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क्यों बार-बार यह गुनाह करते हैं जडेजा... या बाकी भारतीय गेंदबाज

जडेजा की नो बॉल की वजह से श्रीलंका को हुई दिल्ली टेस्ट ड्रॉ कराने में आसानी, चंडीमल को किया था नो बॉल पर आउट

Vedam Jaishankar Updated On: Dec 07, 2017 03:52 PM IST

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क्यों बार-बार यह गुनाह करते हैं जडेजा... या बाकी भारतीय गेंदबाज

ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज के बीच चर्चित टाई टेस्ट का दिलचस्प किस्सा है. आखिरी गेंद पर ड्रामा हुआ था. किस्सा वेस्टइंडीज के महानतम तेज गेंदबाजों में शुमार होने वाले वेस्ली हॉल ने सुनाया था. हॉल ने आखिरी गेंद फेंकी थी. उन्होंने उस लम्हे का किस्सा सुनाया था.

उन्होंने कहा था, ‘कप्तान फ्रैंक वॉरेल मेरे पास आए और कहा कि मैं तुम्हें देख रहा हूं. मैंने जवाब दिया कि मुझे पता है. उन्होंने कहा- इससे भी ज्यादा अहम है कि अंपायर तुमको देख रहे हैं.’ इसके बाद वॉरेल ने एक लाइन जोड़ी, ‘एक बॉल बाकी है. अगर तुमने नो बॉल कर दी... तो तुम कभी बारबेडोस में कदम नहीं रख पाओगे.’ हॉल ने कहा, ‘मैंने आखिरी दौड़ लगाई. स्टंप्स से करीब चालीस गज दूर से. आखिरी गेंद करने के लिए हांफता हुआ आया. क्रीज से करीब तीन गज भीतर मेरा पैर था.’

जडेजा की एक नो बॉल ने बदला खेल 

भारतीय कप्तान विराट कोहली को इस मामले में ज्यादा फिक्र नहीं करनी चाहिए. लेकिन कम से स्पिनर्स, उसमें भी खासतौर पर रवींद्र जडेजा को अपने ट्रेनिंग के तरीके पर ध्यान देने की जरूरत है. उन्हें समझने की जरूरत है कि कैसा ट्रेनिंग तरीका है कि वे नो बॉल से नहीं बच पा रहे हैं.

रीप्ले से दो बार पता चला कि जडेजा का पांव गलत जगह पड़ा. उनका फ्रंट फुट जब पड़ा, तो उसका कोई भी हिस्सा पॉपिंग क्रीज के अंदर नहीं था. इस लिए नियम के मुताबिक वो गेंद अवैध या नो बॉल थी. पहला मामला अंपायर की नजर से बच गया. इसमें उन्होंने एंजेलो मैथ्यूज को आउट किया.

आउट करने के ठीक बाद अंपायर की नजर बड़ी स्क्रीन पर चल रहे रीप्ले पर जरूर पड़ी होगी. इसीलिए जब जडेजा ने कप्तान दिनेश चंडीमल को कुछ ओवर के बाद आउट किया, तब वेस्ली हॉल के देश के अंपायर जोएल विल्सन ने तीसरे अंपायर की तरफ इशारा किया. उन्होंने यकीनन फ्रैंक वॉरेल की कहानी सुनी होगी. उन्होंने श्रीलंकाई कप्तान से क्रीज पर रुकने को कहा और टीवी अंपायर से पूछा कि क्या गेंद लीगल थी? ताज्जुब नहीं हुआ कि जडेजा फिर गलती पर थे. इस बार न सिर्फ चंडीमल बच गए, बल्कि श्रीलंकाई टीम को दिल्ली टेस्ट ड्रॉ कराने में बड़ी मदद मिली.

टी 20 या वनडे की तरह टेस्ट में नो बॉल पर फ्री हिट मिलने का नियम नहीं है. यही एक राहत है. आईसीसी टी 20 सेमीफाइनल में जडेजा के साथ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने लेंडल सिमंस को आउट किया था. लेकिन वो नो बॉल थी. बल्लेबाज बचे और अपनी टीम को मैच जिता गए. जडेजा के मामले में भी अंपायर ने रिव्यू इसलिए लिया, क्योंकि विकेट गिरा था. संभव है कि जडेजा ने दर्जनों नो बॉल की हों. लेकिन उन पर विकेट नहीं मिला, इसलिए अंपायर की नजरों से बच गए हों.

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इस तरह की गेंदबाजी से टीम को नीचा दिखाने का एक और मामला जेहन में आता है. अजित आगरकर और जवागल श्रीनाथ ने विश्व कप मैच में बड़ी उदारता से नो बॉल बरसाईं. भारत वो मैच महज तीन रन से हारा. इंग्लैंड में हुए वर्ल्ड कप में वो मैच जिम्बाब्वे के खिलाफ था.  भारत ने 16 नो बॉल और 21 वाइड की थीं. यकीनन नो बॉल न करने को लेकर गेंदबाजों की ट्रेनिंग का तरीका तबसे लेकर अब तक बदला नहीं है. लेकिन बाकी जगह इसे लेकर गहन परीक्षण हुए हैं, ताकि नो बॉल से बचा जा सके.

अश्विन जडेजा को प्रेक्टिस सेशन में बदलाव करने की जरूरत

ऑस्ट्रेलियन और यूके रिसर्चर की टीम ने यूरोपियन जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स साइंस के लिए शोध किया. इसके मुताबिक, अगर आप किसी लक्ष्य की तरफ भाग रहे हों, तो रास्ते में वर्टिकल चीज सहायता करती है. जैसे, ट्रैफिक लाइट या दरवाजे की ओर पैदल तेजी से जा रहे हैं, तो वहां कुछ ऐसा होता है, जिससे आप अपनी रफ्तार को एडजस्ट करते हैं. शोध के मताबिक गेंदबाज नो बॉल से बचने के लिए अंपायर की पोजीशन को इस्तेमाल करते हैं. उनके दिमाग में अंपायर की पोजीशन, रिटर्न क्रीज, बॉलर्स एंड के स्टंप, स्टंप लाइन क्रीज, पॉपिंग क्रीज जैसी चीजें बगैर सोचे भी दिमाग में चलती हैं. इससे वे अपने कदमों को दौड़ते हुए थोड़ा लंबा या छोटा करते हैं.

शोध में पाया गया कि हर गेंद पर रन अप एक जैसा दिखता है, लेकिन होता नहीं. वह बदलता रहता है. ऐसा उन वर्टिकल चीजों की बदौलत होता है, जो गेंदबाज के दिमाग में चलती रहती हैं. नेट्स में अंपायर नहीं होते. ऐसे में स्टंप के जरिए गेंदबाज अंदाजा लगाता है. लेकिन मैच में अंपायर होता है. ऐसे में गेंदबाज अपने अंतर्मन में उस खास पॉइंट को थोड़ा बदलता है. ऐसे में उसे अपने रन से गेंद फेंकने तक में मामूली बदलाव करना होता है.

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याद करना चाहिए कि तेज गेंदबाजी दिग्गज रिचर्ड हैडली हमेशा एक स्पॉट मार्क करते थे और अंपायर से वहां खड़ा होने के लिए कहते थे. उन्हें भरोसा था कि इससे उन्हें स्टंप के नजदीक से गेंदबाजी करने में आसानी होती है. लेकिन साथ ही इससे उन्हें नो बॉल के लिए संकेत भी मिलता था, जो उन्हें नो बॉल न करने में मदद करता था. नेट्स में भी वो कुछ सामान या पत्थर का कोई टुकड़ा उस जगह रख लेते थे, जहां अंपायर को खड़ा होना होता है.

शायद यही भारत की परेशानियों को भी दूर कर सकता है. नेट्स में ऐसी जगह तय करना जहां अंपायर खड़ा होता है. इसके साथ ट्रेनिंग करना. यकीनन अश्विन और जडेजा को इसे आजमाना चाहिए.

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