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संडे स्पेशल: नई पीढ़ियों ने बदल दिया है भारत-इंग्लैंड टेस्ट मैचों का पारंपरिक रूप

भारत और इंग्लैंड के टेस्ट मैच जो पहले बेहद उबाऊ हुआ करते थे वहीं अब इन टेस्ट मैचों में ज्यादा रोमांच भर गया है

Updated On: Aug 05, 2018 09:08 AM IST

Rajendra Dhodapkar

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संडे स्पेशल: नई पीढ़ियों ने बदल दिया है भारत-इंग्लैंड टेस्ट मैचों का पारंपरिक रूप

भारत और इंग्लैंड के बीच पहला टेस्ट मैच एकदम फुल पैसा वसूल रहा है. ऐसा कम ही होता है जब भारत और इंग्लैंड के बीच टेस्ट सीरीज में ऐसा दिलचस्प खेल हो. आम तौर पर भारत और इंग्लैंड के टेस्ट मैचों के बारे में ऐसी छवि बनती है कि वे उबाऊ होते हैं. या कम से कम दोनों में किसी एक टीम के लिहाज से निराश करने वाला होता है. भारत का इंग्लैंड दौरा हो तो भारतीय खिलाड़ी, खासकर बल्लेबाज वहां की परिस्थितियों में अक्सर नाकाम होते हैं. वे वहां गेंद की स्विंग नहीं समझ पाते.अंग्रेज खिलाड़ी यहां आकर यहां की परिस्थितियों में नहीं ढल पाते.

जब हमने क्रिकेट देखना शुरू किया, तब भारत क्रिकेट की गति निहायत धीमी हो गई थी, और खेल सबसे ज्यादा रेंगते हुए भारत और इंग्लैंड के मुकाबलों में चलता था. खासकर भारत में जो मैच होते थे उनमें तो ऐसी हालत होती थी जिसे क्रिकेट समीक्षक राजू भारतन ने ‘स्नेल फोटोग्राफ्ड इन स्लो मोशन’ लिखा था. राजू भारतन ने यह किस संदर्भ में लिखा था, यह याद नहीं. लेकिन संभावना यही है कि उन्होंने किसी भारत-इंग्लैंड टेस्ट मैच के बारे में ही लिखा था.

अंग्रेज़ क्रिकेट तब इतना धीमा हो गया था कि साठ के दशक में अंग्रेज़ चयनकर्ताओं ने धीमी बल्लेबाज़ी करने के लिए एक बार केन बैंरिंगटन और एक बार जेफ़ बॉयकॉट को टीम से बाहर कर दिया था. बॉयकॉट को भारत के 1967 के इंग्लैंड दौरे के दौरान पहले टेस्ट के बाद बाहर कर दिया गया था. बॉयकॉट ने उस टेस्ट मैच की पहली पारी में 246 रन बनाए थे. लेकिन ये रन बनाने के लिए उन्होंने लगभग दो दिन का वक्त लिया. चयनकर्ताओं ने उन्हें अपने लिए बल्लेबाजी करने का दोषी पाते हुए टीम से बाहर कर दिया. इसके बावजूद हालात सुधरे नहीं. मुझे सत्तर के दशक की कुछ सीरीज याद हैं, जिनमें पूरी सीरीज भर यह आलम था कि दिन भर में अगर दो सौ रन बन जाते तो गनीमत माना जाता.

इंग्लैंड के लिए खास रहा 1972 का भारत  दौरा

उन दिनों अंग्रेज़ खिलाडी भारत आना पसंद नहीं करते थे , उनका मानना था कि भारत की परिस्थितियां, यहां का मौसम और माहौल उनकी शान के अनुकूल नहीं हैं. उन्हें यहां के मैदानों, होटलों, दर्शकों यानी हर चीज़ से दिक्कत होती थी. लेकिन सन 1972 का दौरा तो इस मायने में कुछ ज्यादा ही खास निकला.

एक साल पहले 1971 में भारत पहली बार इंग्लैंड में सीरीज जीत कर आया था. लेकिन उस अंग्रेज टीम के कई बड़े खिलाड़ियों ने भारत के दौरे पर जाने से मना कर दिया. हो सकता है कि इंग्लैंड में हारने के बाद भारत में भारतीय स्पिनरों को पांच टेस्ट तक झेलना भी उन्हें मुश्किल लग रहा हो. जेफ बॉयकॉट, ब्रायन लकहर्स्ट, जॉन एड्रिच, कप्तान रे इलिंगवर्थ, जॉन स्नो जैसे तमाम दिग्गज खिलाड़ियों ने भारत के दौरे पर न जाने की इच्छा जताई. सिर्फ विकेटकीपर एलन नॉट और स्पिन गेंदबाज डेरेक अंडरवुड जैसे गिने चुने स्थापित खिलाड़ी ही इस दौरे पर जाने के लिए रजामंद हुए.

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चयनकर्ताओं ने एकदम अलग टीम बनाई. ग्लैमॉर्गन के कप्तान टोनी लुइस को टेस्ट टीम की कप्तानी सौंपी गई. लुइस तब तक एक भी टेस्ट मैच नहीं खेले थे. वे टेस्ट क्रिकेट के शायद पहले ऐसे खिलाड़ी थे, जिन्होंने पहला टेस्ट ही बतौर कप्तान खेला. उपकप्तान माइक डेनेस थे, जिनके नाम सिर्फ़ एक टेस्ट दर्ज था. टीम में एलन नॉट और अंडरवुड तो थे ही. इक्कादुक्का टेस्ट मैच खेले पैट पोकॉक और नॉर्मन गिफर्ड जैसे खिलाड़ी भी थे. भविष्य में सफल ऑलराउंडर और कप्तान साबित हुए टोनी ग्रेग को अपने टेस्ट करियर का आगाज किए कुछ महीने ही हुए थे. टीम में डेनिस ऐमिस और कीथ फ़्लेचर दो ऐसे बल्लेबाज थे, जिन्हें बहुत प्रतिभाशाली माना जाता था लेकिन जो टेस्ट क्रिकेट में अपनी जगह नहीं बना पाए थे.

टोनी लुइस के टेस्ट और कप्तानी के करियर का आगाज बहुत अच्छा हुआ. पहला टेस्ट वे जीते और इस टेस्ट में उन्होंने सत्तर रन भी बनाए. लेकिन इंग्लैंड बाद के दो टेस्ट हार गया और दो ड्रॉ हो गए. भारत ने स्पिन के अनुकूल विकेट बनाए थे, जिससे स्पिन गेंदबाज हावी रहे. भारत में उन दिनों तेज गेंदबाज तो होते नहीं थे. एकनाथ सोलकर ने पांचों टेस्ट की दसों इनिंग्ज में शुरुआती गेंदबाजी की और एक भी विकेट नहीं लिया. उनसे कुछ ही बेहतर आबिद अली रहे, जिन्होंने चार टेस्ट मैचों में तीन विकेट लिए. जिस मैच में आबिद अली नहीं खेले, उसमें एक इनिंग्ज में सोलकर के साथ सुनील गावस्कर शुरुआती गेंदबाज़ी की और अगली इनिंग्ज में सोलकर के पहले ओवर के बाद दूसरा ओवर बिशन सिंह बेदी ने डाला.

एकनाथ सोलकर

एकनाथ सोलकर

कुल जमा खेल इस सीरीज में बहुत उबाऊ रहा. अमूमन लगभग हर इनिंग्ज में दो से कुछ ज्यादा रन प्रति ओवर की औसत से रन बने, यानी लगभग दो सौ के आसपास. इस सीरीज में रन भी कम ही बने, सिर्फ़ दो इनिंग्ज ही ऐसी थीं, जिनमें किसी टीम ने तीन सौ से ऊपर रन बनाए. मुझे तो इस सीरीज का सिर्फ़ एक रोमांचक वाकया याद आता है, जब चेन्नई टेस्ट में लगभग ड्रॉ होते मैच के एक स्पेल में इरापल्ली प्रसन्ना ने चार रन पर चार विकेट लिए और टेस्ट जितवा दिया. उन दिनों भारत इंग्लैंड की सीरीज ऐसी ही उबाऊ होती थीं, हालांकि सारा देश उसकी कमेंट्री सुनने के लिए रेडियो से चिपका रहता था. प्रसंगवश मेरे लिए वह पहली सीरीज थी, जिसमें मैंने किसी विदेशी टीम को मैदान में खेलते हुए देखा.

इसी सीरीज में दिलीप सरदेसाई ने अपना आखरी मैच कानपुर में खेला जहां अपनी आखिरी इनिंग्ज में फ़ॉलोऑन के बाद खेलते हुए उन्होंने 72 रन की पारी खेल कर भारत को हार से बचाया. टोनी लुइस ने कुल नौ मैचों में इंग्लैंड की कप्तानी की, माइक डैनेस उनके बाद इंग्लैंड के कप्तान हुए और एक साल बाद भारतीय टीम को इंग्लैंड ने उन्हीं की कप्तानी में 3-0 बुरी तरह से हराया.

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तस्वीर: न्यूज़18 हिंदी

वे कुल पंद्रह टेस्ट मैच खेले. इस सीरीज में शुरुआत करने वाले क्रिस ओल्ड आगे इंग्लैंड के सफल तेज गेंदबाज बने. कीथ फ़्लेचर और डेनिस ऐमिस इस सीरीज के बाद अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गए और काफी वक्त तक अंग्रेज़ बल्लेबाज़ी के आधार स्तंभ बने रहे.

आज भारत और इंग्लैंड की सीरीज को लेकर जितना रोमांच और दिलचस्पी है उसे देख कर वह ज़माना याद आता है जब क्रिकेट रेंगते हुए चलता था, फिर भी लोगों की दिलचस्पी कम नहीं होती थी. अब टेस्ट क्रिकेट में लोगों की उतनी दिलचस्पी नहीं है लेकिन शुक्र है कि खेल बहुत ज्यादा दिलचस्प हो गया है.

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