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भोगले पर भारी सितम: क्या आईपीएल सीजन 10 में लौटेगी हर्षा की आवाज?

उम्मीद बची है कि अगले आईपीएल में हर्षा भोगले को कमेंट्री बॉक्स में अपनी जगह फिर मिलेगी.

Updated On: Feb 06, 2017 03:29 PM IST

Austin Coutinho

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भोगले पर भारी सितम: क्या आईपीएल सीजन 10 में लौटेगी हर्षा की आवाज?

आईपीएल के पहले आठ सीजन में जो भीड़ इसकी पहचान बन गई थी वो नौवें सीजन से गायब थी.

टेलीविजन रेटिंग भी कम हो गई और महाराष्ट्र में पड़े सूखे का असर यह हुआ कि मुंबई इंडियंस और राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स जैसी टीमों ने अपना स्थानीय समर्थन भी खो दिया, क्योंकि इन टीमों के ‘होम’ मैच इनके होम ग्राउंड पर नहीं खेेले गए.

हालांकि टी 20 क्रिकेट की जो बातें लुभाती हैं वो सब तब भी थीं; ऊंचे-ऊंचे छक्के, शानदार कैच और दिल की धड़कन बढ़ा देने वाली जीतें भी. लेकिन कुछ और भी था जो गायब था....हर्षा भोगले की जानी-पहचानी दमदार आवाज, जो उनके गजब के अंदाज में क्रिकेट के रोमांच को घर-घर पहुंचाती है.

इस इंजीनियर को आईपीएल के सीजन 9 से ठीक पहले बीसीसीआई की कमेंट्री टीम से कुछ संदेहास्पद ढंग से निकाल दिया गया था. भोगले ने आईआईएम अहमदाबाद से पढ़ाई की है और उन्होंने शानदार कॉर्पोरेट करियर को ठुकराकर किस्मत और पहचान के लिए क्रिकेट को अपनाया है. माना जाता है कि भोगले को यह भी साफ ढंग से नहीं बताया गया था कि उन्हें क्यों निकाला जा रहा है.

ऐसा समझा जाता है कि उन्हें एक बॉलीवुड सुपरस्टार के ट्वीट और फिर इसको महेंद्र सिंह धोनी के रिट्वीट करने के बाद बीसीसीआई की कुर्सी पर बैठे बड़े लोगों ने शर्मनाक ढंग से हटाया था. ऐसी भी अटकलें लगी थीं कि नागपुर में खेले गए एक मैच के दौरान विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के कुछ पदाधिकारियों के साथ कमेंट्री बॉक्स में वीआईपी एंक्लोजर के रास्ते आने को लेकर हुआ उनका झगड़ा उन्हें हटाए जाने की वजह था.

वजह चाहे जो हो, क्रिकेट ने कमेंट्री बॉक्स में एक समझदार आदमी को गंवा दिया है - उम्मीद तो यही है कि ऐसा अस्थायी तौर पर हुआ.

क्रिकेट - जीने का एक ढंग

ऐसा कहते हैं कि क्रिकेट जिंदगी जीने का एक तरीका है. यह सिर्फ खेल नहीं है. त्रिनिदाद के बुद्धिजीवी सीएलआर जेम्स ने अपनी किताब ‘बियॉन्ड द बाउंड्री’ में लिखा था, 'वो क्रिकेट के बारे में क्या जानते हैं, जो सिर्फ़ क्रिकेट को जानते हैं?'

क्रिकेट के बीते डेढ़ सौ सालों के इतिहास पर नजर डालें तो मुट्ठी भर लोगों के नाम दिखेंगे, जो खेल से जुड़े रहे, जिन्होंने इसे सिर्फ खेल की तरह लिया और फिर भी कामयाब हुए. लेकिन उन खिलाड़ियों, अंपायरों, प्रशासकों, लेखकों और कमेंटेटरों की फेहरिस्त लंबी है जिन्होंने इस खेल से बहुत कुछ हासिल किया और जिनके नाम क्रिकेट के ‘वॉल ऑफ फेम’ में सुनहरे अक्षरों में लिखे गए हैं.

नेविल कार्डस, ऐलन मक्गिलवरे, जॉन ऐरलट, ब्रायन जॉनस्टन, ई डब्ल्यू स्वांटन, जैक फिंगलटन, रे रॉबिनसन, टोनी कोजियर और भी कई लोग मैदान में नहीं बल्कि मैदान के बाहर अपने काम की वजह से महान माने जाते हैं. रिची बेनॉ, इयान चैपल, बिल लॉरी, जेफ्री बॉयकॉट और सुनील गावस्कर ही शायद उन कुछ लोगों में होंगे जो माइक्रोफोन के सामने भी उतने ही बेहतरीन रहे हैं जितने कि पिच पर.

भारत के भी कई शानदार लेखकों और कमेंटेटरों ने शायद ही कोई मैच खेला हो लेकिन उन्हें जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. के एन प्रभु, बेरी सर्बाधिकारी, डिकी रत्नागर और आज के दौर के कुछ लेखक/कमेंटेटर ऐसे ही बिरले लोग हैं. इन्होंने न सिर्फ भारत और दूसरे देशों के क्रिकेटरों से सम्मान हासिल किया बल्कि उनमें से कई के साथ उनकी गहरी और लंबी दोस्ती भी रही है.

हर्षा भोगले खूब पढ़ते हैं और कई अन्य विषयों में महारत के अलावा क्रिकेट का इतिहास भी जानते हैं. वो इतने चतुर हैं कि 25 साल से करीब से देखने की वजह से इस खेल की बारीकियां बहुत अच्छे से समझते हैं. इसके अलावा उनका लहजा और शब्दों से खेलने का तरीका गजब का है. क्या यही कुछ वजह है कि लोगों ने उन्हें अपने लिए खतरा माना?

Bhogle-Harsha

कमेंटेटर ग्राहक को खुशकरते हैं

क्रिकेट अब एक बड़ा कारोबार है और माना जाता है कि आईपीएल की ही कीमत करीब साढ़े चार अरब डॉलर होगी. टीवी ने इसे ऐसा बना दिया है. टेलीविजन अधिकारों और मैच देखने आने वाले लोगों की वजह से बोर्ड, फ्रेंटाइजी, खिलाड़ी और इससे जुड़े सभी लोग पैसा बनाते हैं.

अगर कोई क्रिकेट की तुलना किसी जमकर बिकने वाले सामान से करे, तो बीसीसीआई मार्केटिंग कंपनी है और खिलाड़ी इस सामान को बनाने में इस्तेमाल हुए पुर्जे; जितने बढ़िया उतने बेहतरीन! कमेंटेटर हुए कस्टमर रिलेशन एक्जिक्यूटिव, जिनकी जिम्मेदारी है ‘ग्राहक को खुश करना’. इसलिए बीसीसीआई अगर सबसे अच्छे कमेंटेटर को कमेंट्री बॉक्स में जगह देता है तो यह समझदारी का काम होगा.

बीसीसीआई और स्टार टीवी कमेंट्री बॉक्स में ‘एक्सपर्ट’ ठूंस कर गलत करते हैं. किसी क्रिकेट मैच में दो लोग जहां साझेदार होंगे, तीसरा जुड़ते ही भीड़भाड़ हो जाएगी! आदर्श तौर पर, उन दो में से एक को खेल को निष्पक्ष और रचनात्मक ढंग से देखना चाहिए. उसका नजरिया यह होना चाहिए कि क्रिकेट में खेल के अलावा भी और कुछ है. दूसरे कमेंटेटर को खेल का ‘एक्सपर्ट’ होना चाहिए, जो ‘कस्टमर’ को सारी तकनीकी बातें रोजमर्रा की भाषा का इस्तेमाल कर बता सके.

ऐरलट और जॉनस्टन इंग्लैंड में कमेंट्री का ‘रचनात्मक’ पक्ष बहुत कलात्मक और सुंदर ढंग से संभालते थे.

एक बार लॉर्ड्स में खेले गए एक एशेज टेस्ट में जॉनस्टन ने एक गेंद के पहले की हालत का कुछ यूं बखान किया, 'लिंडसे हैसट ने फील्डिंग में बदलाव नहीं किया है, बस साइटस्क्रीन के सामने से जा रहे दो लोगों को बीयर की ट्रे के साथ थोड़ा जल्दी पहुंचा दिया है.'

स्वांसी में जॉन प्लेयर लीग में लैंकाशर और ग्लैमॉर्गन के बीच खेले गए एक मैच में क्लाइव लॉयड ने स्वार्ट की गेंद पर छक्का मार दिया. ऐरलट ने शॉट के बारे में कहा, 'उन्होंने गेंद को मारा कम, उसे अलविदा ज्यादा कहा!'

जॉनस्टन का लहजा मजाकिया होता था. 1961 के हेडिंग्ले टेस्ट में उन्होंने कमेंट्री बॉक्स में सभी को हंसा-हंसा के लोटपोट कर दिया था. उन्होंने कहा था, 'नील हार्वी लेग स्लिप पर खड़े हैं, उनके पैर बस गुदगुदी के इंतजार में खुले हुए हैं.'

एक बार गर्मी के दिनों में एक काउंटी मैच बगैर किसी रोमांच के खेला जा रहा था, कोई अपील भी लॉर्ड्स के मैदान की शांति को नहीं तोड़ पा रही थी. यही मौका था जब नए पोप वेटिकन में अपना पद संभाल रहे थे (परंपरा है कि इसके बाद चुनाव के कागजों को जला दिया जाता है, जिससे निकला सफेद धुआं नए पोप की नियुक्ति की घोषणा समझा जाता है.) अचानक लॉर्ड्स के पास की एक चिमनी से सफेद धुआं निकला. ऐरलट जो अब तक प्रेस बॉक्स में दूसरे रिपोर्टरों के साथ बैठे-बैठे ऊब चुके थे, अचानक बोल उठे, 'ठीक है, अब आप लोग आराम कर सकते हैं. ई डब्ल्यू स्वांटन को नया पोप बना दिया गया है.' इसका तालियों की गड़गड़ाहट और जोरदार हंसी के साथ स्वागत किया गया था.

हर्षा भोगले के भी वन लाइनर चुटीले होते हैं! इन उदाहरणों पर नजर डालिए.

एक मैच में धोनी एक के बाद एक गेंद पर बाउंड्री मारे जा रहे थे फिर तेंडुलकर ने बड़े प्यार से एक गेंद को बाउंड्री के पार पहुंचा दिया, हर्षा ने कहा: 'यहां एक तरफ सर्जन है, दूसरी ओर कसाई!'

ऐसे ही एक मौके पर माइकल क्लार्क स्लिप में कैच आउट हो गए थे लेकिन कुछ देर तक अंपायर के फैसले का इंतज़ार करते रहे. हर्षा ने चुटकी ली, 'शायद वो इंतज़ार कर रहे हैं कल के अख़बार का, जिसमें उन्हें आउट करार दिया जाएगा.'

‘द वॉल’ के नाम से मशहूर राहुल द्रविड़ की महानता के बारे में उनका ये कहना: “क्या इस दुनिया में राहुल द्रविड़ के गार्ड लेने से ज्यादा सुकून देने वाली कोई चीज है?'

एक अच्छा कमेंटेटर जानता है कि टीवी पर कमेंट्री एक तरह की व्याख्या है और रेडियो की गेंद-दर-गेंद कमेंट्री से उसका अलग होना जरूरी है. टीवी की कमेंट्री में तस्वीरों का दबदबा होता है और कमेंट्री ऐसी हो कि उसका एहसास अवचेतन के स्तर पर हो. हर्षा भोगले के शब्द कानों में चुभते नहीं; उनके शब्दों में गांव की किसी नदी के कंकरों पर बहने का रेशमीपन है. इससे भी बढ़कर ऑस्ट्रेलियाई कमेंटेटरों की तरह उन्होंने ‘ठहराव’ की कला सीख ली है और खेल के दौरान होने वाले ब्रेक का इस्तेमाल मनोरंजन के लिए करते हैं.

भारतीय क्रिकेट में बदलाव

भारतीय क्रिकेट, अच्छे के लिए हो या बुरे के लिए, बदलाव के दौर से गुजर रहा है. उम्मीद यही की जाती है कि बदलाव खेल के भले के लिए ही होगा और बोर्ड का कामकाज अधिक पेशेवर और पारदर्शी होगा.

यह भी उम्मीद की जा सकती है कि प्रतिभाशाली लोग – खिलाड़ी, कोच, प्रशासक, कमेंटेटर वगैरह – कुर्सी पर काबिज लोगों की मनमर्जी से दरकिनार नहीं किए जाएंगे; न ही बड़ी हस्तियों और नेताओं को क्रिकेट के मसलों में टांग अड़ाने दी जाएगी.

अब भी उम्मीद बची है कि आईपीएल के सीजन 10 में हर्षा भोगले को कमेंट्री बॉक्स में अपनी जगह फिर मिलेगी. चलिए इंतजार करते हैं!

(पहली तस्वीर हर्षा भोगले के ट्विटर हैंडल से)

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