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अटल बिहारी ने साबित किया...राजनीति काजल की कोठरी नहीं

जब ये कहा जाता है कि अब भारतीय राजनीति पहले जैसी नहीं रही तो हम ये शिद्दत से महसूस करते हैं कि हमें एक और अटल चाहिए जिसे सभी विपक्षी अजातशत्रु कह कर पुकारें

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jun 11, 2018 11:20 PM IST

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अटल बिहारी ने साबित किया...राजनीति काजल की कोठरी नहीं

इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जाने की चाहत हर आम-ओ-खास के बीच सबसे बलवती तमन्नाओं में से एक है. विशेष रूप से शिखर पर पहुंचे हर व्यक्ति के भीतरमन में ये खयाल तो जरूर आता होगा कि लोग मुझे किस तरह याद रखेंगे ? क्या मेरा कोई विरोधी भी मेरी प्रशंसा करेगा? क्या मेरे शिखर से हट जाने के बाद भी लोग मुझे उसी प्यार और सम्मान की निगाहों से देखेंगे? लोगों का आपके बारे में क्या सोचना होगा? ये सवाल जरूर कहीं अंतर्मन में उठता तो होगा! खास तौर से राजनीति के शिखर पुरुष जब अपनी ऊंचाइयों पर नहीं होते हैं तो कई बार ऐसा भी देखा जाता है कि अपने उस सम्मान की कसक उनके मन में रहती है.

लेकिन शायद इस सवाल से अटल बिहारी वाजपेयी कभी न गुजरे हों. 2004 में भारत के पीएम पद से हटने के बाद 14 साल बीत चुके हैं लेकिन शायद इन सालों में कभी ऐसा हुआ हो जब विपक्षी दलों ने अटल की कटु आलोचना की हो. भारतीय राजनीति का अजातशत्रु कहलाने का गौरव अगर किसी को हासिल है तो वो अटल बिहारी वाजपेयी ही हैं.

आखिर ऐसा क्यों है कि जिन इंदिरा गांधी को अटल बिहारी ने कभी दुर्गा का अवतार नहीं कहा लेकिन लोग मान बैठे कि उन्होंने ऐसा कहा होगा. इसका कारण जरूर उनका व्यक्तित्व था. जनसंघ जैसी हिंदुत्ववाद को समर्थन देने वाली राजनीतिक पार्टी का नेता आखिर इंदिरा को दुर्गा कैसे कह सकता है? लेकिन ये खबर उड़ी...सिर्फ उड़ी नहीं दशकों तक भारतीय राजनीति में इस विश्वास के साथ टहलती रही कि ऐसा तो जरूर हुआ होगा. इसका कारण ये भी था कि लोगों के बीच एक तरह का भरोसा था कि अटल ऐसा भी कर सकते हैं.

Atal Bihari Vajpayee

ये महज एक उदाहरण है. अपनी पूरी राजनीति के दौरान स्थापित धारणाओं को तोड़ने वाले वाजपेयी समाज में कभी इस बात के लिए किनारे नहीं हुए. नेहरू युग से राजनीति की शुरुआत करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्षी नेता के तौर सोनिया गांधी को भी देखा. करीब 5 दशक के राजनीतिक जीवन में न जाने कितने उतार-चढ़ाव देखने वाले वाजपेयी सबके प्रिय बने रहने की कला के महारथी थे.

ये सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ पर सुई घूमने के बाद 50 के दशक में भारतीय जनसंघ के नेताओं ने राजनीति कैसे की होगी! अटल बिहारी का पदार्पण भारतीय संसद में 1957 के आम चुनाव में हुआ था. अपनी बेहतरीन भाषणशैली के लिए विख्यात अटल बिहारी को बेहद कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में कभी नहीं जाना गया. लेकिन उनकी भाषण शैली इतनी दमदार थी कि वो उसके दम पर वो विरोधी लोगों के मुंह से भी वाह निकलवा सकने में माहिर थे. इस बात का जिक्र अटल बिहारी की बायोग्राफी लिखने वाले पत्रकार एनपी उल्लेख ने एक साक्षात्कार के दौरान किया था.

देश का लोकतंत्र अपने शैशवावस्था में ही था और अटल बिहारी वाजपेयी के संबंध राजमाता सिंधिया के साथ बहुत अच्छे थे. कहा जाता है कि अटल बिहारी राजमाता के पैर भी छूते थे. शुरुआती दिनों में वो अपनी राजनीतिक सफलता का श्रेय भी राजमाता को ही दिया करते थे. उस समय में जब लोकतंत्र बस अपने पैरों पर खड़ा हो रहा हो एक नेता किसी राजमाता ( राजशाही ) को अपना संरक्षक मानने में जरा भी गुरेज न करता हो, ऐसा साहस सिर्फ अटल ही कर सकते थे.

इससे इतर भी अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति में कई जगह विरोधाभास मिल जाएंगे. लेकिन उन्होंने अपना पूरा राजनीतिक व्यक्तित्व ही इस तरह बुना था कि लोग आपत्ति नहीं कर पाते थे. जैसे उस समय में शायद संघ से जुड़े इकलौते नेता थे जो युवावस्था में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी की स्टूडेंट विंग से भी जुड़ रहे. स्वदेशी मूवमेंट के भी वो जबरदस्त पैरोकार रहे लेकिन जब पीएम बने तो उदारीकरण को और जोर-शोर से लागू किया. शुरुआत जनसंघ जैसे संगठन से की जो मूल रूप सांस्कृतिक रूढ़िवादी माना जाता था लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद ही अपने बारे में कहा था कि मैंने विवाह भले न किया हो लेकिन मैं ब्रम्हचारी भी नहीं हूं. संघ के प्रचारक भी रहे, जिसके बारे में कहा जाता है कि खाने-पीने का काफी खयाल करना पड़ता है, लेकिन वो तो भरपूर मांसाहारी थे.

AtalBihari_Poster

मतलब ऐसा नहीं है कि कोई एक सैद्धांतिक स्थिति हो जिसे लेकर अटल बिहारी ने राजनीति की शुरुआत की हो और उस सैद्धांतिक स्थिति में कोई बदलाव न किया हो. बल्कि वो तो प्रयोगधर्मिता की हद तक जाते थे और बेहद आसानी के साथ उसे जस्टिफाई भी कर लिया करते थे. और इसमें उनकी मदद वाक्पटुता कर ही दिया करती थी.

एक बेहतर राजनीतिज्ञ के बारे में कहा भी जाता है कि जरूरत से ज्यादा सैद्धांतिक स्थिति लेकर कोई अच्छा स्टेट्समैन नहीं बनता. इस बात को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बात भी पुख्ता करती है. प्रणब दा ने अपनी किताब कोएलिशन ईयर्स में अटल बिहारी के अनमैचेबल स्टेट्समैन होने की बात स्वीकारी है. यही कारण है कि जिस इजरायल को भारतीय राजनीति के लिए सालों तक अछूत बनाकर रखा गया था उसके लिए दरवाजे अटल के शासन काल में भी खोले गए. जब इजरायली प्रधानमंत्री एरियल शैरोन इंडिया आए तो उनके विरोध में कम्युनिस्ट पार्टियों ने नारे भी लगाए थे-किलर शेरॉन वापस जाओ.

लेकिन अटल इन सब से बाहर निकल गए. दशकों तक राजनीति करने के बाद जब वो राजनीति के मुख्य पटल से ओझल हुए तो भी उन्हें कभी विषबुझे तीर नहीं झेलने पड़े. बल्कि एक नेता के तौर पर पूरे जीवन उनके साथ रहे लाल कृष्ण आडवाणी लंबे समय तक विपक्ष से हार्डलाइनर का खिताब पाते रहे.

दरअसल जब ये कहा जाता है कि अब भारतीय राजनीति पहले जैसी नहीं रही तो हम ये शिद्दत से महसूस करते हैं कि हमें एक और अटल चाहिए जिसे सभी विपक्षी अजातशत्रु कह कर पुकारें.

हमारी कामना है अटल बिहारी शतायु हों...

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