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संडे स्पेशल: खेल की किस्मत और किस्मत के खेल

रामनाथ पारकर, पद्माकर शिवलकर और इरापल्ली प्रसन्ना के साथ किस्मत के खेल

Updated On: Jan 29, 2017 08:39 AM IST

Rajendra Dhodapkar

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संडे स्पेशल: खेल की किस्मत और किस्मत के खेल

रामनाथ पारकर का नाम नई पीढ़ी के बहुत से क्रिकेट प्रेमियों को मालूम नहीं होगा. इस दौर में क्रिकेट का इतिहास यूं भी सचिन तेंदुलकर से शुरू होता है. हो सकता है कुछ साल बाद विराट कोहली से शुरू हो. इसमें नए दौर के क्रिकेट प्रेमियों का दोष नहीं है.  टीवी और बाजार ने क्रिकेट या किसी भी अन्य खेल को तुरंत उपभोग की वस्तु बना डाला है.

बहरहाल, बात रामनाथ पारकर की हो रही थी. पारकर सत्तर के दशक में घरेलू क्रिकेट के बड़े स्टार थे. वे मुंबई में सुनील गावस्कर के सलामी भागीदार थे. गावस्कर जहां टनों रन बनाने की वजह से स्टार थे, वहीं पारकर अपनी धुआंधार बल्लेबाज़ी के लिए क्रिकेट प्रेमियों में लोकप्रिय थे. पारकर कद में गावस्कर से भी छोटे, शायद पांच फुट तीन इंच के थे.

आक्रामक बल्लेबाज और कमाल के फील्डर थे पारकर

छोटे कद के अन्य आक्रामक बल्लेबाजों की तरह बैकफुट पर कट, पुल और हुक खेलने में माहिर थे. पहली गेंद से शॉट खेलने में वे हिचकते नहीं थे. उनकी दूसरी खासियत यह थी कि वे कमाल के फील्डर थे. मुंबई के पुराने खिलाड़ी फील्डिंग के संदर्भ में उनका नाम एकनाथ सोलकर के साथ एक ही सांस में लेते हैं.

इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे किस दर्जे के फील्डर थे. उनकी विशेषज्ञता सिली मिड ऑन से लेकर कवर, एक्स्ट्रा कवर में फील्डिंग करने में थी.  स्पिनर पद्माकर शिवलकर याद करते हैं कि उनकी गेंदबाजी पर शॉर्टलेग पर एकनाथ सोलकर और सिली मिड ऑन पर रामनाथ पारकर ये दोनों नाथ खड़े रहते थे. ये दोनों गेंद रोकने और कैच पकड़ने के अलावा बल्लेबाजों के दिल में दहशत पैदा करने का काम भी करते थे, क्योंकि वे बल्लेबाज के अच्छे खासे सुरक्षित शॉट को कैच बना सकते थे.

पारकर भारत के लिए सिर्फ़ दो टेस्ट मैच खेल पाए. हालांकि उनका प्रदर्शन बहुत बुरा नहीं था. लेकिन चयनकर्ताओं ने पता नहीं क्यों उन्हें आगे मौका नहीं दिया. वे और मौकों के हकदार थे और आगे चलकर एकदिवसीय क्रिकेट में भी बहुत उपयोगी साबित हो सकते थे. पारकर की सन 1999 में एक स्कूटर दुर्घटना में असामयिक मृत्यु हो गई. तब उनकी उम्र सिर्फ 43 साल थी.

पद्माकर शिवलकर को भी किस्मत ने ठुकराया

ऊपर पद्माकर शिवलकर का जिक्र आया है. शिवलकर भारत के महानतम स्पिनरों में से थे. पारकर तो दो टेस्ट मैच खेल गए. लेकिन शिवलकर तो एक भी टेस्ट नहीं खेले. शिवलकर और एक अन्य महान स्पिनर राजिंदर गोयल के साथ बदकिस्मती यह हुई कि दोनों का करियर बिशन सिंह बेदी के समानांतर चला. जानकार कहते हैं कि ये तीनों एक सी प्रतिभा और हुनर वाले खिलाड़ी थे.

बेदी की किस्मत यह थी कि उन्हें पहले मौका मिल गया और वे लगातार अच्छा खेलते चले गए. शिवलकर ने 19.69 के औसत से 589 विकेट प्रथम श्रेणी क्रिकेट में लिए. गोयल ने 750 विकेट 18.58 के औसत से लिए. सबसे ज्यादा 637 रणजी ट्रॉफी विकेट का उनका रिकॉर्ड ऐसा है जिसके टूटने की संभावना नहीं दिखती.

इन उदाहरणों से यह पता चलता है कि खेल में किस्मत की कितनी बड़ी भूमिका हो सकती है. खेलों में हर कामयाबी के अगले कॉलम में सैकड़ों ऐसी कहानियां दर्ज होती हैं जहां किस्मत आड़े आ गई.

प्रसन्ना की कामयाबी में काम आई किस्मत

अब इन दो महान स्पिनरों को न मिले मौके के बरक्स एक तीसरे महान स्पिनर की कहानी, जिसके लिए किस्मत ने वर्षों तक दरवाजा खोल कर रखा. ये स्पिनर थे इरापल्ली प्रसन्ना, जिन्हें दुनिया के महानतम ऑफ स्पिनर्स में शुमार किया जाता है. प्रसन्ना को नरी कॉन्ट्रैक्टर के नेतृत्व में 1961 में वेस्टइंडीज जाने वाली भारतीय टीम के लिए चुन लिया गया. तब वे इंजीनियरी के छात्र थे.

उन्होंने चयनकर्ताओं से कहा कि उनके पिता पढ़ाई अधूरी छोड़कर वेस्टइंडीज जाने की इजाजत नहीं देंगे (ऐसा भी हुआ करता था). तब एक चयनकर्ता उनके घर उनके पिता को मनाने गए. पिता ने आखिरकार इस शर्त पर इजाजत दी कि प्रसन्ना वेस्टइंडीज से लौटकर अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे.

यह दौरा भारतीय टीम के लिए बहुत बुरा रहा. फ्रैंक वॉरेल के नेतृत्व में शक्तिशाली वेस्टइंडीज टीम ने भारतीय टीम की बुरी तरह धुलाई की. एक टेस्ट मैच में कप्तान कॉन्ट्रैक्टर के सिर पर चार्ली ग्रिफिथ की गेंद लगी और उनकी जान जाते जाते बची. उनका क्रिकेट करियर खत्म हो गया और युवा नवाब पटौदी को बीच दौरे में कप्तान बना दिया गया. प्रसन्ना दो टेस्ट मैचों में खेले और उन्हें कोई खास कामयाबी नहीं मिली.

भारत आकर प्रसन्ना क्रिकेट छोड़कर पढ़ाई में जुट गए. पढ़ाई पूरी करने के बाद पांच साल बाद जब वे लौटे, तब भारतीय क्रिकेट जैसे बांहें खोलकर उनका स्वागत करने के लिए खड़ा था. सन 1967 में नवाब पटौदी के नेतृत्व में इंग्लैंड जाने वाली टीम में वे चुन लिए गए. इंग्लैंड में उन्हें औसत सफलता मिली. लेकिन उसके बाद ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर उनका प्रदर्शन ऐसा रहा कि ऑस्ट्रेलियाई किसी और को उनसे बड़ा ऑफ स्पिनर मानने केलिए तैयार नहीं होते. भारत की धरती पर अपना पहला टेस्ट खेलने से पहले वे टीम के महत्वपूर्ण सदस्य बन चुके थे.

क्या कह सकते हैं? खेल के नियम तो सब जानते हैं, लेकिन किस्मत के खेल के नियम कौन जान सकता है!

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