S M L

जब नौकरी की वजह से उस्ताद अमजद अली खान को होना पड़ा था बेघर

उस्ताद अमजद अली खान आज शास्त्रीय संगीत की दुनिया के व्यस्तम कलाकारों में से हैं. उनका ये संगीत सफर यूं ही चलता रहे ऐसी दुआ है.

Updated On: Oct 09, 2018 07:12 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

0
जब नौकरी की वजह से उस्ताद अमजद अली खान को होना पड़ा था बेघर

पूरी दुनिया में उस्ताद अमजद अली खान को कौन नहीं जानता? उनकी संगीत साधना आज उन्हें इस मुकाम पर ले आई है जहां वो दुनिया भर में प्यार और शोहरत बटोर चुके हैं. उस्ताद मंगलवार को अपना 73वां जन्मदिन पूरा कर रहे हैं. संगीत की दुनिया में जर्रे से आफताब बनने के उनके सफर में तमाम संघर्ष आए गए. उस्ताद खुद याद करके बताते हैं, 'बचपन में हमने बहुत संघर्ष देखा. हमारे पिता उस्ताज हाफिज अली खान 1957 में दिल्ली आए थे. वो यहां पर एक संस्था में संगीत सिखाते थे. उस संस्था का नाम था ‘कल्चरल ऑर्गनाइजेशन ऑफ दिल्ली’.

उस वक्त मेरी उम्र 12 साल के करीब रही होगी. कुछ साल बाद उस संस्था ने हमसे कहा कि कि वो हमें भी नौकरी देंगे. इस बात के बाद नौकरी देने में उन्होंने करीब 6 महीने का वक्त लगा दिया. इसके अलावा जब तनख्वाह देने की बात हुई थी तब भी वो लोग अपनी बात से मुकर गए. दरअसल जब बात हुई थी तब बतौर तनख्वाह 500 रुपए देने का वायदा था लेकिन असल में जब तनख्वाह मिली तो वो रकम घटकर 300 रुपए हो गई थी. संस्था की तरफ से कह दिया गया कि हम 300 रुपए ही दे पाएंगे नौकरी करना हो तो करिए वरना जाइए. उस वक्त हमें पैसों की जरूरत थी. कुल मिलाकर वो ऐसा वक्त था कि हमें 300 रुपए की नौकरी करनी पड़ी.

ये बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद और संगीत साधना ही थी कि उस्ताद अमजद अली खान को जल्दी ही तमाम कार्यक्रमों के न्योते आने लगे. उस्ताद अमजद अली खान की व्यस्तता बड़ी तेजी से बढ़ रही थी. वो नौकरी करने के साथ साथ तमाम कार्यक्रम भी किया करते थे. नौकरी और कार्यक्रम दोनों से समझौता करना संभव नहीं था. परिवार को पैसों की भी जरूरत थी. इस तथ्य के बाद भी वो समय आ गया जब उस्ताद अमजद अली खान को लगा कि वो नौकरी के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं. पैसे अपनी जगह थे सिद्धांत अपनी जगह. बचपन से ही पैसों के पीछे ना भागने की सलाह मिली थी.

amjad ali khan 1

लिहाजा एक दिन उस्ताद अमजद अली खान ने तय किया कि वो नौकरी छोड़ देंगे. इस फैसले तक पहुंचने में उन्हें करीब 6 महीने का वक्त लगा. आखिरकार जब फैसला कर लिया तो उन्होंने इसके बारे में ऑर्गनाइजेशन को बताया. उन्होंने अपने फैसले से तो वाकिफ करा दिया लेकिन इसके बाद जो हुआ उसके लिए उस्ताद अमजद अली खान और उनका परिवार बिल्कुल तैयार नहीं था. एक बड़े फैसले के बाद इतना बड़ा झटका लगने की उम्मीद किसी को नहीं थी.

ये भी पढ़ें: दो अलग-अलग लोग थे मुंशी और प्रेमचंद

उस्ताद अमजद अली खान उन दिनों को याद करके बड़ी गंभीरता से बताते हैं- दरअसल उसी ‘कल्चरल ऑर्गनाइजेशन’ ने हमें दिल्ली में किराए का एक घर दे रखा था. आज दिल्ली में जिस जगह पर ‘इरविन हॉस्पिटल’ हैं वो घर वहीं हुआ करता था. ‘इरविन हॉस्पिटल’ जहां खत्म होता है वहां से अगर आप ‘मिंटो रोड’ की तरफ जाएं तो बड़े बड़े बंगले हुआ करते थे. उनके सामने बड़ा अच्छा बागीचा था. वहीं हम लोग किराए पर रहते थे.

एक दिन अचानक उस ‘कल्चरल ऑर्गनाइजेशन’ की तरफ से नोटिस आ गया कि आप लोग 15 दिन के भीतर घर खाली कर दीजिए. 15 दिन के भीतर दिल्ली में नया घर लेना मुश्किल था. मजबूरन हम लोग पिता जी को लेकर ग्वालियर चले गए. ये शायद मेरे इस्तीफे से पैदा हुई नाराजगी की वजह से हुआ होगा. खैर, इसके कुछ रोज बाद हम ग्वालियर से वापस लौटे और हमने निजामुद्दीन वेस्ट में एक दूसरा किराए का घर लिया. हम लोग उस घर की पहली मंजिल पर रहते थे, जिसका किराया उन दिनों में 250 रुपए था.

इसके बाद 1976 में उस्ताद अमजद अली खान की शादी हुई. शादी के बाद वो पंचशील एंक्लेव में ‘शिफ्ट’ हुए. उस घर का किराया 2500 रुपए था. उस वक्त के हिसाब से ये किराया ज्यादा था. एक रोज उस्ताद अमजद अली खान को लगा कि बहुत सारे कलाकार तो सरकारी घरों में रहते हैं. हजार दो हजार या शायद इससे भी ज्यादा. उस वक्त तक उन्होंने किसी तरह की सरकारी मदद नहीं ली थी. लिहाजा वो उस वक्त के हाउसिंग मिनिस्टर पीसी सेठी से मिलने गए. पीसी सेठी कांग्रेस पार्टी के थे. उस्ताद अमजद अली खान उनके पास चिट्ठी लेकर चले गए.

ये भी पढ़ें: जब-जब मोहब्बत के अंजाम पे रोना आएगा, बेगम अख्तर याद आएंगी

उस्ताद अमजद अली खान बताते हैं, 'मुझे जब भी किसी से मिलने की जरूरत पड़ी मैंने सीधे उस व्यक्ति से जाकर मुलाकात की, फिर चाहे वो कोई ऑफिसर हो, मंत्री हो, सेकेटरी हो या सेक्शन ऑफिसर हो. हमने कभी किसी से ऊपर से कहलवा कर मुलाकात नहीं की. वो भी तब जबकि उस दौर में हम सभी को जानने लगे थे. हमने उन मंत्री जी से मुलाकात की, वो बहुत औपचारिकता से मिले. उन्होंने हमारी चिट्ठी हमसे ले ली. कुछ रोज बाद ही हमारे पास जवाब आ गया कि सरकार के पास ऐसी कोई पॉलिसी नहीं है कि वो हमें घर दे. उस वक्त मेरे दिमाग में आया कि मैं एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करूं और इस बात को सभी के सामने रखूं कि अगर सरकार की ऐसी कोई पॉलिसी नहीं है तो फिर दिल्ली में हजारों कलाकार कैसे सरकारी बंगलों में रहते हैं. फिर ऐसा लगा जैसे मेरे गुरु कह रहे हों कि बेटा ऐसा काम मत करो कि पता चला उनके घर भी छिन गए. मैंने वैसा ही किया और सरकारी बंगला पाने की कोशिश छोड़ दी.

amjad ali khan 2

इन तमाम मुश्किलों के बाद भी उस्ताद अमजद अली खान ने अगर कोशिश की तो बस अपनी संगीत साधना में डूबे रहने की. उसमें निखार लाने की. ज्यादा से ज्यादा संगीत प्रेमियों तक पहुंचने की. आज उस्ताद अमजद अली खान के पास ऊपरवाले का दिया सबकुछ है. शानो शौकत की सारी सहूलियतें हैं. ढेरों सम्मान हैं. पूरी दुनिया में एक रुतबा है. बावजूद इसके ये उनकी सहजता है कि वो अब भी अपने परिचय में बस एक ही बात कहलाना पसंद करते हैं कि वो संगीत की दुनिया में श्रोताओं का बेतहाशा प्यार बटोरने वाले कलाकार हैं. उस्ताद अमजद अली खान आज शास्त्रीय संगीत की दुनिया के व्यस्तम कलाकारों में से हैं. उनका ये संगीत सफर यूं ही चलता रहे ऐसी दुआ है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi