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वो कलाकार जिसके आते ही टीवी बंद कर दिया जाता था!

चंद्रशेखर दुबे के साथ ही भ्रष्ट मुनीमों, लोलुप पुजारियों और मक्कार साहूकारों के किरदार भी मृत हो गए. अच्छा ही हुआ वैसे. उनसे बेहतर ये किरदार कोई निभा भी नहीं पाता

Satya Vyas Updated On: May 13, 2018 11:46 AM IST

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वो कलाकार जिसके आते ही टीवी बंद कर दिया जाता था!

प्रसिद्ध साहित्यकार कृश्न चंदर अपनी एक व्यंग्य रचना में कहते हैं कि 'ए से होता है एक्स्ट्रा. दरअसल यह एक्स्ट्रा वह लोग होते हैं जो हीरो या हीरोइन बनने की इच्छा से हजारों की तादाद में अपना घर छोड़कर अपने मां-बाप, भाई-बहन, खाविंद, बीवी-बच्चे सब छोड़कर मुंबई चले आते हैं. एक सेट से दूसरे सेट पर धकेले जाते हैं. इनमें से हर मर्द या औरत एक सपना पलता है कभी भी हीरो या हीरोइन बन जाएंगे और दुर्भाग्य से फिल्मी दुनिया में कुछ ऐसे उदाहरण मौजूद हैं कि कोई एक्स्ट्रा हीरो या हीरोइन बन गए. इसलिए यह सपना किसी एक्स्ट्रा की आंखों से नहीं मिटाया जा सकता.'

सी. एस. दुबे अर्थात चन्द्रशेखर दुबे भी यही सपना लेकर मायानगरी पहुंचे थे. देश का बंटवारा हो चुका था. लाहौर समेत फिल्मोद्योग का एक बड़ा हिस्सा अब सरहद पार था; इसलिए नए लोगों के लिए अवसर थे. दुबे भी अमीय चक्रवर्ती के प्रोडक्शन हाउस के मुलाज़िम हो गए. पहले ऑफिस बॉय, फिर प्रोडक्शन असिस्टेंट और फिर सहायक निर्देशक तक का काम उन्होंने अमीय चक्रवर्ती के साथ किया. मगर उन्हे अभिनय का शौक था. यह शौक अमीय से भी छुपा न रह सका और उन्होंने दुबे को छोटे ही सही मगर अपनी फिल्मों दाग, पतिता और सीमा में अभिनय का पहले पहल मौका दिया.

दुबे अभी फिल्मी दुनिया के गुर सीख ही रहे थे की अमीय की असमय मृत्यु हो गई और दुबे फिर से वहीं आ गए जहां से उन्होंने प्रारंभ किया था. अभिनय में ही रुचि थी और अभिनय ही वह करने आए थे सो उन्होंने सामने आए हर किरदार लेने शुरू किए. अपनी प्रारंभिक फिल्मों में ही कन्हैयालाल जैसे अदाकार के साथ काम करते हुए वह इतने प्रभावित हुए की उनके आगामी फिल्मों में उनकी झलक न चाहते हुए भी मिल जाती है.

साठ-सत्तर का दशक कहानियों के लिहाज से किसानोन्मुख रहा. यही कारण रहा कि जमींदार, साहूकार, मुनीम इत्यादि खलनायक के रूप में प्रस्तुत हुए. सी.एस. दुबे इन भूमिकाओं के लिए ही बने थे. आवाज और भावों का मोड्यूलेशन वह इतनी खूबसूरती से करते थे कि एक पल को सज्जन और निरीह दिखने वाला साहूकार/पुजारी नायिका को घर में लाते ही जैसे ही सांकल चढ़ाता है वैसे ही उसकी आवाज और चेहरे का काइयांपन सारा किस्सा बयान कर देता है. दुबे को इसमें महारत हासित थी. यह भूमिकाएं उनसे बेहतर कर पाना किसी और के लिए संभव न था.

शैक्षणिक स्थिति का प्रभाव कहें या फिर घर के माहौल का असर, दुबे की पकड़ हिंदी और संस्कृत भाषाओं पर इतनी अच्छी थी कि संस्कृत के मंत्रोच्चार करते पुजारी की यदि फिल्मों में कहीं जरूरत हो या फिर शुद्ध हिंदी बोलने वाले किरदार हो तो दुबे सबसे पहली पसंद होते थे. 'चोर हो तो ऐसा', 'इम्तिहान', 'पिया का घर', 'राखी और हथकड़ी' जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसी ही भूमिकाएं अदा कीं.

साफ आवाज के मालिक सी. एस. दुबे महज फिल्मों में ही सक्रिय नही थे वरन् रेडियों पर भी कार्यक्रम किया करते थे. हवामहल कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी अक्सर रहती थी. मगर लगाव अभिनय से ही रहा. सन् 1961 में ही निर्देशन में हाथ जला चुके दुबे ने फिर कभी निर्देशन की नहीं सोची.

सी. एस. दुबे उन सौभाग्यशाली लोगों में से रहे जो जीवनपर्यंत ही नहीं बल्कि मरणोपरांत भी फिल्म करते रहे. सन 1993 में अपने देहांत तक तो वह फिल्मों में सक्रिय रहे ही; उनके द्वारा अभिनित फिल्में जैसे दुलारा, आतंक ही आतंक, गैर जैसी विलंबित फिल्मों में भी वो दिखते रहे.

दूरदर्शन के सायंकालीन फिल्मों के दौर में एक कहावत प्रचलित हो चली थी - सी. एस. दुबे यदि स्क्रीन पर आए तो टीवी पांच मिनट के लिए बंद कर देनी चाहिए. यह उस अदाकार के अभिनय की जीवंतता दर्शाने के लिए काफी है जो तमाम ऐसी भूमिकाएं सफलता से निभाता रहा कि लोगों को उसके चेहरे से घृणा हो जाए. यह भूलकर कि यह इंसान फिल्मों के बाहर अपनी ज़िंदगी में गरीब बच्चों की मुफ्त पढ़ाई का झंडाबरदार था.

चंद्रशेखर दुबे के साथ ही भ्रष्ट मुनीमों, लोलुप पुजारियों और मक्कार साहूकारों के किरदार भी मृत हो गए. अच्छा ही हुआ वैसे. उनसे बेहतर ये किरदार कोई निभा भी नहीं पाता.

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