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क्यों मनाते हैं सूफी मुस्लिम बसंत का त्योहार

बसंत पंचमी का ज़िक्र आते ही सबके दिमाग में हिंदुओं का त्योहार ही ज़ेहन में आता है. मगर बसंत का सूफी इस्लाम से गहरा नाता है

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jan 16, 2018 02:53 PM IST

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क्यों मनाते हैं सूफी मुस्लिम बसंत का त्योहार

बसंत पंचमी का ज़िक्र आते ही सबके दिमाग में हिंदुओं का त्योहार ही ज़ेहन में आता है. मगर बसंत का सूफी इस्लाम से गहरा नाता है. हर साल खबर आती है कि पाकिस्तान ने बसंत मनाने पर पूरी तरह से बैन लगा दिया है. बसंत की पतंगबाजी में मांझा इस्तेमाल करने पर जेल में डाल दिया जाता है. परवेज़ मुशर्रफ बसंत पर पतंगबाज़ी करने के चक्कर में आलोचनाओं का शिकार हो चुके हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि बसंत पंचमी का सूफी इस्लाम से इतना गहरा नाता क्यों है?

सूफी परंपरा का रंग है बसंती

गेरुआ रंग हिंदू साधू-संतों की पहचान का रंग है. इसके भगवा बनकर राजनीतिक शेड बनने की बात छोड़ दें तो ये रंग धर्म से ज्यादा संस्कृति और जीवन शैली का रंग है. भारत में सूफियों ने इस रंग को थोड़े से बदलाव के साथ अपनाया. उनके लिए वो ‘संदली’ बन गया. खुसरो, बुल्लेशाह और तमाम सूफी संतों के कलाम में रंग देने का ज़िक्र खूब आता है. नुसरत की मश्हूर कव्वाली ‘हुस्न-ए-जानां की तारीफ मुमकिन नहीं’ में संदली, संदली करके अंतरा आता है. इसी तरह हर साल निज़ामुद्दीन की दरगाह पर बसंत पर जलसा होता है. लोग जमा होते हैं, नाचते हैं. पीले रंग के कपड़े, पीले फूल लाते हैं. बेहतरीन कव्वाली होती है. इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है.

हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने भांजे से बहुत स्नेह करते थे. पर उसकी असमय मौत से वो बहुत उदास रहने लगे. अमीर खुसरो उनको खुश करना चाहते थे. इस बीच बसंत ऋतु आई. कहते हैं कि खुसरो ने सरसों और गेंदे के पीले फूलों से एक गुलदस्ता बनाया और निजामुद्दीन औलिया के सामने पहुंचे. पीला साफा बांध और पीले कपड़े पहन खूब नाचे गाए. उनकी मस्ती से हजरत निजामुद्दीन की हंसी लौट आई. तब से जब तक खुसरो जीवन भर बसंत पंचमी का त्योहार मनाते रहे. खुसरो के बाद भी ये परंपरा चलती रही. हर साल दरगाह पर खुसरो की रचनाओं को गाया जाता है. सरसों और गेंदे के फूलों से दरगाह सजाई जाती है. वैसे हिंदू पंचांग से अलग  सूफी रवायत में बसंत का त्योहार इस्लामिक कैलेंडर के पांचवें महीने, जूमादा अल अव्वल के तीसरे दिन मनाया जाता है.

निजामुद्दीन की दरगाह से शुरू हुई बसंत की ये परंपरा दूसरी दरगाहों में भी फैल गई. जानकार बताते हैं कि बाकी जगह ऐसा करने की कोई बाध्यता नहीं है मगर ज्यादातर दरगाहों में बसंत पर कव्वाली और जलसे का आयोजन होता है. इस्लाम से जुड़े लोगों की इस पर अलग-अलग राय होती है. इसके समर्थक कहते हैं कि बसंत मौसम और किसानों से जुड़ा त्योहार है इसका ज़िक्र अगर कुरान और हदीस में नहीं है तो हिंदू धर्म ग्रंथों में भी नहीं है. इसलिए खुश होना, एक खास रंग के कपड़े पहनना गलत नहीं हैं.

वहीं संगीत और दरगाह को गैरइस्लामिक मानने वाले लोग निश्चित तौर पर बसंत का विरोध करते हैं. एक तबका ऐसा भी है जो खुद ये त्योहार नहीं मनाता मगर उत्सव और तफरी के स्तर तक रहने पर इसको गलत भी नहीं मानता. बसंत उत्सव की ऋतु है. इसको लेकर तमाम कव्वालियां हैं, राग हैं, फिल्मी गाने हैं. बाकी जब दिल में उमंग जगने लगे तो समझें बसंत है.

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