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बीसीसीआई को बर्बाद करके इसलिए अब भी आबाद है भ्रष्टाचार ...और रहेगा

जिस तरह के हालात हैं, लगता नहीं कि भविष्य में यह सब रुकने वाला है

Jasvinder Sidhu Updated On: Oct 28, 2017 03:16 PM IST

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बीसीसीआई को बर्बाद करके इसलिए अब भी आबाद है भ्रष्टाचार ...और रहेगा

पुणे क्रिकेट स्टेडियम की पिच के क्यूरेटर पांडुरंग सालगांवकर अब शायद ही कभी फिर से हरी घास वाले अपने ही मैदान पर कदम रख सके. टीवी चैनल स्टिंग करके उन्हें भ्रष्ट घोषित कर चुका है, लेकिन अभी तक वह वीडियो एयर नहीं हुआ है जिसमें पत्रकारों ने खुद को बुकी बता कर पांडुरंग से बातचीत शुरू की थी.

खैर इससे पांडुरंग का पिच की जानकारी अनजान लोगों को देकर नियम तोड़ने का पाप कम नहीं हो जाता. इस पूरे प्रकरण से एक सवाल फिर से खड़ा हो जाता है कि 2013 के फिक्सिंग स्कैंडल के बाद सुप्रीम कोर्ट में इतना लंबा केस चला. बीसीसीआई का अभेद किला ढह गया. 150 करोड़ के करीब बोर्ड के वकीलों की फीस भी भर दी गई. लेकिन जिस भ्रष्टाचार ने बोर्ड की जड़ें हिला दी, वह अभी भी अपना मुंह खोले दिखाई दे रहा है. जिस तरह के हालात हैं, लगता नहीं कि भविष्य में यह सब रुकने वाला है.

बोर्ड हर साल घरेलू क्रिकेट में विभिन्न आयु वर्ग में 900 के करीब मैच आयोजित करता है. इन सब मैचों में खिलाड़ियों, अंपायरों और क्यूरेटरों पर निगाह रखने के लिए तीन ही पेशेवर एंटी करप्शन आफिसर हैं.

बोर्ड की एसीएसयू में दिल्ली के पूर्व कमिश्नर नीरज कुमार के अलावा इंफार्मेशन आफिसर धीरज मल्होत्रा और रीजनल इंटीग्रेटी मैनेजर अंशुमान उपाध्याय हैं. अब नेशनल टीम की बात करते हैं. उन पर निगाह रखने के लिए आईसीसी के कारिंदे भी हैं. लेकिन आईपीएल में भी भ्रष्टाचार रोकने की जिम्मेदारी उसकी एंटी करप्शन एंड सिक्यूरिटी यूनिट की थी. फिर भी खिलाड़ियों की गिरफ्तारी हुई.

यहां बता देना जरुरी है कि बोर्ड ने विराट कोहली की टीम के एक ऐसे कोच को भी जलील करके निकाला है जो अनुशासन और देर रात तक बाहर न रहने के नियम को लागू करने का हामी था.

बोर्ड की एंटी करप्शन एंड सिक्यूरिटी यूनिट के एक सदस्य फर्स्ट पोस्ट हिंदी को बताते हैं कि हर खिलाड़ी, हर मैच पर निगाह रखना उनके वश की बात नहीं है. इसलिए स्थानीय एंटी-करप्शन लाइजन आफिसर्स (एसीएलओ) की मदद ली जा रही है.

अब यह एसीएलओ आखिर हैं कौन? यह जानना काफी रोचक है. दिल्ली की ही बात करते हैं. हाल ही में दिल्ली में एक एसीएलओ ऐसा भी था शायद स्कूल ही नहीं गया. एक अन्य ने दिल्ली और राजस्थान के बीच रणजी मैच के दौरान एक अधिकारी के खिलाफ मूंगफली चुराने की रिपोर्ट भी लिखी. रोचक तथ्य यह है कि बोर्ड इन एसीएलओ को 25000 रुपए प्रति मैच अदा कर रहा है.

सवाल यह है कि अगर भ्रष्टाचार एक सिरदर्द है तो इसको रोकने के लिए किसी पेशेवर गुप्तचर एजेंसी को लगाने के बारे में सोचा जाना चाहिए. आखिर जब बोर्ड प्रसारण के दौरान स्पाइडर कैमरे के इस्तेमाल के लिए हर साल करीब 5 करोड़ दे रहा है तो भ्रष्टाचार के लिए उसे कुछ तो नया करना होगा.

अंतरराष्ट्रीय मैचों के दौरान आईसीसी की यूनिट के आफिसर खिलाड़ियों पर निगाह रखते हैं. आईसीसी खुद ही अपनी न जाने कितनी रिपोर्ट में स्वीकार कर चुकी है कि खेल से भ्रष्टाचारियों को दूर करना संभव नहीं है. क्योंकि वह खेल को भ्रष्ट करने के लिए कई तरीके अपना रहे हैं.

इसमें क्रिकेटरों को छोटी उम्र से ही अपने शिकंजे में लेने से लेकर पिच क्यूरेटोरों तक को जाल में फंसाने के प्रयास हर साल हो रहे हैं. अभी दो साल पहले ही आईसीसी ने श्रीलंका में गॉल क्रिकेट स्टेडियम के क्यूरेटर जयनंदा वरनवीरा को पिच के बारे में बुकियों को जानकारी देने का दोषी पाया था. वरनवीरा पर पांच साल का बैन चल रहा है.

लेकिन लगता नहीं कि यह सब रुकने वाला है. खासकर भारत में क्योंकि भारतीय क्रिकेट में आईपीएल के आने के बाद पैसे को लेकर इतना असंतुलन आ गया है कि जो युवा एक भी रणजी मैच नहीं खेला, उसे करोड़ों मिल रहे हैं. और जो टेस्ट के स्टार हैं, उन्हें कोई खरीदने को तैयार नहीं. या फिर एक क्रिकेट मैदान के क्यूरेटर को लाखों मिल रहे हैं और दूसरे का बकाया फंसा हुआ है. यह सब हालात बुकियों को धंधा बदस्तूर चलाए रखने के लिए काफी हैं.

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