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अगर हार के बाद किसी खिलाड़ी को बुरा-भला कहते हैं तो इसे जरूर पढ़ें

बेटी को 'मिस' करते हैं श्रीजेश, टीम के लिए बेटे का इलाज नहीं करा पाए हरेंद्र

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Feb 27, 2017 03:09 PM IST

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अगर हार के बाद किसी खिलाड़ी को बुरा-भला कहते हैं तो इसे जरूर पढ़ें

बातचीत के बीच एक नाम आता है. उसके बाद जैसे सब कुछ बदल जाता है. बातचीत श्रीजेश के साथ. भारतीय हॉकी टीम के कप्तान, जिन्हें अपने मस्ती-मजाक के लिए जाना जाता है. नाम – अन्नश्री, जो श्रीजेश की बेटी हैं.

तीन साल की बेटी. जिक्र आते ही श्रीजेश की आंखों में एक चमक आती है. उदासी, खुशी, चमक सब-कुछ एक साथ. उस भाव को शब्दों में बयां करना आसान नहीं. वो कहते हैं, ‘मैंने उसका बचपन देखा ही नहीं. हर बार मैं टूर्नामेंट या कैंप के लिए बाहर होता था, वो बड़ी हो जाती थी. जब वो चार दिन की थी, मैं कॉमनवेल्थ गेम्स के कैंप के लिए चला गया था. जब चैंपियंस ट्रॉफी के लिए गया, तो पता चला कि वो घुटनों के बल चलने लगी है. उसके बाद गया तो घर से वीडियो आया, वो अपने पैरों पर खड़े होकर चलने लगी थी.’

बातों के बीच बेटी के बड़े होने की खुशी और उसे बड़ा होते न देखने का अफसोस दिखता है. वो कहते हैं, ‘मैंने वो सब मिस किया.’ लेकिन इस बीच देश के लिए खेलने का गर्व जगता है, ‘जब देश के लिए खेल रहे हों, तो कुछ तो मिस करना ही पड़ेगा. एक दिन वो बड़े होकर कहेगी कि मुझे पापा पर गर्व है.’

ये लगभग हर खिलाड़ी की जिंदगी है. खासतौर पर ओलिंपिक खेलों से जुड़े खिलाड़ियों की ज्यादा, जिन्हें साल में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में खेलने के अलावा लंबे समय तक ट्रेनिंग कैंप में रहना पड़ता है.

श्रीजेश की ही तरह पिछले दिनों जूनियर वर्ल्ड कप जीतने वाली हॉकी टीम के कोच हरेंद्र सिंह की कहानी है. हरेंद्र की टीम जब तैयारी में लगी थी, उसी दौरान उनके बेटे के साथ एक दुर्घटना हुई. फुटबॉल खेलते हुए उसकी आंख में चोट लगी और लगभग 80 फीसदी रोशनी चली गई. हरेंद्र कहते हैं, ‘उस वक्त मैं ज्यादा वक्त नहीं दे पाया. मेरी टीम में हर खिलाड़ी ऐसा है, जिसके घर में कोई न कोई समस्या थी. लेकिन वो सब खेल रहे थे. ऐसे में मैं कैसे जा सकता था.’

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अब हरेंद्र अमेरिका जाने की योजना बना रहे हैं, ताकि बेटे की आंखों का इलाज हो सके. उनके लिए तो बेटे का जन्म भी इसी तरह की कहानी लिए हुए हैं. हरेंद्र तब पाकिस्तान में थे. वह कहते हैं, ‘मेरी पत्नी के पास घर का कोई नहीं था. सब गांव में थे. मैं पाकिस्तान में था. डॉक्टर्स ने सीजेरियन के लिए कहा. इसके लिए कंसेंट फॉर्म पर साइन करने के लिए कोई नहीं था. मैंने स्काइप से पाकिस्तान से कंसेंट फॉर्म भेजा था.’

ये चंद कहानी हैं, जो खिलाड़ी या कोच की जिंदगी का एक पहलू दिखाती हैं. हम सब जानते हैं कि सचिन तेंदुलकर पिता की मौत के बाद वापस वर्ल्ड कप मैच खेले थे. इसी तरह हॉकी खिलाड़ी तुषार खांडकर और मनप्रीत सिंह ने भी किया था. ये उन खिलाड़ियों की मुश्किल जिंदगी के बारे में कहानी हैं. इनकी एक हार के बाद हम बड़ी आसानी से बता देते हैं कि अरे, खेल में ध्यान नहीं है.

श्रीजेश अपनी बेटी के लिए कहते हैं, ‘अब वो बड़ी हो गई है. जब भी मैं गाड़ी में बैठता हूं, उसे लगता है कि पापा मुझे छोड़कर जाने वाले हैं. वो गाड़ी में आगे आकर बैठ जाती है.’ श्रीजेश जब भी कैंप या मैचेज के लिए निकलते हैं, अब बेटी के सोने के वक्त की टिकट बुक करते हैं, ‘बिल्कुल सुबह या देर रात या दोपहर में जब वो सोती है, उस टाइम की टिकट बुक करता हूं.’

इनके बीच वो बताना नहीं भूलते कि बेटी कैसे पापा की हर जीत पर डांस करती है. कैसे वो मैच देखती है. जो उनके खिलाफ गोल मारता है, उसकी शिकायत करती है, ‘हरमन (हरमनप्रीत) ने दो गोल किए थे, तो वो आजकल बोलती है कि पापा हरमन को मारना है.’ इन सारी बातों के बीच श्रीजेश की आंखों में चमक बरकरार रहती है, जिसमें बेटी की बातों को लेकर खुशी है... और उससे दूर रहने की कसक... लेकिन हर खिलाड़ी को इसी के साथ जीना होता है.

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