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अलविदा 2017: न कोई उमंग है न कोई तरंग है मेरी राजनीति भी क्या एक कटी पतंग है

साल 2017 में बीएसपी सिर्फ व्यक्ति पूजा का चेहरा बन कर रह गई और मायावती बजाए पार्टी के देश में विस्तार के खुद यूपी की सियासत में उलझ कर रह गईं

Updated On: Dec 31, 2017 09:20 AM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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अलविदा 2017: न कोई उमंग है न कोई तरंग है मेरी राजनीति भी क्या एक कटी पतंग है

पांच साल के सत्ता के वनवास के बाद बीएसपी सुप्रीमो मायावती को उम्मीद थी कि यूपी में हाथी चलेगा अपनी चाल और विरोधी हो जाएंगे बेहाल. लेकिन यूपी चुनाव के नतीजों ने हाथी को बैठाने का काम कर दिया. मायावती की कुंडली में सत्ता का ‘गज’केसरी योग नहीं बन सका. सिर्फ यूपी में ही राजनीति के दरवाजे नहीं बंद हुए बल्कि केंद्र की राजनीति के दरवाजे पर भी वक्त ने कुंडी लगा दी.

किसी ने नहीं सोचा था कि यूपी की राजनीति को सरप्राइज देने वाली बीएसपी इतिहास बन कर रह जाएगी. विधानसभा चुनावों में बीएसपी के केवल 19 विधायक ही अपनी पार्टी का चिराग जला पा रहे हैं. वर्ना संसद में भी बीएसपी के नाम का सन्नाटा पसरा हुआ है. राज्यसभा में खुद मायावती अपनी पार्टी की नुमाइंदगी करती थीं लेकिन उन्होंने राजनीति के भावावेश में भारीभरकम इस्तीफा लिख मारा.

मायावती अबतक के सबसे मुश्किल दौर में हैं. साल 2012 से ये मुश्किल वक्त की शुरुआत हई. साल 2012 में उन्होंने यूपी की सत्ता गंवाई और फिर दो साल बाद लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिली. इसके बाद यूपी चुनाव में पार्टी हाशिए पर ही चली गई. साल 2012 के चुनावों में मायावती ने ब्राह्मणों पर ज्यादा दांव लगाया था तो साल 2017 में मुसलमानों पर उनका जोर दलितों को हजम नहीं हुआ.

सोशल इंजीनियरिंग के चक्कर में पार्टी का चरित्र भूली मायावती 

दलितों की देवी ने राजनीतिक बियावान का ऐसा रूप कभी सोचा नहीं होगा. जब हालात विपरीत हुए तो अपनों ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया. जो कल तक बहनजी के एक केवल एक इशारे पर ही कुछ भी कर सकते थे वो ही आरोपों के तीर चलाने लगे. नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी ऐसा ही एक नाम हैं जिन्होंने बहनजी का स्टिंग ऑपरेशन ही कर डाला. जिस पार्टी के दम पर लोग अर्श तक पहुंचे उन्होंने पार्टी के बुरे वक्त में साथ छोड़ना बेहतर समझा.

मायावती के समर्थक

राजनीति का संस्कार भी यही है तो रूप और नियति भी. सत्ता जाने के बाद लोग डूबते सूरज की तरफ पीठ कर लेते हैं. मायावती ने राजनीति में ऐसे हालात पहले नहीं देखे थे. पहले पार्टी के संस्थापक कांशीराम थे जो हर उलझी हुई राह से अपना रास्ता तैयार कर लेते थे. उन्होंने जमीनी स्तर से पार्टी को उठाकर सत्ताधारी बनाने का करिश्मा किया था. वो पार्टी के जनाधार को समेटना और बढ़ाना जानते थे. उनकी सोच की दिशा एकदम साफ थी. वो दलित आंदोलन से भटके नहीं क्योंकि उन्हें ये मालूम था कि भविष्य में भटकने पर लौट कर वापस यहीं आना होगा. लेकिन मायावती वक्त के साथ कांशीराम के नाम का चेक ‘दलित बैंक’ में ज्यादा भुना न सकीं.

मायावती दलितों को राजनीतिक रूप से संगठित करने की बजाए सोशल इंजीनियरिंग की माया में ऐसा उलझीं कि अपनी ही पार्टी का चरित्र भूल गईं. दलितों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण को उन्होंने खुद तक सीमित कर दिया. उनके जन्मदिन पर लगने वाले तोहफों के ढेर और नोटों की माला को उन्होंने दैवीय अवतार का प्रसाद माना. आर्थिक तौर पर जो पिछड़ा और निचले स्तर पर था उसका विकास केवल पार्टी के घोषणापत्र में ही दिखाई देता रहा. मायावती सामाजिक सुरक्षा देने में कामयाब रहीं लेकिन आर्थिक सुरक्षा देने के लिए उनकी सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं थी.

सर्वजन की पार्टी होने के बाद मायावती निश्चिंत थीं कि सत्ता से वो कभी दूर नहीं हो सकेंगी. लेकिन उनके ही दौर में दलितों की उपेक्षा ने सिंहासन की दूरियां बढ़ाना शुरू कर दी. कांशीराम के कई वफादार नेताओं की उपेक्षाएं जारी रहीं और दूसरी पार्टियों से आए लोगों को विशेष मान दिया जाने लगा. दलितों की देवी पर ही दलित आंदोलन से भटकने के आरोप भी लगे.

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तस्वीर: यूट्यूब

कांशीराम ने मायावती को राजनीतिक वारिस घोषित किया था. अपनी बनाई बहुजन समाज पार्टी को उन्होंने पारिवारिक हित तक सीमित नहीं किया. लेकिन मायावती के एक फैसले ने उन्हें पार्टी के ही कठघरे में खड़ा करने का काम किया. उन्होंने अपने भाई आनंद कुमार को उपाध्यक्ष बनाकर बीएसपी में वंशवाद का खुला ऐलान कर दिया. मायावती का ये फैसला उन दलित कार्यकर्ताओं के लिए झटका था जिन्होंने पार्टी को खड़ा करने के लिए मीलों पैदल प्रचार करने में कमी नहीं छोड़ी थी. लेकिन परिवार को प्राथमिकता देकर मायावती ने खुद को ही असहज स्थिति में डाल दिया.

पुराने फैसलों को भुलाकर आगे बढ़ना होगा 

एक तरफ दलित एजेंडे से बीएसपी भटकी हुई दिखी तो दूसरी तरफ मायावती पर करप्शन के आरोपों ने उनकी छवि को धूमिल करना शुरू कर दिया. आनंद कुमार पर भी करप्शन के कई आरोप हैं. ऐसे में समाजिक न्याय के नाम पर बनी पार्टी अपने भीतर के विरोधाभास के झंझवात में उलझी हुई है. बीएसपी सिर्फ व्यक्ति पूजा का चेहरा बन कर रह गई और मायावती बजाए पार्टी के देश में विस्तार के खुद यूपी की सियासत में उलझ कर रह गईं.

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जबकि कांशीराम ने अपने वक्त में बीएसपी के चौतरफा विस्तार के जरिए दूसरे राजनीतिक दलों पर दबाव डालना शुरू कर दिया था. आज वही वोटबैंक बीजेपी के लिए सबसे बड़ा हथियार बनने जा रहा है. बीजेपी ने एक दलित को राष्ट्रपति बना कर साफ संदेश दे दिया है जबकि मायावती ने अपनी पार्टी में किसी और नेता को उभरने का मौका नहीं दिया.

साल 2018 में मायावती पुराने फैसलों और बीती बातों को भुलाकर आगे बढ़ें और कांशीराम की तरह ही दलित उत्थान के लिए संघर्ष करें तो वो बीएसपी पुराने जनाधार को हासिल कर सकती है क्योंकि दलितों के समाजिक न्याय की लड़ाई अभी काफी लंबी और बाकी है.

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