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क्या 90 के दशक वाले तेंदुलकर बनते जा रहे हैं कोहली?

विराट को भी आईने के सामने खड़े होकर खुद से पूछना चाहिए कि वो खिलाड़ियों में भरोसा भर पा रहे हैं?

Updated On: Aug 06, 2018 03:52 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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क्या 90 के दशक वाले तेंदुलकर बनते जा रहे हैं कोहली?

पर्थ का टेस्ट याद है? 1992 की बात है. यानी करीब 26 साल बीत चुके हैं. संभव है कि ‘यंग इंडिया’ को उस टेस्ट की याद न हो. चलिए, उस मैच में भारत की पहली पारी याद कर लेते हैं. 135 पर छह और 159 पर आठ विकेट गिरने के बाद भारत ने 272 रन बनाए थे. एक छोर सचिन रमेश तेंदुलकर ने संभाला हुआ था. उन्होंने 114 रन की पारी खेली थी, जिसे तमाम लोग सचिन की बेहतरीन पारी मानते हैं.

1992 से 2018 की तरफ आते हैं. पहली पारी में भारत के पांच विकेट 100 पर और आठ विकेट 182 पर निकल चुके थे. भारत ने बनाए कुल 274 रन. एक छोर विराट कोहली ने संभाला हुआ था और रन उनके बल्ले से ही निकल रहे थे. 149 रन की पारी खेली थी विराट ने.

अब सवाल उठता है कि इन दोनों टेस्ट की बात करने का क्या मतलब है? मतलब है. दोनों में कुछ कॉमन है. पहला तो यह कि भारतीय पारी सिर्फ एक बल्लेबाज के इर्द-गिर्द सिमटी थी. दूसरा यह कि दोनों टेस्ट भारत हारा था. तो क्या भारतीय टीम वैसी ही होती जा रही है, जैसी 90 के दशक में थी? जब सचिन दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज माने जाते थे. लेकिन जिनके आउट होते ही भारत की उम्मीदें खत्म हो जाती थीं? हालात वही हैं, बस फोकस सचिन से हटकर विराट पर शिफ्ट हो गया है.

1992 की टीम इंडिया जैसी नहीं हैं विराट की टीम

1992 में तो सचिन कप्तान नहीं थे. लेकिन जब कप्तान बने. खासतौर पर दूसरी बार, तब भी उनकी कुछ बातें विराट से मिलती जुलती हैं. वह लगातार रन बना रहे थे. विराट भी बना रहे हैं. कप्तान के तौर पर उनके तमाम फैसलों पर सवाल उठाए जा रहे थे. वो बात विराट के लिए भी सही है. जो बात इन दोनों में अलग है, वो है टीम. सचिन के पास वाकई कमजोर टीम थी. तेज गेंदबाजी में श्रीनाथ और वेंकटेश प्रसाद के अलावा विकल्प नहीं थे. बल्कि कुछ समय तो चोटिल होने की वजह से ये खिलाड़ी भी टीम के साथ नहीं थे. विराट के पास तेज गेंदबाजी में विकल्प ही विकल्प हैं.

बल्लेबाजी में भी विराट के पास 90 के दशक की भारतीय टीम के मुकाबले बेहतर खिलाड़ी हैं. फिर ऐसा क्या है, जिससे टीम विराट के इर्द-गिर्द सिमट गई है. शायद कप्तानी. शायद वो भरोसा विराट अपनी टीम को नहीं दे पाए हैं, जो किसी को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए जरूरी है.

पर्थ टेस्ट में शतक लगाने के बाद सचिन तेंदुलकर

पर्थ टेस्ट में शतक लगाने के बाद सचिन तेंदुलकर

एजबेस्टन टेस्ट के बाद इंग्लैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन ने विराट की कप्तानी को कमजोर पाया. उन्होंने कहा कि विराट के मुकाबले जो रूट शानदार कप्तान साबित हुए. इसके उदाहरण में उन्होंने विराट के बॉलिंग चेंजेस को उदाहरण बनाया. जिस वक्त सैम करन और आदिल रशीद क्रीज पर थे, तब विराट ने करीब एक घंटे तक गेंद अश्विन को नहीं दी थी. अश्विन उस पारी में सबसे ज्यादा खतरनाक गेंदबाज लग रहे थे. सैम करन बिल्कुल नए बल्लेबाज थे. उन्हें जमने का मौका विराट ने दिया. करन ने 65 गेंद में 63 रन बनाकर टीम को ऐसे स्कोर तक पहुंचा दिया, जहां से इंग्लैंड मैच में वापस आया.

कोहली की टीम में किसी की जगह पक्की नहीं

नासिर हुसैन ने तो सिर्फ एजबेस्टन के लिहाज से बात की. लेकिन यहां सिर्फ एजबेस्टन से पीछे जाकर देखना होगा. एशिया या वेस्टइंडीज से बाहर भारत ने जो चार टेस्ट खेले हैं, उन पर नजर डालनी होगी. दक्षिण अफ्रीका दौरा भी देखना जरूरी है. याद कीजिए, जब टीम इंडिया दक्षिण अफ्रीका गई थी, तब विदेशी धरती पर सबसे लायक बल्लेबाजों की सूची में तीन नाम थे. विराट कोहली तो हैं ही, उनके अलावा अजिंक्य रहाणे और चेतेश्वर पुजारा.

पहले दो टेस्ट में अजिंक्य रहाणे को ड्रॉप किया गया. उनकी जगह रोहित शर्मा को टीम में लिया गया. विराट ने कहा कि रोहित को वर्तमान फॉर्म की वजह से टीम में लिया है. ‘इन फॉर्म’ रोहित पहले दो टेस्ट में नाकाम रहे, उसके बाद ऑउट ऑफ फॉर्म रहाणे को लाना पड़ा. एक समय जो रहाणे टेस्ट और वनडे में अपनी जगह पक्की मानते थे, वे बाहर बैठे और उसके बाद कभी वो पहले जैसे बल्लेबाज नहीं दिखाई दिए.

Indian cricket team captain Virat Kohli (L) chats with Ajinkya Rahane during the second day of the first Test match between Sri Lanka and India at Galle International Cricket Stadium in Galle on July 27, 2017. / AFP PHOTO / ISHARA S. KODIKARA

एजबेस्टन टेस्ट के दौरान मैच से पहले एनालिसिस में संजय मांजरेकर और सौरव गांगुली इस मामले पर चर्चा कर रहे थे. दोनों ने रहाणे की तकनीकी कमजोरी पर बात की. ये कमजोरियां दरअसल, आपके भरोसे से भी जुड़ी होती हैं. कुछ समय गांगुली की बुक लॉन्च के मौके पर सहवाग का किस्सा सुनाया गया था. सहवाग करियर की शुरुआत मे जल्दी आउट हुए थे. तब गांगुली ने उनके पास जाकर कहा था कि तू अगले कुछ मैच खेल रहा है. शायद उन्होंने 10 मैच कहा था. यह किसी खिलाड़ी को भरोसा देने की बात होती है. विराट की कप्तानी में किसी खिलाड़ी को ऐसा भरोसा अब तक तो नहीं मिला.

चेतेश्वर पुजारा के साथ भी कुछ ऐसा ही किया गया है. दक्षिण अफ्रीका में रहाणे को पहले टेस्ट से ड्रॉप किया था. इंग्लैंड में पुजारा को. पुजारा काउंटी क्रिकेट खेल रहे थे. उन्हें इस वक्त इंग्लिश माहौल का अच्छी तरह पता है. उनकी जगह केएल राहुल को मौका दिया. चंद रोज पहले ही केएल राहुल को अच्छी पारी के बाद ड्रॉप किया गया था. गेंदबाजों को लगातार बदलते रहने की आदत तो विराट की है ही. ऐसे में अकेले शायद उनकी ही जगह है जो पक्की है.

टीम को भरोसा दे पा रहे हैं कोहली?

विराट इस टीम के ही नहीं, दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाजों में हैं. इसमें कोई शक नहीं है. फोकस उन पर ही रहेगा, इसमें भी कोई शक नहीं है. लेकिन यह टीम ऐसी नहीं है, जिसके लिए 90 के दशक वाले तेंदुलकर बनने की जरूरत हो. विराट ने मैच के बाद प्रजेंटेशन सेरेमनी में कहा कि हर खिलाड़ी को आईने के सामने खड़े होकर खुद से सवाल करना चाहिए. यह काम सिर्फ भारतीय बल्लेबाजी के टॉप ऑर्डर को ही नहीं, खुद विराट को भी करना चाहिए. उन्हें आईने के सामने खड़े होकर खुद से सवाल करना चाहिए कि क्या टीम को वो उतना भरोसा दे रहे हैं, जितना जरूरी है? अगर भारतीय बैटिंग लाइन-अप का मतलब सिर्फ विराट रह गया है, तो कहीं वो खुद इसके लिए जिम्मेदार तो नहीं? खासकर उनकी कप्तानी.

सचिन तेंदुलकर के साथ तो दिक्कत थी कि उनकी कप्तानी जितनी कमजोर थी, उससे ज्यादा टीम कमजोर थी. यकीनन विराट के साथ ऐसा नहीं है. इसे उन्हें ठीक करना पड़ेगा. वरना अभी जो लोग एजबेस्टन में उनकी पारी को महान बता रहे हैं, वे ही  पूछेंगे कि हां, 149 रन बनाए थे. लेकिन क्या टीम को जिता पाए थे? ऐसे ही सवाल तो सचिन से भी किए जाते हैं ना!

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