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योग दिवस 2018 विशेष: आत्मा से परमात्मा का मिलन ही योग है

आज कल सिर्फ कुछ आसनों और प्राणायामों को ही योग समझा जाता है, लेकिन सच तो यह है कि योग का दायरा सिर्फ कुछ आसान और प्राणायाम तक सीमित नहीं है

Updated On: Jun 20, 2018 09:35 AM IST

Sudhanshu Gaur

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योग दिवस 2018 विशेष: आत्मा से परमात्मा का मिलन ही योग है

आज हम सभी योग शब्द से भलीभांति परिचित हैं, कुछ इसे योग कहते हैं और कुछ-कुछ इसे योगा नाम से जानते हैं. योग से योगा तक का सफर बहुत लम्बा है. प्राचीन भारतवर्ष में शुरू हुआ योग पश्चिमी देशों में इस तरह फैला और पसंद किया गया कि जिस तरह से राम से रामा और कृष्ण से कृष्णा हुए उसी तरह योग भी योगा हो गया.

जैसे-जैसे विदेशों में योग की लोकप्रियता बढ़ती गई, वैसे-वैसे प्राचीन भारत की यह परंपरा भारत में भी अपना खोया हुआ स्थान हासिल करने लगी. आज ‍घर-घर में लोग योग से किसी न किसी रूप में परिचित हैं, सुबह-शाम पार्कों में और घरों की छत पर लोग आसन या प्राणायाम करते हुए देखे जा सकते हैं.

पिछले कुछ वर्षों में भारत में योग का चलन तेजी से बढ़ा है. लोग अब अपने स्वास्थ्य के प्रति पहले से अधिक जागरूक हो गए हैं. भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2015 में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते हुए 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया. इस साल भी विश्व के लगभग 190 देशों में 21 जून को योग के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं.

21 जून को ही योग दिवस क्यों

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस हेतु 21 जून की तिथि को चुनने के पीछे वैज्ञानिक और पारंपरिक दोनो ही कारण हैं. खगोलशास्‍त्री ऐसा बताते हैं कि सूरज दो तरह से गति करता है- उत्तरायण और दक्षिणायन. जून महीने की 21 तारीख को ही सूरज अपनी गति बदलता है, यानी उत्तरायण से दक्षिणायन की ओर जाता है. यह एक प्राकृतिक परिवर्तन है.

जब सूरज दक्षिणायन में आता है तो सूरज की गर्मी और प्रकाश में भी कमी आ जाती है. मतलब अचानक से मौसम में बदलाव आ जाता है. इससे पृथ्वी के एक भाग पर अनेक प्रकार की बीमारियों को पैदा करने वाले कीटाणु अपना काम करना शुरू कर देते हैं, और बीमार होने की संभावना में बढ़ोत्तरी होना शुरू हो जाता है. योग का स्‍वास्‍थ्‍य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इसलिए अपने शरीर और मन को स्वस्‍थ रखने के लिए योगाभ्‍यास बहुत जरूरी है. यही वजह है कि इस मौसम परिवर्तन के पहले दिन को ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में चुना गया.

दवाईयां केवल आए हुए रोगों को खत्‍म करती हैं. उसमे भी सिर्फ आयुर्वेदिक दवाईयां ही आए हुए रोगों को धीमे-धीमे खत्म करती हैं और अंग्रेजी दवाईयां इसके उलट एक बीमारी को दबाकर उसकी जगह दस बीमारियां पैदा कर देती हैं. किसी ने सच ही कहा है कि ‘Precaution is better than cure’ मतलब दवाईयां केवल आए हुए रोगों को खत्‍म करती हैं, किन्‍तु योग पूर्ण आरोग्‍य प्रदान करता है.

सिर्फ आसान-प्राणायाम ही नहीं है योग

आज कल सिर्फ कुछ आसनों और प्राणायामों को ही योग समझा जाता है. लेकिन सच तो यह है कि योग का दायरा सिर्फ कुछ आसान और प्राणायाम तक सीमित नहीं है. इसका दायरा काफी बड़ा है. आसन और प्राणायाम तो मात्र एक बड़ी इमारत के कोने में खड़े दो खम्‍बों की तरह हैं जो इसे सहारा तो दे रहे हैं लेकिन सिर्फ उन दो खम्‍बों पर ही भवन नहीं खडा है. इसी तरह आसन और प्राणायाम भी योग रूपी ईमारत के दो खम्बे हैं. जिन्‍होंने ईमारत को संभाल रखा है. कहने का मतलब यह है कि योग सिर्फ आसन और प्राणायाम ही नहीं होता बल्‍कि 'यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्‍याहार, धारणा, ध्‍यान और समाधि' इन अंगों से योग पूर्ण होता है.

यम- अहिंसा, झूठ न बोलना, लालच न करना, अपशब्‍द न बोलना, विषयों से आसक्‍त न होना ये पांच यम हैं.

नियम- स्वच्‍छता, सन्‍तुष्‍टि, तपस्‍या, अध्‍ययन, भगवान को आत्‍मसमर्पण ये पांच नियम हैं.

आसन- ‘स्‍थिरं सुखं आसनम्’ अर्थात स्‍थिर और सुखपूर्वक बैठने की क्रिया ही आसन है.

प्राणायाम- अपनी सांसों को नियमित करने की क्रिया ही प्राणायाम है.

प्रत्‍याहार- बाहर की चीजों से मन को हटाना.

धारणा- एक ही लक्ष्‍य पर ध्‍यान लगाना.

ध्‍यान- ध्‍यान जिस पर केन्‍द्रित है, उसका चिंतन.

समाधि- ध्‍यान को चैतन्‍य में विलय करना.

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