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अलविदा 2017: काटे नहीं कटते ये दिन ये रात...

समय का चक्र ऐसा घूमा कि कि सिंहासन की जगह जेल मिली जहां अब काटे नहीं कट रहे हैं दिन और रात

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Dec 30, 2017 09:25 AM IST

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अलविदा 2017: काटे नहीं कटते ये दिन ये रात...

राजनीति में कभी कभी पत्थर पर लिखी लकीर भी मिट जाया करती है. कुछ ऐसा ही साल 2017 में वीके शशिकला के साथ हुआ. समय का चक्र ऐसा घूमा कि कि उन्हें तमिलनाडु के सिंहासन की जगह जेल मिली जहां अब काटे नहीं कट रहे हैं दिन और रात.

एआईएडीएमके की सुप्रीमो और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं दिवंगत जयललिता का साया कहा जाता था वीके शशिकला को. कुछ लोग पर्दे के पीछे शशिकला को ही जयललिता की ताकत भी मानते थे. यही वजह रही कि जयललिता के निधन के बाद शशिकला को ही तमिलनाडु का सीएम माना जा रहा था.

हालांकि स्टैंड-बाई सीएम यानी पन्नीरसेल्वम तीसरी बार भी सीएम बना दिए गए थे. लेकिन उनके नाम पर पार्टी में पूरी तरह से सहमति नहीं थी. सब मानते थे कि अम्मा की असली उत्तराधिकारी तो चिनम्मा यानी शशिकला ही हैं और वो ही अम्मा के सपनों के पूरा करने के लिए सिंहासन पर विराजेंगीं.

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61 साल की शशिकला तमिलनाडु विधानसभा में विधायक नहीं हैं लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ था.  सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने शशिकला से राजयोग को छीन लिया. आय से अधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के फैसले को बरकरार रख शशिकला के राजनीतिक करियर का पटाक्षेप ही कर डाला. चार साल जेल की सजा और दस करोड़ का जुर्माना शशिकला के लिए कई मायनों में बहुत बड़ा झटका है. खासतौर से तब जबकि वो एआईएडीएमके की महासचिव बनने के बाद सीएम बनने की औपचारिकता पूरी करने वाली थीं.

पिछले 25 सालों से वक्त और तकदीर ने हमेशा ही शशिकला का साथ दिया. अगर शशिकला की जयललिता से मुलाकात नहीं हुई होती तो आज उनकी पहचान भी कुछ नहीं होती. जयललिता के साथ करीबी रिश्तों ने ही शशिकला को जयललिता के वारिस के तौर पर तमिलनाडु में सीएम की रेस में पहले नंबर तक पहुंचाया.

इस रिश्ते की कहानी शुरू होती है 33 साल पहले. साल 1984 में शशिकला एक छोटा सा वीडियो पार्लर चलाती थीं. उस वक्त जयललिता से उनकी मुलाकात हुई. जयललिता की वजह से उन्हें  एमजी रामचंद्रन के वीडियो शूट का कॉन्ट्रैक्ट मिल सका. बाद में धीरे धीरे जयललिता से शशिकला के रिश्ते प्रगाढ़ होते चले गए. साल 1987 में एमजी रामचंद्रन का निधन हो गया. जयललिता पार्टी के भीतर अकेली पड़ती चली गईं.  उस मुश्किल दौर में शशिकला ही उनका सहारा बनीं. यहां तक कि साल 1988 में वो जयललिता के घर में आकर रहने लग गईं. जयललिता ने शशिकला के भतीजे वीएन सुधाकरन को दत्तक पुत्र माना और धूमधाम से शादी भी कराई.

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लेकिन साल 1996 में चुनावों में हार के बाद दोनों के रिश्तों में दरार भी पड़ी. 1996 में मिली चुनावी हार के लिए शशिकला और उनके रिश्तेदारों से जुड़े भ्रष्टाचार को आरोपों को जिम्मेदार ठहराया गया. धीरे धीरे दोनों के रिश्ते में तल्खी इतनी बढ़ी कि शशिकला को जयललिता का घर छोड़ कर जाना पड़ा. लेकिन कुछ समय बाद शशिकला वापस जयललिता के घर आकर रहने लगीं. इसी तरह दूसरी बार साल 2012 में शशिकला पर जयललिता के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगा तो जयललिता ने उन्हें घर से निकाल दिया. लेकिन इस बार भी शशिकला  घर वापसी करने में कामयाब हो गईं. ये दो घटनाएं असामान्य हैं और ये समझ पाना भी मुश्किल कि आखिर जयललिता किस वजह से शशिकला को खुद से दूर न कर पाने में मजबूर थीं?

हालांकि माना जाता है कि दोनों में परस्पर प्रेम इतना था कि शिकायत दूर होने के बाद नाराजगी भी दूर हो जाती थी. इसकी एक दूसरी वजह ये भी हो सकती है कि अमूमन सिनेमाई सितारे जब पर्दे की चकाचौंध से दूर होते हैं तो निजी जिंदगी में अकेलेपन के चलते अवसाद के शिकार हो जाते हैं. शायद जयललिता उस अवसाद के डर से एकांत को ओढ़ना नहीं चाहती थीं और इसलिए ही उन्हें सार्वजनिक जीवन के बावजूद अपनी भावनाओं को बांटने के लिए शशिकला जैसी सखी की जरूरत हमेशा महसूस होती रही. कह सकते हैं कि इसी अंतर्द्वन्द की वजह से शशिकला धीरे धीरे जयललिता की कमजोरी भी बनती चली गईं. तभी सबकुछ जानकर भी जयललिता फासलों को मिटाने का ही काम करती आईं और उनके घर के दरवाजे शशिकला के लिए बंद न हो सके. आज वो घर है लेकिन जयललिता नहीं रहीं तो शशिकला के पास पहले जैसी जिंदगी भी नहीं रही.

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अब शशिकला की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते ही जयललिता की असामयिक मृत्यु पर  25 साल पुरानी दोस्ती के बावजूद सवाल उठने लगे हैं. जयललिता के बाद पार्टी की सूरत भी बदली तो सियासत भी. कल तक अम्मा और शशिकला के करीबी वफादार माने जाने वाले पन्नीरसेल्वम बागी भी हो गए.

तमिलनाडु की चिनम्मा अब जेल में है और उनकी यादों के किसी कोने में जयलिलता के साथ गुजारे लम्हें जिंदा हैं तो किसी कोने में हाथ से फिसली सत्ता की डोर की छटपटाहट भी मौजूद है. जिसे कभी जयललिता की 'आंखें' कहा जाता था आज उनमें पश्चाताप के आंसू भरे हैं.

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