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जब इन दोनों की बात करेंगे, धोनी याद आएंगे

जडेजा के साथ हमेशा खड़े दिखे थे धोनी, यादव के आलोचकों में होती थी गिनती

Updated On: Mar 30, 2017 04:57 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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जब इन दोनों की बात करेंगे, धोनी याद आएंगे

उमेश यादव और रवींद्र जडेजा. जब भी ये दो नाम लेंगे, महेंद्र सिंह धोनी याद आएंगे. रवींद्र जडेजा को सपोर्ट करने के लिए. और उमेश यादव को लेकर उस रवैये के लिए, जिसे देखकर लगता था कि यादव को कप्तान का भरोसा नहीं मिला. भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सीरीज के बाद माना जा रहा है कि ये दोनों सबसे बड़ा फर्क साबित हुए हैं.

रवींद्र जडेजा इस सीरीज में ही नहीं, पूरे सीजन में जरूरत के समय विराट कोहली का बड़ा हथियार बने रहे. दूसरी तरफ अगर कोई भारतीय गेंदबाज बल्लेबाजों के लिए ऑस्ट्रेलियन गेंदबाज के मुकाबले ज्यादा बड़ा खौफ बन गया हो, तो उसकी तारीफ में और कुछ कहने की जरूरत नहीं है. ये दोनों ऐसे रहे हैं.

सीरीज में जडेजा और यादव का प्रदर्शन शानदार

जडेजा ने चार टेस्ट में 127 रन बनाए. इसमें धर्मशाला टेस्ट में 63 रन ऐसे रहे, जिसे मैच का नतीजा तय करने वाली पारी माना जा सकता है. गेंदबाजी में उनके नाम 25 विकेट रहे. औसत और विकेट, दोनों के लिहाज से वो श्रेष्ठतम साबित हुए. दूसरी तरफ, उमेश यादव को 17 विकेट मिले. अगर धर्मशाला की विकेट छोड़ दी जाए, तो पूरी सीरीज के मैचों में तेज गेंदबाजों के लिए मददगार पिच नहीं मिली. इसके बावजूद 23.41 की औसत से विकेट लेना किसी भी मायने में कम नहीं है.

यादव ने झेली थीं धोनी से आलोचना

सीरीज को सामने रखकर कुछ साल पीछे चलते हैं. तमाम प्रेस कांफ्रेंस याद कीजिए, जिनमें महेंद्र सिंह धोनी कप्तान के तौर पर आते थे. ऐसा तमाम बार हुआ, जब इशारों में उन्होंने उमेश यादव की आलोचना की. उन्होंने बार-बार बताया कि महज रफ्तार से कुछ नहीं होता. उस समय भी पाकिस्तान के महान ऑलराउंडर वसीम अकरम ने कहा था कि भारतीय कप्तानों को पता नहीं कि तेज गेंदबाजों को कैसे हैंडल किया जाता है.

अकरम लगातार कहते रहे हैं कि विश्व क्रिकेट में ज्यादातर कप्तान बल्लेबाज होते हैं. ऐसे में वो गेंदबाजों की मानसिकता नहीं समझ सकते. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उमेश यादव को सही तरीके से ‘ग्रूम’ किए जाने की जरूरत है. उनमें बड़े गेंदबाज बनने की क्षमता है.

कोहली के कप्तान बनने से यादव में आया भरोसा

विराट कोहली के कप्तान बनने के बाद से उमेश यादव में वो भरोसा आसमान छूने लगा है, जिसकी बात वसीम अकरम करते रहे हैं. भले ही विराट कोहली भी बल्लेबाज ही हों, लेकिन उन्होंने तेज गेंदबाज की जरूरतों को समझा है. तभी कुछ समय पहले स्टार स्पोर्ट्स को दिए एक इंटरव्यू में उमेश यादव ने कहा था कि विराट कोहली की कप्तानी में माहौल अलग हो गया है. उन्होंने कहा था, ‘वो हममें से बीच के एक खिलाड़ी लगते हैं. उनसे बात करना आसान लगता है.’ एक बार तो हालात ये हो गए थे कि धोनी की आलोचना के बाद उमेश यादव ने कहा था कि मैं तेज गेंदबाज हूं और अपनी रफ्तार से कोई समझौता नहीं करूंगा. धोनी ने उनकी लाइन-लेंथ पर सवाल उठाए थे.

तेज गेंदबाजों या टीम के साथ कप्तान के खड़े होने का क्या फर्क होता है, इसे विराट कोहली ने दिखाया है. भले ही आंकड़ों में वो ज्यादा न दिख रहा हो. लेकिन गेंदों में आग के मामले में साफ नजर आता है. आंकड़ों में असर इसलिए भी नहीं दिखता, क्योंकि उन्होंने विराट की कप्तानी में जितने टेस्ट खेले हैं, उनमें एक को छोड़ दिया जाए, तो बाकी सब भारत और वेस्टइंडीज की धीमी पिचों पर थे.

जडेजा हमेशा से रहे थे धोनी के करीबी

इससे उलट, रवींद्र जडेजा हैं. जडेजा को धोनी के सबसे करीबी लोगों में माना जाता रहा है. वो ‘धोनी क्लब’ के सदस्य रहे हैं. भारतीय टीम में तो साथ रहे ही. चेन्नई सुपर किंग्स में वो धोनी की कप्तानी में खेले. धोनी की पत्नी और दोस्त की कंपनी ऋति स्पोर्ट्स से उनका जुड़ाव रहा. जब-जब जडेजा पर सवाल उठाया गया, धोनी हमेशा उनके साथ खड़े हुए. जडेजा का इसे लेकर लगातार मजाक भी उड़ता रहा है. लेकिन पिछली कुछ सीरीज मे जडेजा ने दिखाया है कि वो भरोसा गलत नहीं था.

अभी जडेजा ने पिछले समय में ज्यादातर क्रिकेट घर में ही खेली है. उनका बल्ले और गेंद दोनों से रिकॉर्ड शानदार रहा है. घर और बाहर के रिकॉर्ड की तुलना करेंगे, तो निराशा होगी. लेकिन ऐसे कितने स्पिनर आपको मिलेंगे, जिनका भारत से बाहर प्रदर्शन भी शानदार रहा है. पिछले कुछ समय में उन्होंने अपने प्रदर्शन से कई बार अश्विन को भी पीछे छोड़ा है. इसी वजह से अब उन्हें धोनी क्लब का सदस्य नहीं कह सकते. वो अब ‘टीम इंडिया क्लब’ के सदस्य हैं. लेकिन ये सही है कि जब भी जडेजा की बात होगी, धोनी याद आएंगे. धोनी तब भी याद आएंगे, जब उमेश यादव की बात होगी. भले ही दोनों के मामले में याद आने का अंदाज अलग हो.

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