऐसे लोगों के साथ किया, जो हैदराबाद के नहीं हैं. कप्तान एस. बद्रीनाथ और कोच भरत अरुण. अजहर ने भारतीय क्रिकेट शर्मसार होकर छोड़ा था. अब वह हैदराबाद के के कीचड़ में कूदना चाह रहे हैं. वो सिर्फ यही उम्मीद कर सकते हैं कि उनकी सफेद क्रिकेट जर्सी एक बार फिर दागदार न हो.

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