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जन्मदिन विशेष: क्यों लोग कहते थे, 'ओशो को पढ़ो, मगर उसे फॉलो मत करो'

ओशो ने अपने ज्यादातर प्रवचनों में समाजवादी, महात्मा गांधी की विचारधारा और संस्थागत धर्म की आलोचना करते हुए उसका विरोध किया है. ओशो का मानना था कि गांधी की विचारधारा इंसान को पीछे ले जाने वाली है

Manish Kumar Manish Kumar Updated On: Dec 11, 2017 03:40 PM IST

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जन्मदिन विशेष: क्यों लोग कहते थे, 'ओशो को पढ़ो, मगर उसे फॉलो मत करो'

11 दिसंबर को रजनीश चंद्रमोहन 'ओशो' का जन्मदिन है. आज ही के दिन साल 1931 में उनका जन्म मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुचवाड़ा में हुआ था.

चंद्रमोहन जो बाद में आचार्य रजनीश 'ओशो' के नाम से प्रसिद्ध हुए उन्हें उनके आधुनिक और क्रांतिकारी विचारों के लिए याद रखा जाता है. विश्व को अपने नए विचारों से हैरान कर देने वाले, बौद्धिक जगत में तहलका मचा देने वाले आध्यात्मिक गुरु ओशो के देश-विदेश में फैले भक्त और फॉलोअर 11 दिसंबर के दिन को मोक्ष दिवस या मुक्ति की शुरूआत के तौर पर मनाते हैं.

अपने पिता के ग्यारह संतानों में सबसे बड़े चंद्रमोहन बचपन से गंभीर और सरल स्वभाव के थे. उनकी शुरूआती शिक्षा शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में हुई है. आज भी उस विद्यालय में वो सीट है जिसपर रजनीश बैठा करते थे. दुनिया भर से उनके भक्ता और दर्शनार्थी इसे देखते आते हैं और परम शांति का अनुभव करते हैं.

ओशो के बचपन का एक हिस्सा गाडरवारा में बीता है जहां वो 7 वर्ष की आयु में अपने नाना की मृत्यु के बाद अपने माता-पिता के साथ रहने चले आए थे. गाडरवारा में बहने वाली शक्कर नदी के बहते पानी में ओशो ने खूब उछलकूद और मस्ती की है.

1960 के दशक में वो 'आचार्य रजनीश' फिर 70-80 के दशक में भगवान रजनीश नाम से जाने गए. इसके बाद 1989 के उनके भक्तों और अनुयायियों द्वारा उन्हें ओशो का नाम दिया गया. ओशो एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु और दार्शनिक होकर उभरे जिन्होंने भारत और विदेशों में जाकर प्रवचन दिए.

ओशो ने अपने जीवनकाल में ढेरों पुस्तकें लिखीं, कई सारे प्रवचन दिए. उनके प्रवचन वाले पुस्तक, ऑडियो कैसेट और वीडियो कैसेट की शक्ल में उपलब्ध हैं.

'पढ़ो, पर उनकी बातें फॉलो मत करना. वो जैसा कहें, वैसा करना मत'

जब कोई व्यक्ति ओशो की किताबें पढ़ता या उनके दिए प्रवचनों की कैसेट सुनता है तो लोग उसे सलाह देते हैं कि 'पढ़ो, पर उनकी बातें फॉलो मत करना. वो जैसा कहें, वैसा करना मत'. यह कुछ वैसा है कि आप लोगों से कहें कि 'गुड़ तो खा लें लेकिन गुलगुले से परहेज करें.'

ओशो ने अपने ज्यादातर प्रवचनों में समाजवादी, महात्मा गांधी की विचारधारा और संस्थागत धर्म की आलोचना करते हुए उसका विरोध किया है. उनकी महात्मा गांधी के विचारों से सैद्धांतिक तौर पर भिन्नता रही है. ओशो का मानना था कि गांधी की विचारधारा इंसान को पीछे ले जाने वाली है. यह खुद को नुकसान पहुंचाने वाली विचारधारा है. ओशो के मुताबिक, मेरी दृष्टि में कृष्ण अहिंसक हैं और गांधी हिंसक. दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो दूसरों के साथ हिंसा करें और दूसरे वो जो खुद के साथ हिंसा करें. गांधी दूसरी किस्म के व्यक्ति थे. ओशो की एक किताब है: 'अस्वीकृति में उठा हाथ'. यह किताब पूरी तरह से गांधी पर केंद्रित है.

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ओशो महात्मा गांधी की विचारधारा के घुर विरोधी थे

ओशो कहते हैं कि महात्मा गांधी सोचते थे कि यदि चरखा के बाद मनुष्य और उसकी बुद्धि द्वारा विकसित सारे विज्ञान और तकनीक को समुद्र में डुबो दिया जाए, तब सारी समस्याएं हल हो जाएंगी. और इसका न केवल इस देश ने बल्कि दुनिया में लाखों लोगों ने उनका विश्वास कर लिया कि चरखा सारी समस्याओं का हल कर देगा.

ओशो ने संन्यास और संन्यासी को बिल्कुल अलग नजरिए से परिभाषित किया है. अपने प्रवचण में वो कहते हैं की मेरी नजर में संन्यासी वह है, जो अपने घर-संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए. उनकी दृष्टि में यह एक संन्यास है, जो इस देश में हजारों वर्षों से चला आ रहा है.

संन्यास लिया नहीं जाता बल्कि उसका जन्म होता है

ओशो अपने साधना पथ में कहते हैं कि आपने घर और परिवार छोड़ दिया, भगवा वस्त्र धारण कर लिया और निकल पड़े जंगल की ओर. उन्होंने कहा कि ऐसा संन्यास जीवन से भगोड़ापन है, पलायन है. वह संन्यास इसलिए आसान है कि क्योंकि आप संसार से भाग खड़े हुए और सभी सांसारिक समस्याओं से मुक्त हो गए. ऐसा लिया हुआ संन्यास, संन्यास नहीं होता है. सच्चा संन्यास वह होता है जो इंसान खुद के भीतर जगाए, संन्यास लिया नहीं जाता बल्कि उसका जन्म होता है.

अपने जीवनकाल में ओशो अपनी विचारधारा को लेकर काफी विवादित भी रहे. ओशो कहते हैं कि ईश्‍वर है तो उसके साथ सभी तरह का पाखंड भी जुड़ा रहेगा. पाप-पुण्‍य, स्‍वर्ग-नर्क, पैगंबर, पूजा-पाठ, मंदिर, मस्जिद, चर्च धर्मांतरण, धर्मग्रंथ आदि सभी तरह के पाखंड जुड़े रहेंगे.

ओशो पर यह भी आरोप है कि वो सिर्फ अमीरों के गुरु हैं. उन्होंने पूंजीवाद और भौतिकतावाद को बढ़ावा दिया. उनके पास निजी तौर पर लगभग 100 शानदार रॉल्स रॉयस कारें थीं. वो कभी गरीबों और गरीबी का पक्ष नहीं लेते थे. अपने प्रवचनों में ओशो कहते हैं कि दुखवादी नहीं, सुखवादी बनो. सुखी रहने के सूत्र ढूंढो तो खुशहाली अपने आप आने लगेगी.

Sambhog Se Samadhi Ki Ore

ओशा की सबसे चर्चित और सबसे अधिक पढ़ी गई पुस्तक 'संभोग से समाधि की ओर' है. ओशो ने सेक्स को एक अनिवार्य और नैसर्गिक कृत्य बताकर इसका समर्थन किया है. ओशो का कहना था कि संन्यास लेने या किसी भी धर्म में संत बनने के लिए पहली शर्त ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है. लेकिन ओशो के अनुसार उऩके संन्यास की शुरूआत भोग से तृप्त होकर मुक्त होने के बाद होता है.

ओशो के सेक्स संबंधी विचारों का दुनिया ने उनके काल में घोर विरोध किया था, आज भी करते हैं. ओशो कहते हैं कि सेक्स पहली सीढ़ी है और समाधि अंतिम.

विनोद खन्ना फिल्मी करियर को छोड़कर शरण में चले गए

ओशो की बातों का आकर्षण इतना था कि अपने दौर के बेहद कामयाब अभिनेता विनोद खन्ना से इसे बचे बिना रह न सके. विनोद खन्‍ना अपने फलते-फूलते करियर को छोड़कर ओशो की शरण में चले गए. वो उस समय अध्‍यात्‍म की ओर चल पड़े जब कामयाबी और शोहरत उनके गले लगा रही थी.

Vinod Khanna with Osho

ओशो के साथ विनोद खन्ना (फोटो: फेसबुक से साभार)

वो आचार्य रजनीश ओशो के साथ अमेरिका के ओरेगन चले गए थे. 1981 से लेकर 1985 तक विनोद खन्ना ओशो के साथ यहां उनके आश्रम में रहे. भारत लौटने के कुछ वर्षों बाद उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि अमेरिका के ओशो आश्रम में वो कई साल तक माली रहे. इस दौरान उन्होंने आश्रम में बाथरूम से लेकर थाली तक साफ की.

दुनिया से अलग सोच और विचारों को देखते हुए ओशो को उनके समय से आगे का माना जाता था. ओशो का 19 जनवरी, 1990 को 58 वर्ष की अल्प आयु में पुणे में निधन हो गया.

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