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अंधेरे में चलाया तीर जब लगा निशाने पर तो बचने के लालच में पुलिस के शिकंजे में फंस गए क़ातिल

आम बोलचाल की भाषा में अक्सर कहा जाता है कि हवा में तीर मत चलाइये. अंधेरे में तीर चलाने से कोई फायदा नहीं होता. ऐसा बिल्कुल नहीं है.

Updated On: May 19, 2018 09:39 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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अंधेरे में चलाया तीर जब लगा निशाने पर तो बचने के लालच में पुलिस के शिकंजे में फंस गए क़ातिल

आम बोलचाल की भाषा में अक्सर कहा जाता है कि हवा में तीर मत चलाइये. अंधेरे में तीर चलाने से कोई फायदा नहीं होता. ऐसा बिल्कुल नहीं है. इस बार की 'पड़ताल' में पेश यह सच्ची घटना इन तमाम मुहावरों को झूठा साबित करने के लिए काफी है. इस सनसनीखेज हत्या और लूट की ‘पड़ताल’ में दिल्ली पुलिस ने अंधेरे में ही तीर चलाया. अनजाने में नहीं, बल्कि जान-बूझकर सोची समझी रणनीति के तहत.

जिसका अविश्वसनीय परिणाण सामने आया. हाईप्रोफाइल मर्डर-लूट का मामला वारदात वाली रात ही 3 घंटे में खुल गया. लेफ्टिनेंट गवर्नर के आवास के पास मौजूद घटनास्थल से 8-9 किलोमीटर दूर ही क़ातिल दबोच लिये गये. महिला के क़त्ल के बाद लूट में हाथ लगे मय 22 लाख रुपयों के साथ.

सन 2006 उत्तरी दिल्ली का राज-निवास इलाका

बकौल उत्तरी दिल्ली जिला के पूर्व डीसीपी सुनील गर्ग, ‘तारीख थी 4 अक्टूबर 2006. समय रात करीब 10-11 बजे कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि उप-राज्यपाल के आवास से 100-150 फर्लांग दूर स्थित एक कोठी में महिला का मर्डर हो गया है.’ मामला चूंकि लेफ्टिनेंट गवर्नर की कोठी के पास महिला की हत्या और लूट का था. लिहाजा दिल्ली पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया.

सूचना पाते ही उत्तरी सुनील गर्ग (वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश के पुलिस महा-निरीक्षक प्रशासन), सिविल लाइंस सब-डिवीजन के एसीपी ( अब रिटायर्ड असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर) मदन मोहन शर्मा, एसएचओ सिविल लाइंस इंस्पेक्टर ओम प्रकाश शर्मा (एसीपी से रिटायर) मौके पर पहुंच गये.

हत्याकांड ने हंसी छीन ली थी...आईपीएस सुनील गर्ग अरुणाचल प्रदेश के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (सन् 2006 में उत्तरी दिल्ली जिले के डीसीपी थे)

हत्याकांड ने हंसी छीन ली थी...आईपीएस सुनील गर्ग अरुणाचल प्रदेश के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस ( 2006 में उत्तरी दिल्ली जिले के डीसीपी थे)

बकौल एसीपी मदन मोहन शर्मा, ‘महिला की खून से लथपथ लाश बिस्तर पर पड़ी हुई थी. उसकी उम्र यही कोई 50 साल थी. महिला के बदन पर चाकुओं से कई वार किये गये थे. बकौल पूर्व डीसीपी सुनील गर्ग, ‘ महिला के पति का कश्मीरी गेट इलाके में बिजनेस था. घटना से एक दिन पहले ही घर में रंगाई-पुताई के लिए एक युवक आया था. अगले ही दिन कोठी में हत्या और लूट की सनसनीखेज वारदात हो गयी.’

‘क़त्ल में परिचित शामिल है’ हालात बता रहे थे

बकौल तत्कालीन डीसीपी सुनील गर्ग, ‘महिला के पेट और गर्दन पर चाकू के कई गहरे घाव थे. मौके के हालात साबित कर रहे थे कि, वारदात में कोई जानकार जरूर शामिल है. पुलिस के सामने जटिल सवाल और समस्या यह थी कि, जब घर में महिला की लाश सामने पड़ी है, ऐसे में शक करके किसे सामने लाकर एक नई मुसीबत मोल ली जाये! लिहाजा पुलिस उस वक्त चुप्पी लगा गयी. मौके का नक्शा बनाया गया. पंचनामा भरकर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. डीसीपी ने हत्याकांड की पड़ताल सिविल लाइंस थाने के एसएचओ इंस्पेक्टर ओम प्रकाश शर्मा के हवाले कर दी. पड़ताल का क्लोज सुपरवीजन एसीपी मदन मोहन शर्मा को करना था.’

इसलिए थी दिल्ली पुलिस पसीने से तर-ब-तर

अगले दिन अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित खबर, 'लेफ्टिनेंट गवर्नर के आवास (राज-निवास) के पास कोठी में हत्या और लाखों की लूट' ने रही-सही कसर पूरी कर दी. अखबारों ने दिल्ली राज्य के सुरक्षा इंतजामों को बौना और पुलिस को निकम्मा ठहरा दिया. ऐसे में पुलिस का शर्मसार होना लाजिमी था. महिला के हाईप्रोफाइल मर्डर को लेकर मीडिया में हुई छीछालेदर से पुलिस कमिश्नर डॉ. कृष्ण कांत पॉल (के.के पॉल, अब उत्तराखंड के राज्यपाल) भी खासे आहत थे.

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घटनास्थल-थाने में रात भर मची रही आपाधापी घटना राजधानी दिल्ली के किसी ग्रामीण इलाके में या फिर गये-गुजरे गली-कूंचे में हुई होती, तो पुलिस को ज्यादा सिरदर्दी कतई नहीं होती. मुसीबत थी घटनास्थल के पास ही मौजूद लेफ्टिनेंट गवर्नर हाउस. ऊपर से चारो तरफ गिद्ध दृष्टि लगाये बैठा दिल्ली का मीडिया. बकौल एसीपी मदन मोहन शर्मा, ‘अपराधी किसी भी कीमत पर महिला को जीवित (घायल) छोड़ना नहीं चाहते थे. महिला के बदन पर मौजूद चाकुओं के गहरे घाव इसके गवाह थे.’

जिन पर शक उन्हें घर वाले ‘बेकसूर’ समझ रहे थे!

मर्डर की उस पड़ताल में दिन-रात करीब से जुड़े रहे तत्कालीन डीसीपी सुनील गर्ग के मुताबिक, ‘पुलिस को घरेलू नौकर पर शक था. घटना के बाद वह नौकर घर में ही मौजूद मिला. हम लोगों ने जब मौजूदा और पुराने घरेलू नौकरों पर संदेह जाहिर किया तो, शुरुआती पड़ताल में पुलिस के उस तर्क से पीड़ित परिवार में कोई सहमत ही नहीं था. अधिकांश का मत था कि, घरेलू नौकर पुराने हैं. विश्वासपात्र हैं. वे (पुराने नौकर) ऐसी सनसनीखेज वारदात को अंजाम देने की बात तो दूर रही, कल्पना भी नहीं कर सकते हैं.’

बकौल तत्कालीन एसीपी मदन मोहन शर्मा, ‘इस सबके बावजूद हमारी संदेह की हद में घरेलू नौकर ही रहा. घटना वाली रात घर में मौजूद नौकर से पूछताछ की. उसने बताया कि, वारदात के वक्त वो घर के कामकाज में व्यस्त था. उसी वक्त कुछ बदमाश मुंह पर कपड़ा बांधे हुए आये. मैंने उनसे पूछा तो, उन्होंने ऊपर से चाकू फेंककर मेरे भी मार दिया.’ बस वो घरेलू नौकर यहीं अपने बयान में आकर पुलिस ‘पड़ताल’ के दौरान उलझ गया. घटनाक्रम और पड़ताल के बारे में बताते हैं इस समय अरुणाचल प्रदेश में पुलिस महानिरीक्षक (प्रशासन) पद पर तैनात और उस समय उत्तरी दिल्ली जिला के डीसीपी रहे आईपीएस सुनील गर्ग.

ऐसे जाल में फंसा षडयंत्रकारी ‘विश्वासपात्र’!

एक दशक पहले उस पूरी रात चली ‘पड़ताल’ के पन्ने पलटते हुए बताते हैं तत्कालीन डीसीपी सुनील गर्ग, ‘सिविल साइंस थाने का पूरा स्टाफ, स्वंय मैं, एसीपी मदन मोहन शर्मा और इंस्पेक्टर एसएचओ ओम प्रकाश शर्मा पूरे रात जागते रहे. लेट नाइट मैं घर तो चला गया, मगर घर जाकर भी नींद आंखों से कोसों दूर थी. हर लम्हा मोबाइल और वायरलेस सेट पर 'पड़ताली' टीम के संपर्क में रहा. मुझे चिंता थी कि, कहीं हत्यारे दिल्ली की सीमा से बाहर न निकल जायें. घरेलू नौकर ने जो कहानी बदमाशों द्वारा उसके हाथ में चाकू मारने की सुनाई वह, पुलिस टीम के गले नहीं उतरी. बल्कि उस बयान से घरेलू नौकर पर संदेह और पुख्ता हो गया.’

अपने सिपाही के हाथ में चाकू मारने का ड्रामा!

‘पड़ताल के दौरान कभी-कभी ऐसे मौके आते हैं, जब हमें (पुलिस टीम) वो सब काम करने पड़ जाते हैं, जो अपराधियों ने वारदात को अंजाम देने के वक्त किये होते हैं. घरेलू नौकर ने हत्यारों द्वारा जिस ऊंचाई से चाकू उसके हाथ (अंगूठे) में फेंक कर मारने की कहानी सुनाई. पुलिस ने बिलकुल उसी जगह से चाकू फेंककर नीचे खड़े पुलिसककर्मी के हाथ में मारने का रिहर्सल किया. उस रिहर्सल से यह बात साबित हो गयी कि बयान देने वाला घरेलू नौकर झूठ बोल रहा है. जिस तरह की चोट उसके हाथ (अंगूठे) में मौजूद थी वो ऊपर से चाकू फेंकने से लग ही नहीं सकती. यही वो मौका था जब, पुलिस को शक के घेरे में आये, उस घरेलू नौकर से कड़ाई से पूछताछ करके राज उगलवाना था.’ बताते हैं पड़ताली टीम के प्रमुख रहे अब रिटायर हो चुके सहायक पुलिस आयुक्त मदन मोहन शर्मा.

अंधेरे में छोड़ा तीर जो निशाने पर जा लगा

रिटायर्ड एसीपी मदन मोहन शर्मा.. आज भी याद आते हैं पुलिस कमिश्नर के वो अल्फाज...'वेलडन मदन मोहन'

रिटायर्ड एसीपी मदन मोहन शर्मा.. आज भी याद आते हैं पुलिस कमिश्नर के वो अल्फाज...'वेलडन मदन मोहन'

बकौल सुनील गर्ग और मदन मोहन शर्मा, ‘शक के दायरे में और वारदात के बाद भी घर में ही मौजूद मिले नौकर पर हमने अंधेरे में एक तीर चलाया. तीर था कि बदमाशों में से एक को पुलिस ने पकड़ लिया है. उस बदमाश ने बताया है कि, वारदात में मदद तुमने (पुलिस के पास मौजूद घरेलू नौकर) भी की थी. तुम वारदात के वक्त मौके पर मौजूद थे. तुम्हारा हाथ हत्या और लूट में भले ही नहीं था. तुम अगर सच बता दो पूरी बात, तो तुम साफ बचा दिये जाओगे.’ जैसे ही पुलिस ने कहा, 'तुम साफ बचा दिये जाओगे...' इसके बाद तो वही नौकर जो 2-3 घंटे से बहका रहा था, पुलिस का मददगार बन गया. इस उम्मीद में कि उसकी, मालकिन महिला के मर्डर जैसे जघन्य कांड में भी पुलिस उसे छोड़ देगी.

‘चोर के ऊपर मोर’ वाली कहावत काम आई

‘पड़ताल के दौरान किसी भी कीमत पर मुलजिम शिकंजे में होना चाहिए. मुलजिम तक पहुंचने के लिए रास्ता चाहे कोई भी अख्तियार करना पड़े.’ कुछ इसी तरह का वाकया इस पुलिस पड़ताल में भी सामने आया. उस समय उत्तरी दिल्ली जिला पुलिस उपायुक्त रहे सुनील गर्ग के मुताबिक, ‘पूरे मामले पर पुलिस कमिश्नर पॉल साहब खुद नजर रखे थे. मेरी आंखों से नींद कोसों दूर थी. ऐसे में मैं, एसीपी मदन मोहन शर्मा और एसएचओ इंस्पेक्टर ओम प्रकाश शर्मा मामूली सी चूक करके किसी भी कीमत पर कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं थे. जैसे ही हमें दूसरे नौकर के संभावित ठिकाने का पता लगा, मैंने उस इलाके के बीट-अफसर को थाने में ही मौजूद रहने को कहा. अपनी पड़ताली टीम में शामिल दो सिपाहियों को थाने के बीट अफसर के पास बिना पहले से कुछ बताये भेज दिया.

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वो अागे बताते हैं,'उत्तर पूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी-सीलमपुर थाना इलाके में हमें क्या काम है? इसका खुलासा मैंने, एसीपी मदन मोहन शर्मा और एसएचओ ओम प्रकाश शर्मा ने न तो संबंधित-बीट-अफसर से किया. न ही अपनी पड़ताली टीम में शामिल उन सिपाहियों को कुछ बताया जो उत्तर पूर्वी दिल्ली में रेड डालने भेजे थे. इसके पीछे मेरी मंशा यह थी कि बीट अफसर या हमारे सिपाही ही कहीं आरोपी को भगाने में कोई संदेहास्पद परिस्थितियां पैदा न कर बैठें. जो सिपाही उत्तर पूर्वी दिल्ली में भेजे उन पर नजर रखने के लिए भी एक सिपाही चुपचाप लगा दिया. ताकि पुख्ता पड़ताल में 'खेल' होने की गुंजाइश दूर-दूर तक न रहे. वारदात को अंजाम देने के बाद संभावित मुख्य आरोपी, पुलिस से बेफिक्र कमरे में सोता हुआ मिल गया. उसे पकड़ कर सिविल लाइंस थाने लाया गया.’

दिल्ली पुलिस के तमाम आला-अफसरों की नींद उड़ा देने वाली उस 'काली-रात' का जिक्र करते हुए बताते हैं, उस वक्त उत्तरी दिल्ली के जिला पुलिस उपायुक्त रहे सुनील गर्ग. आला पुलिस अफसरों के मुताबिक, ‘थाने में पहले से पास मौजूद, घर में ही मिल गये नौकर को, सीलमपुर (ब्रह्मपुरी) से पकड़ कर लाये गये नौकर की शकल दूर से दिखा कर हटा दिया गया. जब दोनो नौकरों ने एक-दूसरे को देख भर लिया, तो पुलिस ने दोनो से अलग-अलग सवाल किये.

'एक संदिग्ध नौकर दूसरे के बारे में बता चुका है', जैसा तीर हमने अंधेरे में चलाया. एक नहीं कई घंटे ऐसे तीर अंधेरे में हमने उस रात (तड़के सुबह चार बजे तक) पुलिस छोड़ती रही. यह पुलिस की किस्मत की थी कि अंधेरे में छोड़ा उसका हर तीर निशाने को भेदता जा रहा था. जब पड़ताली टीम को लगा कि मामला पूरी तरह खुल चुका है. महिला की हत्या के बाद कोठी से लूटे गये करीब 22 लाख रुपये भी बरामद हो गये. तो पुलिस ने दोनो नौकरों को आमने-सामने बैठा दिया. दोनो ने अपना गुनाह और उस हाईप्रोफाइल हत्याकांड-लूट में शामिल होने का जुर्म कबूल लिया.’

डीसीपी को एसीपी की बात पर ही विश्वास नहीं हुआ!

‘रात भर चली उस 'पड़ताल' की दुश्वारियां और अविस्मरणीय सफलता आज भी जस-की-तस याद है. याद है उस रात डीसीपी साहब का वो (आईपीएस सुनील गर्ग) बार-बार पूछना, 'अरे शर्मा जी जल्दी पकड़ो मुलजिमों को...दिन निकलते ही मीडिया वाले फिर लिपट जायेंगे पूछने को कि बताओ क्या हुआ मर्डर केस में? सीपी साहब (पुलिस कमिश्नर डॉ. केके पॉल) भी सुबह-सुबह सबसे पहले यही पूछेंगे कि क्या हुआ केस में...?'

मुझे खूब याद है जब डीसीपी साहब को मैने रात में सूचना दी कि सर मुलजिम पकड़ गये हैं. करीब 22 लाख रुपये भी बरामद हो गये हैं. इस पर डीसीपी साहब बोले, 'अरे नहीं...क्या वाकई...सही बताओ भई..क्या मैं अभी सीपी साहब (पुलिस कमिश्नर) को जगाकर केस वर्कआउट की जानकारी दे दूं!' तो मैने उनसे (डीसीपी से) कहा कि नहीं, ‘सर सीपी साहब को दिन निकलने पर ही डिटेल जानकारी दीजिए. तब तक हम लोगों को (पड़ताली पुलिस टीम) सबूत जुटाने के लिए दो-तीन घंटे का और वक्त मिल जायेगा.'

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दिल्ली पुलिस की प्रतीकात्मक तस्वीर

उस भयावह काली-रात में गुजारे सांसें रोक देने वाले हर लम्हे की 'पड़ताल' का पन्ना-पन्ना पलटकर, एक दशक पहले घटी उस सच्ची घटना को भी ऐसे सुनाते हैं मदन मोहन शर्मा, मानो यह कल ही का वाकया हो.’ 30 अप्रैल 2007 को जब मैं एसीपी सिविल लाइंस के पद से रिटायर होने के बाद, पुलिस कमिश्नर पॉल साहब से मिलने दिल्ली पुलिस मुख्यालय गया तो उन्होंने कहा था, 'मन मोहन वेलडन' उनकी वो आवाज और अल्फाज आज भी कान में गूंज रहे हैं.’ दिल्ली पुलिस की नौकरी की खूबसूरत यादों को बांटते हुए बताते हैं मदन मोहन शर्मा.

जानें, कौन हैं इस पेचीदा ‘पड़ताल’ के ‘पड़ताली’

मदन मोहन शर्मा का जन्म दिल्ली से सटे हरियाणा के जिला सोनीपत के सिसाना गाँव में 7 अप्रैल 1947 को हुआ. सन् 1967 में सोनीपत के हिंदू कॉलेज से ग्रेजुएशन किया. 1969 में दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर में भर्ती हो गये. पहली पोस्टिंग मिली दिल्ली पुलिस सुरक्षा विंग में. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के वक्त (1982 से 1984 तक) चौकी इंचार्ज साउथ एवन्यू रहे.

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दिसंबर 1985 में प्रमोट होकर इंस्पेक्टर बने. एडिश्नल एसएचओ के रूप में पहली पोस्टिंग हुई थाना पार्लियामेंट स्ट्रीट. जबकि बतौर एसएचओ पहली पोस्टिंग हुई थाना जनकपुरी में. उसी दौरान कुख्यात अंतरराष्ट्रीय बिकनी किलर हतचंद भाओनानी गुरुमुख चार्ल्स शोभराज तिहाड़ जेल से भाग गया. मदन मोहन शर्मा 1998 में दुबारा जनकपुरी थाने के एसएचओ बनाये गये.

इसके अलावा वे थाना ग्रेटर कैलाश भी रहे. 20 अगस्त 2002 को एसीपी के पद पर प्रमोट हुए. एसीपी चाणक्यपुरी के बाद उन्हें सिविल लाइंस सब-डिवीजन का एसीपी बनाया गया. वहीं से रिटायर हुए. मदन मोहन शर्मा की दिल्ली पुलिस सेवा की उपलब्धियों में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ 1972 में शिमला समझौता, 1973 में नेपाल यात्रा, 1976 में काबुल (अफगानिस्तान) प्रमुख रही हैं.

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं. )

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