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सुप्रीम कोर्ट के क्लीन क्रिकेट के फैसले का एक साल, हालात और बेहाल

क्या सुप्रीम कोर्ट का आदेश बीसीसीआई को सुधार पाई?

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu Updated On: Jul 19, 2017 12:26 PM IST

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सुप्रीम कोर्ट के क्लीन क्रिकेट के फैसले का एक साल, हालात और बेहाल

मुद्दे पर बात शुरू करने से पहले सुप्रीम कोर्ट के 18 जुलाई, 2016 के ऐतिहासिक फैसले के पॉइंट 92 पर निगाह डालते हैं. फैसला जस्टिस आरएम लोढ़ा की भारतीय क्रिकेट बोर्ड के प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए सिफारिशों को लागू करने के पक्ष में दिया गया था.

पॉइंट 92 सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘यह परिभाषित करने की जरूरत नहीं है कि बीसीसीआई लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों और निर्देशों को लागू करने में पूरा सहयोग करेगा. अगर ऐसा करने में कोई भी बाधा आती है तो कमेटी अदालत के पास आ कर उचित दिशानिर्देश पाने के लिए आजाद है.’

इस आदेश को पूरा एक साल हो गया है और जिस तरह से बीसीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाई हैं, उससे सवाल उठता है कि 18 जुलाई के आदेश के मायने क्या हैं!

बीसीसीआई के दावे में कितना दम?

बीसीसीआई दावा कर रहा है कि उसने लोढ़ा कमेटी की दो-तीन मांगों को छोड़कर को बाकी लागू कर दिया है. लेकिन सच क्या है, सभी के सामने है क्योंकि बोर्ड और उसकी राज्य इकाइयों के संविधान में बदलाव किए बिना कमेटी की किसी भी सिफारिश को लागू नहीं किया जा सकता. बीसीसीआई ने अभी तक ऐसा करने की कोई कोशिश नहीं की है.

इस 14 जुलाई की सुनवाई को दौरान कमेटी के वकील यूसी सिंह ने गुस्साए लहजे में सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि किस तरह 26 जून की स्पेशन जनरल मीटिंग को पूर्व अध्यक्ष श्रीनिवासन और पूर्व सचिव निरंजन शाह ने हाईजैक कर लिया और सभी स्टेट एसोसिएशनों को कहा कि लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू करने से इनकार कर दो.

इससे बड़ा मजाक सुप्रीम कोर्ट के आदेश के साथ क्या हो सकता है! लेकिन सबसे शर्मनाक पहलू सुप्रीम कोर्ट की बोर्ड को चलाने के लिए बनाई गई अपनी प्रशासकों की कमेटी (सीओए) है.

इस कमेटी को जिम्मेदारी दी गई थी कि जब तक बोर्ड और उसकी स्टेट एसोसिएशन लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू नहीं कर लेती, वह बीसीसीआई का काम देखे. लेकिन पहली प्राथमिकता सिफारिशों को लागू करवाने की थी. लेकिन कमेटी ने इस ओर अभी भी अपनी आंखें बंद कर रखी हैं और पूरा ध्यान बाकी चीजों में लगा रखा है.

उसका पूरा फोकस बीसीसीआई के नामालूम कितने करारों पर है. इस साल जनवरी के अस्तित्व में आने के बाद से आईपीएल से लेकर टीम के प्रायोजकों से जुड़े न जाने कितने करारों पर उसने फैसला किया है. लेकिन बीसीसीआई कमेटी की सिफारिशें लागू कर रही है या नहीं, यह बताने में सीओए नाकाम रही है.

यह सही है कि 14 जुलाई की सुनवाई में सीओए के वकीलों ने कहा कि श्रीनिवासन और शाह ने स्टेट एसोसिएशनों से कहा कि सिफारिशें लागू न करो लेकिन उसने कोर्ट को अभी तक यह सूचित नहीं किया है कि कितनी स्टेट सिफारिशों ने लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के लिए अपने संविंधान में संशोधंन कर  लिया है या फिर कितनी ने इसके लिए विशेष बैठक बुलाई है.

स्टेट एसोसिएशनों के सूत्रों के अनुसार इस मुद्दे पर सीओए और स्टेट एसोसिशनों की मई में मुंबई में हुई बैठक सिर्फ 14 मिनट चली. सीओए के इस रवैये से जस्टिस लोढ़ा का खफा होना लाजिमी है.

फर्स्ट पोस्ट से इस बारे में बातचीत में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रहे लोढ़ा ने कहा कि सीओए का सबसे पहला काम उनकी कमेटी की सिफारिशों को लागू करवाने का था. लेकिन वह दूसरे ही मुद्दों में उलझी है. उनकी नजर में सिफारिशों को लागू करने की दिशा में सीओए एक इंच आगे नहीं बढ़ी है और उसका ध्यान ‘कांट्रेक्चुअल मैटर्स’ पर ज्यादा लगा है.

इतना ही नहीं, यह सीओए आसान काम को भी ठीक से संभाल पाने में नाकाम रही है. कोच की नियुक्ति को लेकर हुआ विवाद सबसे ताजा उदहारण हैं. पहले तो उसने तारीख निकल जाने के बाद फिर से कोच पद के आवेदन जारी करने पर सिर्फ खानापूर्ति के नाम पर विरोध किया लेकिन अपनी ताकत को इस्तेमाल नही किया.

फिर क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी के राहुल द्रविड़ और जहीर खान को कंसल्टेंट बनाए जाने के फैसले पर सवाल उठा दिए. सवाल यह है कि जब प्रशासक वह है तो एडवाइजरी कमेटी को पहले की ब्रीफ क्यों नहीं किया गया कि उसका दायरा क्या है.

इस सब में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, वीवीएस लक्ष्मण, राहुल और जहीर जैसे दिग्गज को जिल्लत का सामना करना पड़ा लेकिन बीसीसीआई वहीं हैं जहां वह 18 जुलाई के फैसले से पहले थी.

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