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मारियुआना: आखिर गांजे में ऐसा कौन सा आनंद है कि रामदेव और शशि थरूर इसे लीगल करवाना चाहते हैं

अमेरिका में 60 प्रतिशत लोग गांजे को लीगल करने के पक्ष में हैं. तमाम वेबसाइट्स पर आपको ऐसे आर्टिकल और वीडियो मिल जाएंगे, जिन पर 'वीड से जुड़े 10 फायदे' बताए गए होंगे

Updated On: Jun 11, 2018 11:02 AM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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मारियुआना: आखिर गांजे में ऐसा कौन सा आनंद है कि रामदेव और शशि थरूर इसे लीगल करवाना चाहते हैं

शशि थरूर अपनी 'हतप्रभ' कर देने वाली अंग्रेज़ी के अलावा एक और कारण से चर्चा में हैं. शशि थरूर ने मारियुआना को कानूनी रूप से वैध करने का सुझाव रखा है. इस तरह की मांग इससे पहले योग शिक्षक रामदेव भी कर चुके हैं. दुनिया भर में ऐसे तमाम बुद्धिजीवी, प्रोफेसर, सेलेब्रिटी और तमाम लोग हैं जो, मारियुआना, वीड या गांजे को अवैध ड्रग्स के दायरे से बाहर निकालना चाहते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में 60 प्रतिशत लोग गांजे को लीगल करने के पक्ष में हैं. तमाम वेबसाइट्स पर आपको ऐसे आर्टिकल और वीडियो मिल जाएंगे, जिन पर 'वीड से जुड़े 10 फायदे' बताए गए होंगे. आखिर क्या वजह है कि तमाम तबका अचानक से एक 'नशे' को सबकी पहुंच में लाना चाहता है? विस्तार से जानते हैं.

मारियुआना है क्या?

मारियुआना यानी गांजा एक पेड़ की सूखी पत्तियों का चूर्ण है जो मिट्टी की चिलम या कागज के रोल में भर कर सिगरेट की तरह पिया जाता है. ये एक 'हर्बल' नशा है. हर्बल मतलब जिसे कोकेन या मेथ की तरह कैमिकल के जरिए नहीं बनाया गया. शरीर के अंदर जाने वाली हर चीज़ के लिए एक सामान्य नियम है. सामग्री को जितना रिफाइन यानी परिष्कृत किया जाएगा, शरीर के लिए वो उतना नुकसान देह होगी. उदाहरण के लिए सफेद चीनी गुड़ की तुलना में नुकसान देह है. रम या व्हिस्की बियर की तुलना में लीवर पर ज्यादा असर डालती है. इसी तरह की बात मैरिजुआना के साथ है.

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सामान्य भाषा में जिसे भांग का पौधा कहते हैं उसकी पत्तियों को पीस कर भांग बनती है. अमूमन इसे दूध या ठंडाई के साथ लिया जाता है. इसमें भांग फैट और शुगर के चलते तुरंत असर करती है. गांजा सूखी हुई पत्तियां हैं. इसका धुंआ पीने से भांग की तरह तुरंत और तेज़ असर नहीं होता है. गांजा पिया शख्स भांग खाए शख्स की तरह भ्रम में नहीं रहता. उसमें रिफ्लेक्स (प्रतिक्रिया करने की क्षमता) कम हो जाती है और इंसान थोड़ा ज्यादा सक्रिय महसूस करता है. इसी पेड़ का दूध/रस पत्तियों के साथ मलकर सुखा लिया जाता है तो उसे चरस कहते हैं. चरस में गांजे से ज्यादा नशा होता है.

गांजा अलग तरह का नशा है. इसे धुंए के तौर पर लिया जाता है जिसके चलते ये फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है. ये सिगरेट की तरह नहीं है. गांजे के समर्थक इसे अल्ज़ाइमर और कैंसर जैसी बीमारियों में फायदेमंद बताते हैं. इन दावों के पीछे कई अनुभव पर बनी रिपोर्ट्स हैं लेकिन कोई ठोस मेडिकल सबूत नहीं है. गांजे के समर्थक बताते हैं कि गांजा शराब की तरह लिवर खराब नहीं करता, इसका कोकेन की तरह एडिक्शन नहीं होता. लेकिन गांजे का आनंद इतना निर्मल नहीं है.

हर नशे की अपनी प्रवृत्ति होती है. मसलन सिगरेट आपको बहकाती नहीं है लेकिन इसकी लत होती है. शराब की भी अलग-अलग किस्मों का असर अलग होता है. किसी से हल्का सुरूर मिलता है, किसी से जोश तो, किसी से इंसान लड़खड़ाने लगता है. गांजा इंसानी रिफ्लेक्स को कमज़ोर करता है. ये दिमाग को धीमा करता है. इसका सबसे खराब असर 20-30 साल की उम्र के लोगों के दिमाग पर पड़ता है. इस उम्र में दिमाग में चीज़ों का विश्लेषण करने की क्षमता का विकास होता है. गांजा इसे कुंद करता है और इंसान के अंदर डर पैदा करता है. खराब बात ये है कि गांजे की लोकप्रियता सबसे ज़्यादा इसी वर्ग में है. जिन्हें गांजे में शराब की तुलना में न के बराबर नुकसान दिखता है, उन्हें पता होना चाहिए कि अमेरिका में पिछले कुछ समय में रोड एक्सिडेंट का बड़ा कारण वीड लेकर गाड़ी चलाना है.

10 डिग्री तापमान पर एक कपड़े के तंबू में एक महीने तक ईश्वर की आराधना करना.सुबह सुबह बर्फ जैसे संगम के पानी में स्नान करना एक तरह की अराधना है जो ये नागा साधू हर वर्ष करते हैं

गांजे का भारतीय परंपराओं से संबंध

दुनिया के हर समाज में कोई न कोई नशा स्वीकृत होता है. राजस्थान के कई हिस्सों में अफीम चखना शिष्टाचार की एक परंपरा है. उत्तर भारत में अलग-अलग तरीके से तंबाकू खाना आम बात है. इसी तरह गांजा और भांग का सीधा संबंध शैव संप्रदाय से जोड़ा जाता है. कहने वाले ये भी कहते हैं कि भांग का पौधा ही वैदिक कालीन पवित्र 'सोम' है. इस दावे का पता नहीं मगर कथा बताती है कि एक बार शिव परिवार से नाराज़ होकर कहीं चले गए. वो जिस पेड़ के पास सोए वो भांग का पौधा था. इसी के चलते शिव को मानने वाले, भांग, गांजा, धतूरे का इस्तेमाल करते हैं.

ये कहानी कुछ-कुछ वैसी ही है, जैसी ईसाइयों में जीज़स के पानी को वाइन में बदल देने की कथा है. इसलिए वाइन पश्चिम में खाने का सामान्य हिस्सा होता है. दरअसल हर समाज में लोगों को थकान, दर्द, चिंताओं से थोड़ी देर की मुक्ति की तलाश होती है. यही तलाश किस्म किस्म के शौक लेकर आती है, जिनमें कम ज्यादा मात्रा में नशा शामिल हो जाता है. हम अपने सामाजिक मूल्यों के हिसाब से इन नशों को देखते और स्वीकृत-अस्वीकृत करते हैं.

अंग्रेज़ी शासन के दौरान भारत में गांजे या भांग पर नियंत्रण की बात शुरू हुई. भारतीय पुरुषों के लिए तब तक ये काफी सामान्य चीज़ थी. पहलवान कसरत करते समय थोड़ा बहुत नशा कर लेते थे. जिससे क्षमता से ज्यादा दंड बैठक लगाना आसान हो जाता था. इसी तरह युद्ध में थोड़ा सा व्यसन जोश बढ़ाने के काम आता था. यूरोपियन यही काम हिप फ्लास्क में रखी व्हिस्की के दो घूंट पीकर करते थे. धीरे-धीरे सरकार ने भांग और शराब दोनों को सरकारी लाइसेंसिंग के तले ला दिया. 1961 में गांजे और चरस को 25 साल के लिए शिड्यूल्ड ड्रग्स में रख दिया गया. 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इसे पूरी तरह गैर कानूनी घोषित करते हुए इसे हेरोइन, कोकेन और स्मैक जैसे हार्ड ड्रग्स की श्रेणी में रखा. इस प्रतिबंध के पीछे कई लोग अमेरिकी दबाव मानते हैं. अगर आपको याद हो तो ये वही दौर था जब हिप्पी और रॉक एंड रोल कल्चर के चलते अमेरिकन ड्रग समस्या पूरी दुनिया में पैर पसार रही थी. भारत ऐसे हिप्पियों के लिए स्वर्ग था. गांजे पर प्रतिबंध हटाने की मांग करने वाले इसी बात को आधार बनाते हैं.

कैसे बैन हो गया भारतीय संस्कृति वाला गांजा

मैरियुआना के मुरीद कहते हैं कि गांजा हमारी संस्कृति का हिस्सा था. अमेरिका के प्रभाव में आकर इसे बैन कर दिया गया. इसका कई दवाइयों में इस्तेमाल होता है. इसके नुकसान वैसे नहीं हैं, जैसे मेथ, कोकेन या हेरोइन के हैं. इसलिए इसे लीगल कर देना चाहिए. इस मुहीम को कई स्तर पर चलाया जा रहा है. वीड और हर्ब के तमाम स्लोगन और कोट्स वाली, टीशर्ट, पोस्टर और मग जैसी चीज़ें आपको सड़क पर बिकती मिल जाएंगी.

दिल्ली में कनॉट प्लेस जैसी हाई प्रोफाइल जगह में सिगरेट की दुकानों पर गांजा बिकता दिख जाएगा. इस रंग बिरंगे 'सॉफ्ट एडवेंचर' के चलते खुद को विद्रोही और 'बुद्धजीवी' समझने वाले युवा गांजे के फेवर में दलीलें देते दिख जाएंगे. जबकि दूसरे तबके लिए यह विशुद्ध मार्केटिंग और मुनाफा कमाने का ज़रिया है. ये मार्केटिंग कितनी कारगर है इसे एक आंकड़े से समझा जा सकता है. अमेरिका की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक मैरियुआना के समर्थन में 55-61 फीसदी लोग हैं जबकि इसका इस्तेमाल सिर्फ 10 फीसदी करते हैं. यानि इसके समर्थन में खड़े ज्यादातर लोग इसकी ब्रांडिंग से ही आकर्षित हैं.

प्रतीकात्मक

प्रतीकात्मक तस्वीर

जो बेचना हो उसके समर्थन में रिपोर्ट आ जाती है

गांजा भारत के कई हिस्सों में जंगली खर पतवार की तरह उगा मिल जाएगा. समाज का निचला तबका इसको फूंक कर दिन भर पड़ा रहता है. ऐसे में इसका व्यापार (भले ही इसे दवा बनाने का नाम दिया जाए) एक ऐसा धंधा है जिसमें बिना लागत भरपूर मुनाफा मिलेगा. जैसे तर्क आजकल मैरियुआना के समर्थन में दिए जा रहे हैं, उस तरह की तमाम बातें कभी सिगरेट के लिए भी कहीं जाती थीं. एक समय पर सिगरेट पुरुषों के लिए मर्दानगी का प्रतीक थी. महिलाओं के लिए लंबे फिल्टर वाली सिगरेट हाई क्लास होने का मापदंड थी. उस समय सिगरेट के समर्थन में न जाने कितनी रिसर्च आईं. सिगरेट से नुकसान होने की बात को हंसी में उड़ा दिया गया. आज हम सभी जानते हैं कि हकीकत क्या है.

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इसी तरह गांजे से सरकारी रेवेन्यू लाने की बात भी कही जाती है. इस पर कुछ कहने से पहले एक बात जान लीजिए. दुनिया भर में सरकारों ने सिगरेट, शराब, तंबाकू पर प्रतिबंध लगाने की जगह टैक्स लगाया है. सरकारें खुद इसकी बिक्री सुनिश्चित करती है. इसके पीछे मूल धारणा थी कि इस टैक्स से सरकारी खजाने को खर्च लायक रकम मिल जाएगी और लोगों को समय के साथ इनकम टैक्स जैसे करों से मुक्ति मिलेगी. आज के समय में ये धारणा दुनिया के किसी भी देश में कितनी हास्यास्पद है, हम सोच सकते हैं. कुल मिलाकर गांजे के कुछ फायदे हैं लेकिन, समाज के एलीट वर्ग के पॉट, स्मोकिंग, वीड मारने या माल फूंकने जैसे शौक के लिए पूरे समाज को नशे का एक नया बहाना नहीं दिया जा सकता.

(लेखक स्वतंत्र रूप से लेखन का कार्य करते हैं)

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