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अलविदा 2017: चुप चुप खड़े हो जरूर कोई बात है...

केजरीवाल का ‘मौन’ धीरे धीरे ‘मिस्ट्री’ में तब्दील होता जा रहा है और ऐसा लगता है कि उनके बयान सर्दी में कंबल में मुंह ढांक कर पड़े हुए हैं

Updated On: Dec 30, 2017 09:38 AM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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अलविदा 2017: चुप चुप खड़े हो जरूर कोई बात है...

साल 2017 आम आदमी पार्टी के भीतर तूफान के नाम रहा तो पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मौन के भी नाम रहा. केजरीवाल की चुप्पी न मालूम कितने सवालों की आबरू बचा रही है. लेकिन एक बड़ा सवाल तो उठता ही है कि ‘संवाद अदायगी’ से पब्लिक का दिल जीत लेने वाले केजरीवाल चुप क्यों हैं?

सबको याद है रामलीला में शपथ ग्रहण का वो ऐतिहासिक दिन जब केजरीवाल ने मंच से कहा था कि ‘कोई रिश्वत मांगे तो मना नहीं करना...सेटिंग कर लेना’. आज वो ही केजरीवाल न तो जनता से कुछ बोल रहे हैं और न अपनी ‘फेवरेट’ बीजेपी के खिलाफ बयान दे रहे हैं. उनकी खामोशी न मालूम किस 'सेटिंग' में सिमटी हुई है कि ऐसा लग रहा है जैसे शायद वो दिल्ली में ही नहीं हैं और 'विपश्यना' में चले गए हैं.

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उनकी चुप्पी से राजनीति में खालीपन महसूस हो रहा है क्योंकि जब कभी केजरीवाल ने माइक थाम कर मोर्चा संभाला है तो भूचाल ही आया है. लेकिन फिलहाल उनका आखिरी आरोप ही याद आता है जो नोटबंदी के फैसले पर दाग दिया था. उन्होंने नोटबंदी को एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला बता कर इसे साबित करने का ऐलान किया था.

लेकिन साल 2017 में अचानक अरविंद केजरीवाल के हावभाव में ही बदलाव आ गया. पार्टी में हालांकि कभी पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा की वजह से भूकंप आया तो कभी केजरीवाल बनाम कुमार विश्वास कैंप के बीच विवादों की सुनामी उठी. लेकिन मुख्यधारा में केजरीवाल का कोई भी बयान ठंडी पड़ी सियासत को गरमाने का काम नहीं कर रहा है. ऐसा लगता है कि उनके बयान सर्दी में मुंह ढांक कर पड़े हुए हैं.

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केजरीवाल का ‘मौन’ धीरे धीरे ‘मिस्ट्री’ में तब्दील होता जा रहा है. लेकिन पार्टी के सूत्रों के मुताबिक केजरीवाल की खामोशी में आने वाले तूफान की आहट को महसूस करने का वक्त आ रहा है. माना जा रहा है कि केजरीवाल एक खास किस्म की रणनीति पर काम कर रहे हैं. उन्होंने पहले की गलतियों से सबक लेते हुए अपना 'फोकस' ही चेंज कर लिया है. अब वो सिर्फ काम पर 'फोकस' कर आने वाले चुनावों की तैयारी कर रहे हैं. वो ये जान गए हैं कि सत्ता में आने के बाद केवल आरोपों की राजनीति से भला नहीं होने वाला. बार बार मोदी विरोध की नेगेटिव पॉलिटिक्स से उनकी ही छवि पर असर पड़ा है. यहां तक कि उनके किसी भी आरोप को मीडिया और जनता ने भी गंभीरता से लेना छोड़ दिया है. ऐसे में केजरीवाल जो कभी आम आदमी के नायक बन कर उभरे थे वो अब नए 'अवतार' की तलाश में हैं. वो ये बताना चाहते हैं कि उन्हें ‘लोग परेशान करते रहे और हम काम करते रहे’. अब वो अपने कामों का हिसाब-किताब बनाने में जुटे हुए हैं. दिल्ली की जनता को ये बताना चाहते हैं कि आखिर क्यों उनकी पार्टी कांग्रेस और बीजेपी से अलग है?

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इसी रणनीति के तहत वो किसी भी मामले में ‘बड़ी मुश्किल’ से चुप लगा जाते हैं. उन्हें डर है कि जरा सी ज़ुबान फिसली तो कहीं सारे किए पर पानी न फिर जाए. इसलिए फिलहाल मिशन दिल्ली पर केजरीवाल का फोकस है. तभी उनकी शिकायतों की लिस्ट में से पीएम मोदी और दिल्ली के एलजी फिलहाल गायब हैं. लेकिन केजरीवाल जी को ये सोचना चाहिए कि अब सर्दी चरम पर है और एक दो महीने में चली भी जाएगी. ऐसे में लोग केजरीवाल की खांसी को भी मिस कर रहे हैं. क्या गुम हुई ये खांसी नए साल में सियासत में कुछ खलिश पैदा कर सकेगी?

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