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इस टीम को मौकों का उजाला चाहिए, ट्विटर की चकाचौंध नहीं!

भारतीय ब्लाइंड क्रिकेट टीम चार वर्ल्ड कप जीतने के बाद भी सरकार और बीसीसीआई से मदद की दरकार में है

Updated On: Feb 22, 2018 06:25 PM IST

Riya Kasana Riya Kasana

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इस टीम को मौकों का उजाला चाहिए, ट्विटर की चकाचौंध नहीं!

दो अप्रैल 2011 की रात शायद ही कोई भारतीय चैन की नींद सोया हो. उस रात सड़कों पर जन सैलाब उतर आया था. हर ओर तिरंगे के साथ इंडिया-इंडिया की गूंज थी. क्रिकेट को भारत में सिर्फ एक शब्द का दर्जा देना शायद गलत होगा. हमारे देश में यह सिर्फ एक शब्द नहीं है. यह एक भावना है, एक धर्म है, एक जुनून है और शायद एक ऐसा शब्द जो लोगों के दिलों को एक साथ धड़कने को मजबूर कर देता है. ये बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं और देखने में एक हद तक सच्ची भी. लेकिन क्या वाकई ये सारी भावनाएं क्रिकेट खेल के लिए है या फिर सिर्फ बीसीसीआई की पुरुष क्रिकेट टीम के लिए.

सवाल उठना लाजमी है क्योंकि अगर लोगों को क्रिकेट से इतना प्यार होता तो हर स्तर के क्रिकेट को दर्शकों का प्यार मिलता, उन्हें पहचान मिलती. लेकिन ऐसा नहीं है. भारत ने 28 साल बाद 2011 में वर्ल्ड कप जीता. टीम का भव्य स्वागत किया गया और उनपर इनामों की बौछार हुई. इस साल एक और भारतीय टीम विश्व विजेता बनकर भारत लौटी. लेकिन एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने के लिए चंद फैंस को छोड़कर ना कोई अधिकारी था और ना ही कोई मंत्री. यह टीम है भारत की ब्लाइंड क्रिकेट टीम. इस साल 20 जनवरी को भारत ने पाकिस्तान को हराकर चौथा वर्ल्ड कप खिताब अपने नाम किया.

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फर्स्टपोस्ट ने टीम के खिलाड़ियों और कप्तान से बात की कि आखिर यह जीत उनके लिए क्या मायने रखती है. कप्तान अजय ने जीत के उस लम्हे को बड़ी ही खूबसूरती से बयान करते हुए बताया ‘माइक पर जब विश्व विजेता टीम इंडिया कहा गया, तो हमारी आंखों में आंसू थे. हम इसकी वजह नहीं जानते बस आंसू बहे जा रहे थे. हम मौन थे, हम एक दूसरे से बात तक नहीं पा रहे थे.’ टीम की इस जीत के बाद ट्विटर पर बधाई संदेशों की बाढ़ आ गई. राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक, अमिताभ बच्चन से लेकर सचिन तेंदुलकर सभी ने टीम को शुभकामनाएं दीं. लेकिन क्या यह जीत सिर्फ इतनी बड़ी ही थी कि एक ट्वीट करके औपचारिकता निभा दी जाए.

इस औपचारिकता का अंदाजा अब तक चार वर्ल्ड कप खेल चुके कप्तान अजय को था. उन्होंने कहा, ‘ट्वीट तो सबने किया लेकिन उससे हमें क्या मिला. हमारे लिए आज जरूरत संसाधन की है, जो किसी के ट्वीट करने से नहीं मिलते. हमारी टीम के अधिकतर खिलाड़ी गरीब परिवार से आते हैं, ऐसे में हमें सरकार से मदद की उम्मीद थी. खासकर नए मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ से क्योंकि वो खुद एक खिलाड़ी रह चुके हैं और जानते हैं कि एक खिलाड़ी के लिए उसका खेल कितना अहम होता है और कितनी मुश्किलें सामने होती हैं. मदद तो क्या हमें अभी तक खेल मंत्रालय की ओर से एक बधाई संदेश तक नहीं मिला. ना किसी तरह का सम्मान समारोह का आयोजन हुआ.’  हालांकि उन्होंने यह जरूर माना कि सोशल मीडिया की वजह से वह लोगों के दिल में उतरने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं लेकिन जगह बनाने का सफर अभी लंबा है.

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अजय ने फर्स्टपोस्ट को बताया कि उनकी टीम के लिए यह जीत कितनी मुश्किल रही है. खुद अजय के लिए यह सफर कितना मुश्किल रहा था. अजय 2010 से क्रिकेट खेल रहे हैं. जिस स्कूल में वो पढ़ते थे, वहां रविवार को खेलने की मनाही थी. ऐसे में वो अपने दोस्तों के साथ रात में क्रिकेट खेला करते थे. अजय ने बताया ‘हम नारियल तेल के डब्बे में पत्थर डालकर क्रिकेट खेला करते थे. दिन में क्रिकेट ग्राउंड खाली ना होने की वजह से हम रात में खेला करते थे. हमें खेलने के लिए रोशनी की जरूरत नहीं होती थी. ऐसे में हम रात भर खेला करते थे. हमारे लिए क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं था. हमारी तबकी मेहनत का नतीजा ही है कि हम आज यह सब हासिल कर पाए हैं.’

इतनी मुसीबतें भी उनके हौसले को नहीं तोड़ पाईं, लेकिन उन्हें इस बात का अफसोस है कि इतना कुछ हासिल करने के बावजूद उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पा रहा जिसके वो हकदार हैं. टीम के ऑलराउंडर सोनू ने कहा, ‘हम एक ही तिरंगे के लिए खेलते हैं, एक सी जर्सी पहनते हैं, फिर भी फर्क है जो हमें महसूस हो रहा है. हम देश के लिए और भी बहुत कुछ करना चाहते हैं लेकिन उसके लिए हमें जिस समर्थन की जरूरत है, वो मिल नहीं पा रहा है.’

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क्रिकेट इस टीम के लिए एक खेल से कहीं ऊपर है. अपनी कमजोरी को परे रखकर वो इस खेल से एक समान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं. एक हठ है इस टीम में जो दुनिया में अपने देश का नाम रोशन करना चाहती है. मुश्किलों से तो वो अपनी निजी जिंदगी में जूझ ही रहे हैं, ऐसे में उनके डर का सबब उनकी आंखों का अंधेरा नहीं है. डर है तो गुमनामी के अंधेरों में खो जाने का, जैसा पिछली बार यानी 2017 में विश्व विजयी टीम के साथ हुआ.

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