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भले ही यह श्रीसंत की जीत हो, लेकिन भारतीय क्रिकेट और समाज की हार है

आखिर क्यों मैच फिक्सिंग मामले में लगे बैन टिक नहीं पाते?

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Aug 08, 2017 01:42 PM IST

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भले ही यह श्रीसंत की जीत हो, लेकिन भारतीय क्रिकेट और समाज की हार है

एक बार फिर कोई सबूत नहीं मिले. एक बार फिर फिक्सिंग के आरोप से क्रिकेटर को बरी कर दिया गया. जो श्रीसंत के साथ हुआ है, वैसा ही कुछ साल पहले भी हुआ था. जब क्रिकेटर का नाम अजहरुद्दीन था. 2012 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अजहर पर लगा आजीवन बैन हटा दिया था. 2014 में अजय शर्मा पर लगा बैन दिल्ली की जिला अदालत ने हटा दिया था. इससे पहले अजय जडेजा पर लगा पांच साल का प्रतिबंध हटाया गया था.

आखिर क्यों मैच फिक्सिंग मामले में लगे बैन टिक नहीं पाते. ..और क्यों इस तरह के फैसलों के बाद बीसीसीआई ऊपरी अदालत में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. हम सबको याद होगा, श्रीसंत सहित कुछ क्रिकेटरों को आईपीएल में फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उस वक्त के दिल्ली पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ने दावा किया था कि ‘वाटरटाइट केस’ है. इससे कोई बच नहीं पाएगा.

आज नीरज कुमार रिटायर हो चुके हैं. दिलचस्प है कि उन्हें 2015 में बीसीसीआई की एंटी करप्शन यूनिट का हेड बनाया गया था. उन्हें तब इस पद पर आसीन किया गया, जब तय हो गया था कि उस केस में पकड़े गए किसी क्रिकेटर पर दिल्ली पुलिस के आरोप साबित नहीं हो पाएंगे.

इसमें कोई शक नहीं कि बगैर आरोप के किसी को सजा नहीं दी जा सकती. लेकिन सवाल यही है कि आखिर इस तरह के केस में सबूत पुख्ता क्यों नहीं होते? अजहर एंड कंपनी को लेकर सीबीआई जांच हुई थी. सीबीआई ने काफी लंबी-चौड़ी रिपोर्ट पेश की थी. उस रिपोर्ट के हिसाब से तो कई क्रिकेटरों ने अपना ‘गुनाह’ कबूल किया था. यह अलग बात है कि वो कबूलनामा अदालत में नहीं चला.

अदालत में साबित नहीं हो पाता गुनाह

सीबीआई के मुताबिक जिन लोगों ने फिक्सिंग की बात मानी थी, उनमें अजहरुद्दीन शामिल थे. बल्कि उस वक्त रिपोर्ट और सीबीआई सूत्रों से पता चला था कि कैसे अजहर का सामना बुकी मुकेश गुप्ता से कराया गया. किस तरह अजय जडेजा, अजहर और मुकेश गुप्ता को अलग-अलग कमरों में बिठाकर पूछताछ के बाद अचानक एक-दूसरे के सामने खड़ा कर दिया गया. वहां दिग्गज क्रिकेटर फूट-फूटकर रोए थे. लेकिन एक बार मामला सीबीआई के इंटरोगेशन रूम से बाहर आया, तो ढह गया.

इस बार भी वैसा ही हुआ है. केरल हाई कोर्ट ने साफ किया है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जो श्रीसंत का मैच फिक्सिंग से डायरेक्ट कनेक्शन साबित कर पाए. दो ऑडियो रिकॉर्डिंग थी. एक में श्रीसंत के मित्र जीजू जनार्दन की बातचीत एक बुकी से हो रही है. दूसरा, श्रीसंत का कबूलनामा, जिससे वो बाद में मुकर गए थे. ये दोनों टेप कोर्ट के मुताबिक श्रीसंत को गुनाहगार साबित नहीं करते.

Sreeshanth-slapped

यह तो कोर्ट का मामला हो गया. अब बात बीसीसीआई की, जो इस कदर अमीर होने के बाद भी ऐसे वकील नहीं ला पाई, जो अदालत में गुनाह साबित सके. सवाल इसी पर है कि क्या ये साबित करने की ईमानदार कोशिश नहीं होती? अगर होती, तो पिछले मामलों में बीसीसीआई कभी क्यों सुप्रीम कोर्ट तक नहीं जाती. यहां तक कि अजहर से तो आधिकारिक तौर पर बैन हटाने की घोषणा तक नहीं की गई है. उसके बावजूद उन्हें बीसीसीआई के कार्यक्रमों में शामिल किया जाता है.

बगैर अदालती फैसले के राजनीतिक पार्टियों ने दिए टिकट

बैन जब हटा नहीं था, उसी वक्त अजहर को कांग्रेस की टिकट मिल गई. वो सांसद भी बन गए. श्रीसंत को भी बीजेपी ने विधानसभा चुनावों में टिकट दी थी. देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों का रुख बताता है कि मैच फिक्सिंग में बैन का इनके लिए कोई मतलब नहीं था. क्रिकेट में भ्रष्टाचार के आरोप किसी पार्टी के लिए अहमियत नहीं रखते.

कुछ ऐसा ही रुख बीसीसीआई का है. बीसीसीआई के किसी अधिकारी ने अब तक सुप्रीम कोर्ट में सीलबंद लिफाफे को खोले जाने के लिए सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा है. ऐसा लगता भी नहीं कि किसी अधिकारी की तरफ से ये मांग की जाएगी.

बंद लिफाफे, बंद मुट्ठियां, बंद मामले, बंद कमरे सभी के लिए फायदेमंद हैं. चाहे वो राजनीतिक पार्टियां हों, बीसीसीआई या उससे जुड़े राज्य संघ या कोई भी और. लेकिन ये सब क्रिकेट के लिए फायदेमंद नहीं है. हालांकि बीसीसीआई की तरफ से कुछ कहा नहीं गया है. लेकिन पिछले उदाहरणों से ऐसा लगता नहीं कि केरल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ कोई अपील होगी. एक और मामला खत्म हो जाएगा. श्रीसंत जीत चुके हैं. संभव है कि वो क्रिकेट खेलते हुए नजर आएं. लेकिन उनकी इस जीत में क्रिकेट और समाज की हार छुपी है. यहां पर चुप्पी भ्रष्टाचार को स्वीकार करने वाली है.

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