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क्यों एशेज में फिक्सिंग के दावे के बावजूद मुश्किल है फिक्सरों को क्लीन बोल्ड करना !

भरतीय कानून फिक्सरों को फिक्सर कहने की इजाजत नहीं देते हैं, कानूनी दांव-पेचों का फायदा उठाकर बरी हो जाते हैं फिक्सर्स

Updated On: Dec 16, 2017 12:14 PM IST

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu

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क्यों एशेज में फिक्सिंग के दावे के बावजूद मुश्किल है फिक्सरों को क्लीन बोल्ड करना !

ब्रिटेन के अखबार द सन के दो भारतीय बुकियों के स्टिंग आपरेशन में कैमरे में कैद करने से साबित हो गया है क्रिकेट से भ्रष्टाचारियों को पूरी तरह से खत्म करना संभव नहीं है. आईसीसी इस ऑपरेशन की तारीफ कर रही है लेकिन दावा भी कर रही है कि कोई स्पॉट फिक्सिंग नहीं हुई है.

असल में आईसीसी हो या भारतीय क्रिकेट बोर्ड, इस तरह के फिक्सर के पकड़े जाने के बाद भी भ्रष्टाचार को खारिज कर देना उनकी मजबूरी है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कानून उन्हें फिक्सरों को फिक्सर कहने की इजाजत नहीं देते.

द सन ने दिल्ली के पूर्व क्रिकेटर सोबर्स जोबन और उसके साथी प्रियांक सक्सेना को बतौर फिक्सर कैमरे में कैद किया है लेकिन दिक्कत यह है कि इस सब के बावजूद आईसीसी,  बीसीसीआई या भारतीय पुलिस इन दोनों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकती.

असल में द सन की खबर के मुताबिक उनके अंडरकवर रिपोर्टरों ने इन दोनों के खिलाफ भारत और दुबई में स्टिंग किया है.

भारत और संयुक्त अरब अमीरात में सट्टेबाजी पर प्रतिबंध है और ऐसा कोई कानून नहीं है जो बुकियों के तुरंत जेल में बंद कर सकें.

साथ ही इस तरह के किसी भी मामले में कैश का आदान-प्रदान साबित करना बहुत जरुरी होता है.

यहां द सन के स्टिंग पर सवाल नहीं उठाए जा रहे हैं बल्कि इन खेल के भ्रष्ट करने वाले कथित बुकियों को थोड़ी और मजबूती से शिकंजे में लिया जा सकता था जिससे उनका  बाहर  निकला आसान न होता.

मसलन , दिल्ली या दुबई में स्टिंग की बजाय आस्ट्रेलिया या इंग्लैंड में यह स्टिंग होने की स्थिति में इन दोनों को कानूनी शिकंजे में लिया जा सकता था और उनके दावों की जांच हो सकती थी क्योंकि इन दोनों मुल्कों में सट्टेबाजी को लेकर कानून है.

जो लोग कानूनी तौर पर सारे टेक्स अदा करके मैच में पैसा लगा रहे हैं, कानून में उनके अधिकारों की रक्षा के लिए प्रावधान है.

2010 में ब्रिटेन में नोटों के बंडल के साथ पकड़े गए थे फिक्सर्स

2010 में ब्रिटेन के अखबार न्यूज ने एक पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश के सामने  हजारों पाउंड के बंडल रख दिए. पाकिस्तानी टीम के मोहम्मद आसिफ, सलमान बट्ट और मोहम्मद आमिर  पकड़े गए.

फिक्सर के अलावा इन तीनों पर न केवल प्रतिबंध लगा बल्कि उन्हें जेल भी हुई क्योंकि ब्रिटेन में सट्टेबाजी लीगल होने के कारण कानून था.

बीसीसीआई की एंटी करप्शन यूनिट के मुखिया नीरज कुमार ने दावा किया है कि  जोबन की गतिविधियों के बारे में उसे जानकारी थी लेकिन उसे रोकने के लिए किया क्या गया, यह शायद ही  कभी सामने आए.

असल में बीसीसीआई की लीगल टीम की एक सीधी राय है कि पुख्ता सुबूत  होने के बाद भी किसी को फिक्सर साबित करना बहुत मुशिकल है. साथ ही जिस पर इल्जाम लगेगा वह बोर्ड पर मानहानि का मुकदमा भी कर सकता है.

यही कारण है कि बीसीसीआई की  एंटी करप्शन यूनिट ने ऐसे फिक्सरों के खिलाफ मिली जानकारियां कभी खिलाड़ियों के साथ साझा नहीं की.

जस्टिस मुकुल मुदगल की रिपोर्ट ने भी खड़े किए सवाल

यह  बात 2013  के आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग पर जस्टिस मुकुल मुदगल पैनल के जांचकर्ता बीबी मिश्रा की गहन जांच में सामने आया. बाद में जस्टिस आरएम लोढ़ा की तीन सदस्यीय कमेटी ने भी सुप्रीम कोर्ट को सौंपी अपनी आखिरी रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की.

बोर्ड का तर्क है कि किसी को फिक्सर घोषित करके वह खुद को मुश्किल में नहीं डालना चाहता. भ्रष्टाचार को रोकने के लिए वह अपने खिलाड़ियों के शिक्षित करने पर बहुत काम कर रहा है और इसके परिणाम सामने आ रहे हैं.

लेकिन जोबन जैसे फिक्सर जब आईपीएल में अब भी आईपीएल में भ्रष्टाचार और क्रिकेटरों के भ्रष्ट होने का दावा कर रहे हैं तो मामला काफी संगीन हो जाता है.

हो सकता है कि बीसीसीआई का फिक्सरों पर हाथ न डालना सही फैसला हो क्योंकि 2013 के सभी आरोपी बाइज्जत रिहा हो चुके हैं.

लेकिन बोर्ड  जेंटिलमैन गेम को बचाने के लिए काफी देर से लंबित स्पोर्टस फ्रॉड प्रवेंशन बिल 2013 को लाने के लिए सरकार को गुजारिश कर सकता है क्योंकि इसमें भ्रष्टाचारियों के लिए दस साल तक की कैद का प्रावधान हैं.

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