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पड़ताल: ‘गर्लफ्रेंड’ की चाहत में किडनैप करोड़पति की रिहाई को जब महिला इंस्पेक्टर और ACP साहब बने ‘मियां-बीवी’

अगर आपसे कहा जाये कि लाश-गोलियों से बेखौफ पुलिस को भी किसी चीज से पसीना आता है, तो हैरत की बात है. इस बार हम आपको एक ऐसी ही ‘पड़ताल’ से रू-ब-रू करा रहे हैं

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan Updated On: Apr 21, 2018 09:55 AM IST

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पड़ताल: ‘गर्लफ्रेंड’ की चाहत में किडनैप करोड़पति की रिहाई को जब महिला इंस्पेक्टर और ACP साहब बने ‘मियां-बीवी’

अगर आपसे कहा जाये कि लाश-गोलियों से बेखौफ पुलिस को भी किसी चीज से पसीना आता है, तो हैरत की बात है. इस बार हम आपको एक ऐसी ही ‘पड़ताल’ से रू-ब-रू करा रहे हैं, जिसमें न लाश थी न हत्या की घटना. इस सबके बावजूद उस ‘पड़ताल’ के पूरा होने तक पुलिस टीमें पसीने से तर-ब-तर रहीं.

महज एक अदद इंसान को ‘लाश’ में तब्दील होने से बचाने की उम्मीदों के बीच झूलते हुए. ‘पड़ताल’ की इस कड़ी में हम झांकने की कोशिश कर रहे हैं, गर्लफ्रेंड की चाह में एक करोड़ की फिरौती के लिए अपहरण किये गये रईसजादे की सकुशल रिहाई की सच्ची घटना में. उन्हीं पुलिस अफसरों की मुंहजुबानी, जो शामिल रहे थे उस ‘पड़ताल’ में अब से दो दशक यानी करीब 23 साल पहले .

13 सितंबर सन 1995 दिल्ली का पटेल नगर थाना

सुबह करीब साढ़े आठ बजे थाने में 46 वर्षीय एक शख्स पहुंचा. अजनबी ने बताया कि वो पश्चिम पटेल नगर में सपरिवार रहता है और भारत की एक नामी-गिरामी ब्रांड का केबल (बिजली तार) निर्माता है. पसीने से तर-ब-तर अजनबी ने ड्यूटी अफसर को जैसे ही बताया कि एक करोड़ की फिरौती के लिए उसके बेटे का अपहरण कर लिया गया है. सुनते ही थाने में हड़कंप मच गया. आनन-फानन में आला-पुलिस अफसरों को घटना की जानकारी दी गयी.

गलती जो आने वाली पीढ़ियों को भी माफ नहीं करती

शिकायत के आधार पर एसएचओ इंस्पेक्टर जी.एल. मेहता ने पीड़ित के बयान पर 13 सितंबर 1995 को ही एफआईआर नंबर 716/95 पर अपहरण का मामला दर्ज कर लिया. पुलिस और परिवार की जरा सी लापरवाही या फिर अति-उत्साह में उठा लिया गया कोई भी कदम संकट में फंसे युवक के लिए जानलेवा साबित हो सकता था.

पूछे जाने पर उस समय दिल्ली पुलिस कमिश्नर रहे रिटायर्ड आईपीएस निखिल कुमार बताते हैं, ‘मैंने दीपक मिश्रा (उस वक्त पश्चिमी जिले के डीसीपी और मौजूदा वक्त में केंद्रीय सुरक्षा बल में स्पेशल डायरेक्टर जनरल) को एक ही हिदायत दी कि अपहरणकर्ता बाद में भी पकड़ कर ले आयेंगे, अपहृत युवक को किसी भी तरह से नुकसान नहीं होना चाहिए. बंधक युवक को अगर नुकसान हो गया तो ये दिल्ली पुलिस की निजी क्षति होगी.’

पुलिस कमिश्नर के अल्फाज जिन्होंने सोने नहीं दिया

पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार के कहे अल्फाजों ने दीपक मिश्रा की नींद उड़ा दी. क्योंकि महकमे के मुखिया अपनी जगह सही थे. दीपक मिश्रा समझ चुके थे कि अगर अपहरणकर्ताओं ने चंगुल में फंसे लड़के की हत्या कर दी तो आने वाली पीढ़ियां भी शायद इस गलती के लिए दिल्ली पुलिस को माफ नहीं करेंगीं.

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लक्ष्मी नारायण राव रिटायर्ड डीसीपी दिल्ली पुलिस

लिहाजा बिना किसी नुकसान के ही लड़के की सकुशल रिहाई के लिए डीसीपी ने खुद के नेतृत्व में जो टीम बनाई उसमें शामिल किये, उस समय पश्चिमी जिले के एडिश्नल पुलिस उपायुक्त आईपीएस संजय सिंह (अब दिल्ली आर्म्ड पुलिस फोर्स के स्पेशल कमिश्नर), पश्चिमी जिला पीजी सेल प्रभारी एसीपी लक्ष्मी नारायण राव ( एलएन राव रिटायर्ड डीसीपी), तिलक नगर सब-डिवीजन के सहायक पुलिस आयुक्त विजय मलिक (रिटायर), उस वक्त पश्चिमी जिले की क्राइम अगेंस्ट वूमैन सेल प्रभारी महिला इंस्पेक्टर ओमवती मलिक (अब दिल्ली के द्वारका जिले में महिला अपराध निरोधक शाखा में तैनात) और श्योदीन सिंह सहायक पुलिस आयुक्त राजौरी गार्डन सब-डिवीजन (रिटायर्ड).

जब दिल्ली पुलिस टीम पसीने से तर-ब-तर हो गयी

बकौल संजय सिंह, ‘पड़ताल की शुरुआत में अपहृत युवक के पिता और शिकायतकर्ता से पुलिस टीम ने कई घंटे बातचीत की. पता चला कि पीड़ित परिवार किसी भी कीमत पर अपहृत युवा बेटे की जल्दी से जल्दी रिहाई पर आमादा है.’ पीड़ित परिवार से बातचीत के बीच में पुलिस के सामने एक ऐसा मौका आया, जब पुलिस हड़बड़ाकर पसीने से तर-ब-तर हो गयी.

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विशेष पुलिस आयुक्त संजय सिंह के शब्दों में, ‘हमें लगा कि बेटे की रिहाई की जल्दबाजी में पीड़ित परिवार कहीं डायरेक्ट अपहरणकर्ताओं से फिरौती की ‘डील’ करने के चक्कर में नुकसान न उठा बैठे. कहीं कुछ गड़बड़ हुई तो ठीकरा दिल्ली पुलिस के सिर फूटना तय था. लिहाजा अपहरणकर्ताओं तक पहुंचने से पहले पीड़ित परिवार को विश्वास में लेना जरूरी हो गया.’

पुलिस का फार्मूला जो पुलिस के ही काम आया

बकौल संजय सिंह, ‘एक रणनीति के तहत तय किया कि अगर पुलिस अपहरणकर्ताओं से खुद डील का प्रस्ताव पीड़ित परिवार के समक्ष रखेगी तो, शायद पीड़ित परिवार जल्दी राजी न हो. लिहाजा तय हुआ कि अपहरणकर्ताओं से पीड़ित परिवार फिरौती लेन-देन की डील खुद करेगा. लेकिन उस पूरी डील पर नजर पुलिस की रहेगी. हमारे इस कदम से पीड़ित परिवार पुलिस के विश्वास में रहेगा.

उस पड़ताली टीम के खास सदस्य रहे एल एन राव के मुताबिक, ‘अपहृत युवक को छुड़वाने के एवज में 10 लाख फिरौती देने की बात अपहरणकर्ताओं से फिक्स हो गयी. फिरौती की रकम मेरठ (उत्तर प्रदेश) में एक होटल के रिसेप्शन पर दी जानी थी. अपहरणकर्ताओं को फिरौती की रकम दिये जाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी अपहृत युवक के चाचा को.’

महिला इंस्पेक्टर और एसीपी को मियां-बीवी बनना पड़ा

‘दिल्ली पुलिस की टीम में शामिल महिला इंस्पेक्टर ओमवती मलिक और एसीपी श्योदीन सिंह मियां-बीवी बनकर मेरठ (यूपी) के उसी होटल में जाकर रुक गये, जिसके कैश काउंटर पर 10 लाख के नोटों से भरा फिरौती की रकम का थैला छोड़ना था. बाकी पुलिस टीम ने होटल को अंदर बाहर चारों ओर से घेर लिया. तय समय पर अपहृत युवक के चाचा ने रुपये से भरा थैला होटल के रिसेप्शन काउंटर पर छोड़ दिया और चला गया.’ बताते हैं टीम के सदस्य रहे दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड डीसीपी लक्ष्मी नारायण राव.

जब खुद ही बुरी तरह फंस गयी पुलिस के फेर में ‘पुलिस’

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संजय सिंह स्पेशल पुलिस कमिश्नर दिल्ली पुलिस

युवक की सकुशल रिहाई का सपना संजोये दिल्ली पुलिस ने मेरठ के होटल में डेरा तो डाल दिया, लेकिन गोपनीयता बनाये रखने के लिए मेरठ की पुलिस (लोकल पुलिस) को कानो-कान हवा नहीं लगने दी. दिल्ली पुलिस की उस टीम में शामिल एक आला-पुलिस अधिकारी के मुताबिक, ‘जैसे ही अपहृत युवक का चाचा रुपये से भरा थैला होटल रिसेप्शन पर छोड़कर निकला, होटल कर्मचारी के हाथ से वो थैला खुलकर नीचे गिर पड़ा. उसमें नोट भरे देखकर होटलकर्मी की घिघ्घी बंध गयी. पड़ताल की बीच में ही पोल खुलती देख होटल में छिपी दिल्ली पुलिस टीम की भी हालत खराब हो गयी. दिल्ली पुलिस टीम कुछ समझ पाती उससे पहले ही होटल स्टाफ ने लोकल पुलिस (मेरठ) मौके पर बुला ली. अब तक दिल्ली पुलिस समझ चुकी थी कि मामला बुरी तरह बिगड़ चुका है. मरता क्या नहीं करता वाली कहावत को अमल में लाते हुए आखिरकार दिल्ली पुलिस ने मेरठ पुलिस (यूपी पुलिस) के सामने सच उगल कर और होटल वालों को मुसीबत की सही जानकारी देकर विश्वास में लिया.’

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एलएन राव के मुताबिक, ‘अगले दिन होटल के रिसेप्शन पर अपहरणकर्ता का फोन आया कि वो खुद नहीं आ पा रहा है. किसी और को भेज रहा है. उसे वो थैला दे दिया जाये. कुछ देर बाद एक अनजान आदमी नोटों से भरा बैग लेकर चला गया.’

सब्र से काम लिया इसलिए सफलता मिली वरना...

इस समय दिल्ली पुलिस के विशेष पुलिस आयुक्त (आर्म्ड फोर्स) और साये की मानिंद रेडिंग पार्टी में शामिल रहे आईपीएस संजय सिंह के मुताबिक, ‘ हमें कई बार लगा कि बस अब अपहरणकर्ता हमारी हद में आ गये, लेकिन हर बार हम गलत साबित हो रहे थे. हमें चिंता और जल्दबाजी अपहरणकर्ताओं तक पहुंचने की नहीं थी. किसी भी कीमत पर अपहरणकर्ताओं से छिपते-छिपाते बंधक बने लड़के तक पहुंचने की जल्दी थी. जैसे ही मौका मिला कई किलोमीटर तक पीछा करके हमने जिसे दबोचा वास्तव में वही मास्टर-माइंड और अपहरणकर्ता अमित यादव निवासी राजनगर गाजियाबाद निकला. अमित की निशानदेही पर उसके दूसरे साथी राहुल राणा, निवासी बुलंदशहर यूपी को भी दबोच लिया.’

जमीन पर जंजीरों में जकड़ा मिला करोड़पति ‘शिकार’

टीम के प्रमुख सदस्य रहे और दिल्ली पुलिस के मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रिटायर्ड डीसीपी एल.एन. राव के मुताबिक, ‘गाजियाबाद में हमारी टीम ने उस कोठी पर छापा मारा, जिसमें केबल व्यापारी के बेटे को अपहरण के बाद बंधक बनाकर रखा गया था. वो जीने (सीढ़ियों) के नीचे जंजीरों में बंधा पड़ा था. आंखों और मुंह पर पट्टियां बंधी हुईं थीं. उसके आसपास सूखी हुई ब्रेड के कई दिन पुराने टुकड़े ऐसे जमीन पर बिखरे पड़े थे, जैसे किसी कुत्ते के सामने खाने को फेंक दिये जाते हैं. आंखें और चेहरा पिटाई के कारण बुरी तरह सूजा हुआ था.’ उस डरावनी रात को याद करते हुए एसीपी ओमवती मलिक बताती हैं, ‘कुछ भी हो सकता था उस रात. उस पूरी पड़ताल में पुलिस टीम के कुशल नेतृत्व (डीसीपी दीपक मिश्रा और संजय सिंह) और किसी दैवीय ईश्वरीय शक्ति ने हमारा बहुत साथ दिया. दीपक मिश्रा सर लड़के की सही-सलामत रिकवरी तक सोये ही नहीं. उन्हें ऑपरेशन जल्दी खत्म होने की चिंता नहीं थी. वह लड़के की रिहाई ठीक-ठाक चाहते थे.’

बदमाश को पता था रईसजादे की कमजोरी ‘लड़की’ है

पड़ताल के दौरान हुई पूछताछ में मुख्य आरोपी और इलेक्ट्रिक ठेकेदार अमित यादव ने कबूला कि वो केबल व्यापारी के लड़के की कमजोरी जानता था. इसीलिए (मुख्य षड्यंत्रकारी) उसने अपनी गर्लफ्रेंड से एक बार ‘शिकार’ (केबल व्यवसायी का बेटा) को फोन करवाया. बाद में जब शिकार रोज-रोज गर्लफ्रेंड से बातें करने लगा, तो उसने (मुख्य आरोपी) गर्लफ्रेंड को ‘सीन’ से हटा दिया. खुद ही लड़की की आवाज निकालकर केबल निर्माता के बेटे से बातें करने लगा. लड़की की चाहत में अंधा हुआ युवक यह समझ ही नहीं पाया कि उसका शिकार होने वाला है और फोन पर मीठी-मीठी बातें करने वाली कोई लड़की नहीं बल्कि उसका शिकारी है.

अपहरणकर्ता ने पहले किया था वारदात का ‘रिहर्सल’

पकड़े जाने के बाद मुख्य आरोपी अमित यादव ने पुलिस को बताया कि जब केबल व्यवसायी का लड़का, पूरी तरह जाल में फंस गया, तो मैंने (अमित यादव अपहरणकर्ता) उसे आजमाने (क्रास चेक) के लिए एक दिन निर्धारित जगह पर मिलने को बुला लिया. लड़की से मिलने के लालच में केबल व्यवसायी का लड़का बुलाई गयी जगह पर सही वक्त पर पहुंच गया. मगर अपहरणकर्ता उस दिन उससे नहीं मिला. हां, षड्यंत्रकारी को इससे विश्वास हो गया कि अब इसे (शिकार) मन मुताबिक जगह पर बुलाकर इसका अपहरण आसानी से किया जा सकता है. और फिर अगली बार अपहरणकर्ता के झांसे में आकर बुलाने पर उससे मिलने जैसे ही केबल व्यापारी का बेटा ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) पहुंचा, उसी की कार में हथियारों के बल पर उसका अपहरण कर लिया. अपहृत रईसजादे की कार बाद में उत्तर पूर्वी दिल्ली के भजनपुरा इलाके में एक पेट्रोल पंप पर पुलिस को मिली.

वह ‘पड़ताल’ जो जीते जी कभी नहीं भूल पाउंगी

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ओमवती मलिक सहायक आयुक्त (एसीपी) दिल्ली पुलिस

उस टीम की प्रमुख सदस्य (1995 में महिला इंस्पेक्टर पश्चिमी जिला क्राइम अगेंस्ट वूमेन सेल) और अब दिल्ली के द्वारका जिले में क्राइम अगेंस्ट वूमेन सेल में पोस्टेड सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) ओमवती मलिक के मुताबिक, ‘उस टीम में शामिल होना सम्मान की बात थी, जिस टीम को दीपक मिश्रा जैसे सूझबूझ वाले डीसीपी खुद लीड कर रहे थे. उस वक्त डायरेक्ट टीम को लीड कर रहे एडिश्नल डीसीपी संजय सिंह खुद मेरठ के उस होटल में जाकर हम लोगों के साथ रुके, जहां फिरौती के रुपये से भरा थैला हैंडओवर किया गया. मैंने अपनी दिल्ली पुलिस सर्विस में ऐसा कभी नहीं देखा कि अपहरण के मामले की रेडिंग-पार्टी में खुद एक आईपीएस (संजय सिंह), एसीपी-इंस्पेक्टर, सब-इंस्पेक्टर और हवलदार-सिपाहियों के साथ रेड में दिन-रात शामिल रहा हो.’

(अपहरणकर्ताओं के चंगुल से छुड़ाये गए युवक की पहचान, सुरक्षा के दृष्टिकोण से उजागर नहीं की जा रही है)

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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