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क्रिकेटरों की देशभक्ति को सलाम... लेकिन मोहम्मद अली जैसी हिम्मत दिखाएं तो बदलेगा इंडिया

वियतनाम के खिलाफ लड़ाई लड़ने के सरकारी फरमान को खारिज कर दिया था अली ने

Updated On: Oct 03, 2017 12:47 PM IST

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu

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क्रिकेटरों की देशभक्ति को सलाम... लेकिन मोहम्मद अली जैसी हिम्मत दिखाएं तो बदलेगा इंडिया

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ नागपुर में वनडे सीरीज 4-1 से जीतने के बाद कप्तान विराट कोहली अपने चीफ कोच रवि शास्त्री के साथ कैमरे के सामने थे. टीम के अन्य सदस्य भी थे. विराट बता रहे थे कि कि भारत सरकार के महत्वाकांक्षी सपने स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाया जा सकता है. ये सभी एक डस्टबिन से सामने खड़े होकर संदेश दे रहे थे.

सीरीज के दौरान ब्रॉडकास्टर ने स्वच्छ भारत अभियान का जबरदस्त प्रचार किया. कमेंटेटर लगातार याद दिला रहे थे कि 2 अक्तूबर है और इस अभियान के देश के लिए क्या मायने हैं. विराट जैसा बड़ा खिलाड़ी सरकार के किसी अभियान के साथ जुड़ता है तो काफी असर पड़ता है. इसके लिए भारतीय कप्तान सहित इस लोकसेवा में हिस्सा लेने वाले हर खिलाड़ी की तारीफ होनी चाहिए.

बहस को बढ़ाने के लिए अमेरिका से आई एक खबर का जिक्र करना जरूरी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड  ट्रंप ने एनबीए चैंपियन टीम गोल्डन स्टेट वॉरियर को व्हाइट हाउस का न्योता भेजा. लेकिन टीम के स्टार स्टीफ करी ने जाने से इनकार कर दिया. इसके बाद बाकी सदस्यों ने भी आमंत्रण ठुकरा दिया. इन खिलाड़ियों का तर्क है कि ट्रंप की बदौलत अमेरिका में रंगभेद को लेकर अन्याय हो रहा है.

नेशनल फुटबॉल लीग के टॉप क्लब केल्वलैंड कैवलरिज के स्टार फॉरवर्ड लीब्रॉन जेम्स और बफेलो बिल्स ने भी ट्रंप को देश में मच रही अफरातफरी के लिए खुल कर गालियों के साथ शर्मिंदा किया है. अंग्रेजी में ऐसे कदम को किसी मसले पर कोई स्टैंड लेना कहते हैं.

अब अपने मुल्क की तरफ लौटते हैं. 12 अगस्त से गोरखपुर में बच्चों के मरने का सिलसिला ऐसा चला, जैसे किसान कीटनाशकों से फसल के कीड़ों को मारते हैं. लेकिन विराट के ट्विटर हैंडिल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखी. 29 सितंबर को मुंबई के प्रभादेवी स्टेशन पर भगदड़ में 22 लोग मारे गए. विराट अगले दिन बता रहे थे कि ग्रीन टी के क्या फायदे हैं. संभव है कि किसी राजनीतिक विवाद से बचने के लिए उन्होंने इस सब से दूर रहना भी सही समझा हो.

गोरखपुर में बच्चों की  मौत पर सचिन तेंदुलकर जैसा महान खिलाड़ी भी चुप रहा. हां, इतना जरूर है कि मुंबई में रेलवे स्टेशन पर सरकारी नरसंहार का शिकार हुए लोगों के बारे में उन्होंने एक ट्वीट में दुख जताया. लेकिन वह सरकार के खिलाफ कुछ कहने की हिम्मत नहीं दिखा पाए और न ही यह बता पाए कि उन्होंने खुद मुंबई के रेलवे स्टेशनों और वहां के ब्रिजों की हालत में सुधार के बारे में संसद में सवाल किया था और आश्वसन देने के बाद भी सरकार ने कुछ नहीं किया.

टीम से बाहर बैठे गौतम गंभीर आतंकवादियों के हाथों मारे गए पुलिसवालों के बच्चों की परवरिश से लेकर लोगों में राष्ट्रीयता भरने का हर काम कर रहे हैं. अच्छी बात है. लेकिन देश को लेकर अभी उनमें भी स्टैंड लेने की ताकत नहीं आई हैं.

गोरखपुर में बच्चों की मौत पर गंभीर के ट्वीट किया कि आजादी के कई दशकों के बाद भी निर्दोष बच्चे मर रहे हैं, यह शर्मनाक है. यूपी सरकार के खिलाफ एक शब्द कहने की हिम्मत उनमें नहीं थी.

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मुंबई में मौतों के बाद ट्वीटर किंग वीरेंद्र सहवाग ने संदेश दिया कि सपनों के शहर में लोग इस तरह से खतरा उठा कर सफर करते हैं. नागरिकों की सुरक्षा समय की मांग है. लेकिन यह सवाल करना भूल गए कि इन मौतों का जिम्मेदार किसे माना जाए या इस हादसे के लिए किसकी गिरफ्तारी होगी.

गोरखपुर कांड के बाद सहवाग के लगातार चार ट्वीट किए लेकिन यह सब ममता और संवेदना से भरे थे. सिस्टम पर प्रहार करने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाए.

अंत में भी फिर अमेरिका का जिक्र करना जरूरी है.

1967 में महान मुक्केबाज मोहम्मद  अली को सरकार ने आदेश दिया कि उन्हें वियतनाम जाकर लड़ना होगा. अली का तर्क था कि वह मुस्लिम हैं और वॉर के खिलाफ हैं. इसलिए वह किसी भी कीमत पर वियतनामियों के खिलाफ लड़ने नहीं जाएंगे.

कोर्ट में अली ने दलील दी, ‘मेरी अंतरआत्मा मुझे मेरे भाईयों या रंग से अलग दिखने वाले या गरीब-भूखे लोगों पर गोली चलाने की इजाजत नहीं देती. मैं उन गरीब कमजोर लोगों को गोली कैसे मार सकता हूं? इससे अच्छा मुझे जेल में डाल दिया जाए.’ इंग्लिश में इसे किसी मुद्दे पर स्टैंड लेना कहते हैं.

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