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योग सिर्फ वजन घटाने की कवायद नहीं बल्कि इस से कहीं ज्यादा है

योग सिर्फ 'योगा मैट' पर 'योगा इंस्ट्रक्टर' से वजन कम करना सीखने की कवायद नहीं है, योग में शरीर के साथ-साथ मानसिक शांति, जीवन में संतुलन और तमाम दूसरी बातें आती हैं

Updated On: Jun 28, 2018 04:04 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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योग सिर्फ वजन घटाने की कवायद नहीं बल्कि इस से कहीं ज्यादा है
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21 जून को योग दिवस है. योग भारत की तरफ से दुनिया को दिया गया तोहफा माना जाता है. सनातन धर्म के संपूर्ण अवतार कृष्ण को योगेश्वर कहा जाता है, वहीं शिव योगिराज हैं. 70 के दशक में हिप्पी कल्चर की आमद के साथ योग 'योगा' बना और दुनिया भर में अलग-अलग रूप में फैला. दीपक चोपड़ा जैसे स्प्रिचुअल गुरू बने. विक्रम योगा की दीवानगी हॉलीवुड में छाई. हिंदुस्तान में योग और स्प्रिचुएल्टी का राजनीति से भी समागम काफी फला-फूला. इंदिरा गांधी के समय धीरेंद्र ब्रह्मचारी हुआ करते थे. एक समय में ओशो और महर्षि रमण ने दुनिया भर में नाम और सुर्खियां बटोरी. पिछले दशक में रामदेव ने अनुलोम-विलोम सिखाना शुरू कर नाम कमाया. शिल्पा शेट्टी और उनकी देखा-देखी तमाम हीरोइनों ने भी अपने योग सिखाने के वीडियो पेश किए. प्रधानमंत्री भी दुनिया भर में अपनी यात्राओं में गांधी, बुद्ध और योग की विरासत का ज़िक्र करते हैं.

लेकिन योग सिर्फ तरह-तरह के आसन करके अपने शरीर को फिट रखना नहीं है. भारतीय दर्शन में शारीरिक फिटनेस योग का सिर्फ एक अंग है. तमाम कारणों से लोग योग शुरू तो करते हैं लेकिन उसे संपूर्ण रूप में अपना नहीं पाते. योग सिर्फ 'योगा मैट' पर 'योगा इंस्ट्रक्टर' से वजन कम करना सीखने की कवायद नहीं है. योग में शरीर के साथ-साथ मानसिक शांति, जीवन में संतुलन और तमाम दूसरी बातें आती हैं. अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर योग सीखने और सिखाने वाले दोनों को सोचना चाहिए कि हममें से कितने लोग योग को सही मायनों में अपना पाते हैं.

आसन योग का सिर्फ एक हिस्सा है

भारतीय दर्शन में योग के आठ अंग हैं. यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि. यम का अर्थ है अपने अंदर नैतिकता लाना, नियम मतलब अपनी ज़िम्मेदारियों वगैरह का पालन करना. इन दोनों को जीवन में अपनाने के बाद आसन की बात आती है जिसे आजकल 'योगा' बताकर पैकेज किया जाता है. आसन के बाद सांस पर नियंत्रण यानी प्राणायाम. चीज़ों के मोह से ऊपर उठने का अर्थ प्रत्याहार है. किसी चीज़ पर मनन, चिंतन करना धारणा है. ध्यान अपने अंदर का चिंतन है और अंतिम स्थिति समाधि है. समाधि को अंग्रेज़ी शब्द एनलाइटेनमेंट के बराबर में रखा जा सकता है.

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मज़ेदार बात ये है कि योग के ब्रैंड एम्बैसेडर बने ज़्यादातर लोग आसन के बाद प्रत्याहार तक भी नहीं पहुंच पाते. तमाम बाबा और गुरू व्यापार और राजनीति के मोह में पड़े रहते हैं. इनमें भी शारिरिक सुख के लिए नैतिकता को परे रखने वालों की गिनती भी कम नहीं. इसके बाद राजनेता, फिल्मी ऐक्टर और दूसरों की बात कौन करे.

योग में भी अलग-अलग फैशन चलता है

कुछ समय पहले एक वीडियो वायरल हुआ था. इसमें बियर योगा दिखाया गया था. इस तरह के योग को मज़ाक से ज्यादा क्या माना जाए. अगर सिर्फ कसरत के स्तर पर भी देखें तो योग करके जितनी कैलोरी खर्च होंगी उससे ज्यादा बीयर से शरीर में अंदर चली जाऐंगी. खैर, ये कोई पहला मामला नहीं है. योग में भी अलग-अलग चलन आते और जाते हैं. कुछ बरस पहले ट्रेन, बस और दफ्तर जैसी जगहों पर लोग नाखून रगड़ते दिख जाते थे. सुबह-सुबह अनुलोम-विलोम और कपाल भाति करने वालों की कमी नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि शरीर के सारे कष्ट बस इन्हीं प्राणायम से दूर हो जाएंगे. भारत में ओबीस (मोटे) लोगों की आबादी खत्म हो जाएगी. बढ़ी हुई तोंद का दौर हिंदुस्तान में इतिहास का हिस्सा बन जाएगा. मगर समय के साथ गुरूजी का ध्यान सांस लेना और छोड़ना सिखाने की जगह दूसरी जगहों पर चला गया. लोग भी पतंजली के सूत्रों की जगह दूसरे उत्पादों पर ध्यान देने लगे.

इससे पहले नेति का दौर भी चल चुका है. नाक के एक छेद से डालकर दूसरे से पानी निकालना. सूत, रबर की ट्यूब जैसी और चीज़ों को नाक और मुंह से निकालना खूब प्रसिद्ध हुआ. तब नेति से ज्यादा किसी और चीज़ के फायदे नहीं होते थे. इसी तरह का लोकप्रियता एक समय पर सुदर्शन क्रिया की भी रह चुकी है. हिंदुस्तान में ही क्यों दुनिया भर में ऐसे दौर चलने के तमाम किस्से मिलेंगे. उदाहरण के लिए 'दही खाने से आदमी 100 साल जी सकता है', जैसे बहुत से सिद्धांत दुनिया में अलग-अलग समय पर माने गए हैं. अगर योग के सारे अंगों को शामिल करें तो आचार्य रजनीश 'ओशो' के कम्यून की कई परंपराएं योग की लोकप्रियता में शामिल हो सकती हैं.

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ऐसा नहीं है कि इन सारे आसनों और प्राणायाम के फायदे नहीं होते. बिलकुल होते हैं, बल्कि एक नियमित दिनचर्या के रूप में योग किसी को भी लाजवाब रूप से फिट रख सकता है. लेकिन किसी खास आसन या प्राणायाम के लोकप्रिय होने पर उसे तमाम बीमारियों का रामबाण इलाज बता दिया जाता है. योग से वजन, ब्लड प्रेशर और डिप्रेशन जैसी बीमारियों पर असर पड़ने तक तो ठीक, उसे एचआईवी, कैंसर और होमोसेक्सुअल व्यक्ति को स्ट्रेट बनाने की बाते कहीं जाती हैं. योग में आयुर्वेद, घरेलू नुस्खों और प्राकृतिक चिकित्सा का भी मेल कर दिया जाता है. इस तरह योग रोडवेज़ बस में 10 रुपए में हर मर्ज़ का इलाज देने वाला नुस्खे जैसा बन जाता है. अंत में हर योग शिक्षक के इस स्तर पर लोकप्रिय होने पर उसकी राजनीतिक महत्वाकांछा जाग जाती है. इसके बाद कोई पार्टी, कोई विचारधारा या कोई दौर हो, सियासत के तमाशे में एक नया चेहरा जुड़ जाता है.

कृष्ण को योगेश्वर कहा जाता है, वहीं शिव योगिराज हैं

वैसे भारतीय दर्शन की बात करें तो इसका मुख्य अंग वेद या पुराण न होकर उपनिषद हैं. इन उपनिषदों में भी गीता को सबसे चर्चित उपनिषद माना जा सकता है. कृष्ण के अर्जुन को दिए गए उपदेश जिस किताब में हैं उसके नाम का शाब्दिक अर्थ है 'भगवान के गाए हुए गीत'. इस गीता में कृष्ण को योगेश्वर कहा गया है. बताया गया है कि 'यतो योगेश्वरः कृष्णः...'. आप नास्तिक हों या किसी भी धर्म में श्रद्धा रखते हों, इतना मानेंगे कि गीता में 'योगियों के ईश्वर' श्रीकृष्ण अर्जुन को जो उपदेश देते हैं उसमें यम, नियम प्रत्याहार आदि की बातें हैं. जिसमें कर्म करने, फल की चिंता न करने. सुख दुख में समान भाव से रहने को कहा गया है.

कृष्ण की तरह ही शिव, जिन्हें योगियों का राजा कहा जाता है, उनसे जुड़ी कथाओं में शिव के काम पर नियंत्रण पाने जैसी बातें कही जाती हैं. हालांकि ये बात और है कि शिव को क्रोध भी आता है. वैसे शिव और कृष्ण के चरित्र से योग को जोड़ा जा सकता है. कृष्ण अपनी तमाम कोमलताओं, गाय, बांसुरी और प्रेम के बीच ज़रूरत पड़ने पर महाभारत जैसे युद्ध के सूत्रधार बन जाते हैं. दूसरी तरफ अपने क्रोध, विषपान और काम पर विजयी होने के बाद भी शिव में नृत्य कला है. वो नटराज के रूप में पूरी लचक, लय और ताल के साथ सामने आते हैं. नटराज और रुद्र एक ही चरित्र के दो पहलू हैं, यकीन ही नहीं होता.

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योग भी मूलतः यही है. जीवन में लोच लाना. आप एक नियम पर खूंटा गाड़ कर नहीं रह सकते. किसी मंझे हुए खिलाड़ी की तरह हर गेंद को उसकी फितरत के हिसाब से खेलना. जबकि 'योगा' और योग दिवस के आयोजनों को बोझ, ड्यूटी या फरमान की तरह मनाने से इसका ठीक उल्टा होता है. एक वर्ग इसके लिए अंधश्रद्धा दिखाता है, दूसरा इसका अंधविरोध करता है. बेहतर है कि योग को सिर्फ कसरत नहीं नियम और तर्क के साथ जीने का तरीका मान कर देखें. इसे एक दिन के आयोजन और सिर्फ व्यायाम से परे रख कर देखें और दिखाएं.

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