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केपटाउन की हार बताती है, कोई चाहिए टीम इंडिया का दिमाग दुरुस्त रखने वाला

एशिया से बाहर होने वाले दौरों पर लगातार फ्लॉप रही भारतीय टीम को एक स्पोर्टस साइकॉलोजिस्ट की जरूरत है जो दबाव में टीम की मदद कर सके

Updated On: Jan 09, 2018 12:58 PM IST

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu

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केपटाउन की हार बताती है, कोई चाहिए टीम इंडिया का दिमाग दुरुस्त रखने वाला

पहली बात. केपटाउन में भारतीय टीम हारी जरूर है लेकिन उसने उम्मीदों के विपरीत अच्छा खेला. इसके लिए तेज गेंदबाज ही तारीफ के हकदार हैं. टीम इंडिया अपने स्टार बल्लेबाजों के कारण रैंकिग में टॉप पर है.

पिछले 25 महीनों में टेस्ट, वनडे और टी-20 में 16 सीरीज की जीत का सेहरा बल्लेबाजों के ही सर है. पिछले तीन साल में टीम के बल्लेबाजों ने सामने वाली टीम के खिलाफ 100 शतक भी मारे हैं.

जाहिर है कि यह आंकड़े इसलिए चमक रहे हैं क्योंकि इस दौरान विराट कोहली की टीम ने अधिकतर क्रिकेट अपनी पिचों और एशिया में ही खेला.

निचला क्रम खेल सकता है तो टॉप ऑर्डर क्यों नहीं

ऐसे में अगर केपटाउन टेस्ट मैच की दूसरी पारी में नंबर आठ और नौ के निचले क्रम के बल्लेबाज विश्व की उम्दा गेंदबाजी के बीच एक परेशान करने वाली पिच पर अपने टॉप फाइव बल्लेबाजों के ज्यादा गेंदें खेल जाते हैं तो समझ लेना चाहिए कि कुछ ऐसा है जो सही नहीं है.

आखिर ऐसा क्या है कि एशिया से बाहर पिचों पर टॉप बैटिंग लाइन-अप का स्कोर अधिकतर समय किसी मोबाइल नंबर जैसा दिखाई देता है! इस मसले को सिर्फ यह कह कर ही नहीं टरकाया जा सकता कि भारतीय अपने घर पर शेर हैं.

कुछ तो दिक्कत है. इस लिहाज से केपटाउन की हार कोई बुरी नहीं है. इससे सबक लेकर समझने की जरूरत है कि आखिर अपनी पिचों पर तीन या चार दिन से भी कम समय में मैच जीतने वाली टीम के लिए खुद को श्रेष्ठ साबित करने वाले मुकाबले छीन लेने की क्षमता क्यों नहीं हैं?

भारतीय टीम की सोच को लेकर हैं बहुत से सवाल

बहुत से सवाल हैं. जैसे कि क्या पिच पर हरी घास और बाउंस दिमाग पर हावी हो जाते हैं और टीम का खेल आधा रह जाता है? एशिया से बाहर तो दूर यह हाल ही में श्रीलंका के खिलाफ कोलकाता और नागपुर में भी हुआ.

क्या छह फुट से लंबे तेज गेंदबाज को देखते ही शरीर में सनसनी पैदा होती है? या एशिया से बाहर चार स्लिप, एक गली व पॉइंट पर मुस्तैद फील्डर्स को देखते भारतीय बल्लेबाजों प्रेशर में आ जाते हैं और उनके बल्ले से लगने के बाद गेंद स्लिप या फिर विकेटकीपर के दस्तानों में ही क्यों जाती है जैसा कि केपटाउन में हुआ?

South Africa bowler Morne Morkel (L) is congratulated by teammates after dismissing unseen Indian batsman Virat Kohli during the first day of the first Test cricket match between South Africa and India at Newlands in Cape Town on January 5, 2018. / AFP PHOTO / GIANLUIGI GUERCIA

आखिर क्यों भारतीय बल्लेबाज सामने से हो रही उम्दा गेंदबाजी का सम्मान करने की बजाय अपने अहम को आगे रख कर बॉलरों के खिलाफ हावी हो कर खेलने की कोशिश करते हैं और फेल होते हैं ?

असल में यह सारा खेल पूरी तरह से जहनी नजर आता है. भारतीय टीम में हेड कोच रवि शास्त्री हैं. सहायक कोच रेलवे के पूर्व कप्तान संजय बांगड़ हैं.एक फील्डिंग कोच आर श्रीधर भी हैं. जबकि पैट्रिक फरहात टीम के डॉक्टर हैं.

इनके अलावा हर छह और विशेषज्ञ हैं जो खिलाड़ियों की दिक्कतों से निपटते हैं. क्रिकेट के लिहाज से एशिया से बाहर के दौरों पर टीम का जैसा खराब प्रदर्शन रहता हैं, उसे देख कर इतने बड़े स्पोर्ट स्टाफ की मौजूदगी पर सवाल किया जा सकता है.

क्या भारतीय टीम को साइकॉलोजिस्ट की जरूरत है

एक सवाल यह करना भी तर्क संगत है कि अगर इतने सारे विशेषज्ञ हैं तो एशिया से बाहर होने वाले दौरों पर टीम के साथ एक स्पोर्टस साइकॉलोजिस्ट रखने में क्या दिक्कत है?

पिछले दो दशकों में स्पोर्टस साइकॉलोजी में बहुत काम हुआ है और इस पर भी कि क्यों कोई बेहतरीन खिलाड़ी या टीम दबाव में हथियार डाल देती है.

खिलाड़ियों और टीमों के लिए ‘चोकर्स’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल हर दिन हो रहा है. एक ऐसी टीम जिसने एक साल में अपने मैदानों व उसके लिए जोर-जोर से उत्साह बढ़ाने वाले हजारों दर्शकों के बीच 95 फीसदी खेल में किसी तरह को कोई संकट न देखा हो, घर से बाहर एकाएक दबाव उसे हिला सकता है.

यही भारतीय टीम के साथ होता है. केपटाउन पहला मौका नहीं हैं. साथ ही टीम के साथ साइकॉलोजिस्ट होने से स्टार खिलाड़ियों को यह समझने में भी मदद मिलेंगी कि क्यों मैच जीतने या सामने वाली टीम पर हावी होने के लिए नकली आक्रमकता की जरूरत नहीं है.

सामने वाली टीम को जहनी तौर पर खत्म करने की लिए ऐसे फंसे हुए और पहुंच से बाहर मैच छीन लेने जरुरी होते जैसा कि साउथ अफ्रीका ने केपटाउन में किया.

यह बात सिर्फ स्पोर्टस साइकॉलोजिस्ट ही समझा सकता है न कि कोई ऐसा कोच या सहायक कोच जो टीम के खिलाड़ियों का ‘दोस्त’  हो.

 

 

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