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नकली आक्रामकता और बेलगाम जुबां, एशिया से बाहर टीम इंडिया का रिकॉर्ड नहीं बदल सकती

टीम इंडिया और बीसीसीआई को बहुत कुछ कह रही है यह 0-2 की शर्मनाक हार

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu Updated On: Jan 17, 2018 05:44 PM IST

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नकली आक्रामकता और बेलगाम जुबां, एशिया से बाहर टीम इंडिया का रिकॉर्ड नहीं बदल सकती

2015 के बाद श्रीलंका और वेस्टइंडीज के बाहर पहली बार विराट कोहली की टीम किसी विदेशी दौरे पर साउथ अफ्रीका में है. केपटाउन के बाद सेंचुरियन में टीम का जो हाल हुआ है, उससे साफ है कि इन सभी स्टार खिलाड़ियों को इस बहस में हिस्सा लेना ही पड़ेगा कि क्या वे एशिया से बाहर कोई सीरीज जीतने की क्षमता रखते है या नहीं!

सेंचुरियन में 135 रनों से  मिली शर्मनाक हार को भूल भी जाएं, लेकिन भारतीय टीम से यह सवाल  जायज है कि आखिर वह किस दम पर घर से बाहर मैच जीतने की  उम्मीद कर सकती हैं!

केपटाउन टेस्ट मैच के बाद से कप्तान विराट कोहली की आवाज स्टंप माइक पर सुनी जा सकती है. वह साउथ अफ्रीकी खिलाड़ियों को बुरा भला कहने से लेकर अपने साथियों के दूसरे एंड पर कोचिंग देने में लगे हैं.

'जस्सी (बुमराह) इनकी ... पड़ी है. तू यहीं डाल.',  'ये घबराया हुआ है. इसकी समझ में नहीं आ रहा.' साउथ अफ्रीकी बल्लेबाजों को अपसेट करने के लिए कोहली का वॉल्यूम हर विकेट गिरने के साथ ऊंचा होता गया. 'बहुत बढ़िया. अच्छा खेल रहा है.'  हां, बस ऐसे ही खेलता रह,'. अपने बल्लेबाजों को वह जोश दिलाने में भी पीछे नहीं थे. लेकिन यह सब विकेट गिरने के सिलसिले को थामने में नाकाम रहा.

सेंचुरियन टेस्ट मैच की पहली पारी में 153 रन की पारी खेलने के बाद भारतीय कप्तान के खिलाफ गुस्से में गेंद को पटकने के कारण अनुशासनहीनता के लिए जुर्माना भी लगा. चौथे दिन खराब रोशनी के कारण खेल रुका को वह मैच रेफरी के कमरे में बहस करते दिखे.

Nagpur: Indian captain Virat Kohli along with team mates return back to the pavalion at the end of the 3rd day's play of the 2nd cricket test match against Sri Lanka in Nagpur on Sunday. PTI Photo by Shashank Parade (PTI11_26_2017_000159B)

क्या ऐसा नकली आक्रामकता मैच जीतने में कारगर साबित होती है!

केपटाउन में कप्तान फाफ ड्यू प्लेसी के खिलाफ शुरू हुई उनकी जुबानबाजी सेंचुरियन में भी जारी रही. लेकिन नतीजा क्या रहा? यहां सिर्फ कप्तान की ही जुबां नहीं चल रही थी. कुछ और भी थे जो मेजबान क्रिकेटरों से मैच, बल्ले या गेंद से नहीं बल्कि जुबान चलाकर जीतना चाहते थे. सवाल यह उठता है कि विदेशी जमीं पर मैच जीतने के लिए यह सब जरूरी है या सामने वाली टीम जैसा बराबर का समझदारी भरा खेल.

साउथ अफ्रीका की ओर से ठीक इससे विपरीत स्वभाविक क्रिकेट देखने को मिला. दोनों टेस्ट मैचों में टीम इंडिया साउथ अफ्रीका पर हावी होने में कामयाबी रही पर मौकों को भुनाने में नाकाम रही. लेकिन मेजबान अपने बेसिक यानि अपने क्रिकेट पर ही खेल को आगे ले गए और वह सीरीज में 2-0 से आगे हैं.

इन दोनों मैचों में कहीं भी नहीं लगा कि यह वही टीम है जो कि पिछले 25 महीनों में टेस्ट, वनडे और टी-20 की 16 सीरीज जीत पर साउथ अफ्रीका पहुंची थी. ऐसा भी नहीं था कि उसे साउथ अफ्रीका की परंपरागत पिचों पर ही खेलने को मिला जिस पर गेंद छाती पर आने के अलावा कान के पास से निकलती है. सेंचुरियन की पिच मोहाली या चेन्नई की बहन जैसी थी.फिर भी दूसरी पारी में पूरी टीम इस पर 151 रन ही बना सकी.

South African bowler Lungi Ngidi (3rd R) celebrates the dismissal of Indian batsman Hardik Pandya (R) during the fifth day of the second Test cricket match between South Africa and India at Supersport cricket ground on January 17, 2018 in Centurion. / AFP PHOTO / GIANLUIGI GUERCIA

केपटाउन और सेंचुरियन में जो कुछ भी हुआ, उसके लिए टीम इंडिया को माफ किया जा सकता है, लेकिन इससे सबक ना लेना अपराध होगा.

साफ है कि अगर एशिया के बाहर जीतना है तो कप्तानों को तीन दिन में अपने घर में जीत दिलाने वाली पिचों के मोह को त्यागना होगा  और श्रीलंका के खिलाफ कोलकाता और नागपुर जैसी मुश्किल पिचों पर लगातार सीरीज खेलने की मानसिकता को मजबूत करना होगा.

यह भी साफ हो गया है कि इस बात ही गारंटी नहीं है कि अपने घर में लगातार शतक-दर-शतक बनाने वाले बल्लेबाज एशिया के बाहर भी गेंदबाजों की बखिया उधेड़ देंगे. किसी को अगर इस तर्क पर शक है तो वह दोनों टेस्ट मैचों में स्टार बल्लेबाजों के स्कोर पर निगाह डाल सकता है. एशिया के बाहर रन नहीं, बल्कि सत्र-दर-सत्र क्वालिटी बॉलिंग का सामना करके लंबे समय तक क्रीज पर खड़े रह कर साझेदारियों की जरूरत होती है.

पहले दो टेस्ट मैच में ऐसी कितनी साझेदारियां हो पाईं, स्कोर बोर्ड पर साफ दिखाई दे रही हैं. यह एशिया के बाहर सीरीज जीतने का टीम इंडिया के लिए सबसे बेहतरीन मौका था, क्योंकि वह प्रभावशाली तेज गेंदबाजी के साथ साउथ अफ्रीका गई थी. गेंदबाजों ने निराश नहीं किया. उनकी जितनी तारीफ की जाए कम हैं. उन्होंने दोनों मैचों में साउथ अफ्रीका के सभी 40 विकेट लिए हैं.

लेकिन पिछले चार सालों में विश्व की टीमों के खिलाफ सौ से ज्यादा शतक मारने वाली बल्लेबाजी पर एशिया से बाहर ऐसे ही प्रदर्शन की उम्मीद की जा सकती है, इस पर बीसीसीआई को शोध करना चाहिए.

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