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उत्तर प्रदेश चुनाव: दांव पर जनमत सर्वेक्षणों की साख

अनिश्चित डाटा के दमपर आखिर चुनावी सर्वेक्षणों के क्या मायने है ? एक पड़ताल

Updated On: Nov 20, 2016 06:21 PM IST

FP Staff

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उत्तर प्रदेश चुनाव: दांव पर जनमत सर्वेक्षणों की साख

निखिला नटराजन

कुछ दिनों पहले पूरी दुनिया ने देखा कि अमेरिकी चुनावों में ज्यादातर जनमत सर्वेक्षण फ्लॉप कर गए. यही हाल हुआ था बिहार के विधानसभा चुनावों में. बिहार में नीतीश कुमार की जीत और अमेरिका में हिलेरी क्लिंटन की हार ने चुनाव विशेषज्ञों को हैरान कर दिया.

अब बारी है उत्तर प्रदेश की

कहने को तो अमेरिका, बिहार और उत्तर प्रदेश में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है लेकिन कुछ बातों में ये उतने भी अलग नहीं. जैसे, सभी हाल ही के चुनाव हैं, चुनाव सर्वेक्षण के तरीके आधुनिक हैं, डाटा इकट्ठा करने की नई टेक्नोलॉजी राजनीतिक पार्टियों और सर्वेक्षण कंपनियों, दोनों के पास मौजूद है.

चार या पांच साल के अंतराल में चुनाव होते हैं और उस वक्त के दौरान काफी हद तक सामाजिक ताना-बाना बदल चुका होता है. हो सकता है इसीलिए, शायद सर्वेक्षण के पुराने फॉर्मूले काम नहीं आ रहे हों.

क्यों न हम खुद इस क्रिस्टल बॉल में झांकें और नब्ज पकड़ने की कोशिश करें. कुछ बिन्दुओं के जरिए समझते हैं इन सर्वेक्षणों और चुनावों का गणित.

डाटा क्रंच से क्या मिला?

आपके पड़ोसी की राय ठीक निकली, एक्सपर्ट्स की नहीं. वोटर का गुस्सा काम आया, डाटा नहीं, सोशल मीडिया की चांदी हो गयी, टेलीविज़न कमर्शियल से कोई खास तब्दीली नहीं हुई.

अमेरिका में कुल मिलाकर 10 महीने तक चुनाव विशेषज्ञ स्विंग वोटर की बात करने से बाज नहीं आए और आखिर में हुआ ये कि स्विंग वोटर धुंधला गया.

मुसलमान क्या करेंगे?

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती अपने समर्थकों को सत्ता में वापसी का फॉर्मूला कुछ इस तरह समझा रही हैं, ‘समाजवादी पार्टी का सबसे बड़ा वोट आधार यादव हैं. अब इसका बंटना तय है. ओबीसी तबके में ये मैसेज जा चुका है कि वे बंट चुके हैं. मुसलमानों ने फैसला कर लिया है कि वे उसी पार्टी को वोट देंगे जो बीजेपी को हराएगी. इसका सीधा मतलब है कि बीएसपी को फायदा मिलेगा.’

MuslimWomen

‘मुस्लिम बहुल इलाकों में मुसलमानों और दलितों के वोट मिलने से ही बीएसपी के उम्मीदवार चुनाव जीत जाएंगे. मुसलमान उन सीटों पर अपना वोट सपा व कांग्रेस को देकर मुस्लिम समाज के वोट न बांटें. ऐसा करने से पिछले लोकसभा चुनाव की तरह बीजेपी को फायदा होगा.’

उनका दावा है कि, इस बार उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का वोट नहीं बंटेगा. जैसे जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, मायावती इस दावे पर जोर दे रहीं हैं.

वोटर का गुस्सा और चुनावी नतीजे

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटरों की संख्या 19 फीसदी के करीब है. 22 फीसदी दलितों के बाद मुसलमान वोटरों का हिस्सा सबसे बड़ा है. उनकी संख्या 19 से 20 प्रतिशत के बीच है. यही मायावती की उम्मीद का आधार भी है. उन्होंने करीब सौ मुसलमान उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं.

रिपोर्ट्स की मानें तो, उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व अन्य समुदायों की तुलना में बहुत कम है.

स्क्रॉल में एजाज़ अशरफ लिखते हैं कि उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को मतदान से सिर्फ दो दिन पहले उनके वोट पर अंतिम फैसला लेने के लिए जाना जाता है. आखिर 2012 में भी युवा मतदाताओं ने धर्म और जाति से दूर हटकर ही तो अखिलेश यादव को चुना.

अमेरिका में भी आखिरी वक्त तक ट्रम्प के समर्थकों की अंतिम तादाद को लेकर कई सारे थ्योरी सामने आईं क्योंकि अमेरिका में मतदान प्रतिशत पश्चिमी देशों की तुलना में भी कम है, इसलिए कोई यह भविष्यवाणी नहीं कर सका कि वोटर घर से बाहर निकलेंगे या नहीं. यहीं से शुरू और खत्म हुआ सर्वेक्षणों का फ्लॉप शो.

यहां सोशल मीडिया महत्वपूर्ण हो जाता है. कौन हैं वह लोग जो आखिरी दिनों में वोट करने का फैसला लेते हैं? जाहिर तौर पर यह नौजवान वोटरों का सिग्नेचर है. उनको इंगेज और जागरूक रखने में फायदा है जैसा हमने अमेरिकी चुनाव में देखा.

मीडिया कवरेज ने उम्मीदवार के लिए कुछ नहीं किया

रही बात मेनस्ट्रीम मीडिया और चुनाव सर्वेक्षणों की, इस पर पूर्व चुनाव आयुक्त वाई क़ुरैशी कहते हैं, ‘मीडिया कवरेज ने उम्मीदवार के लिए कुछ नहीं किया. मीडिया मतदाताओं की तुलना में गांधी के करिश्मे में मसरूफ हो गया.

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अखिलेश यादव ने जीत की रणनीति साइकिलों और कोई कम से कम 800 रैलियों के माध्यम से तय की. 2012 के चुनावों में ये उल्लेखनीय हैं कि नॉनस्टॉप मीडिया कवरेज उन लोगों के लिए था जो वोटर नहीं सिर्फ दर्शक थे.’

आंकड़े और हकीकत

2011 की जनगणना की बारीकियां हमें एक समय पर नहीं लेकिन अलग अलग पोटलियों में मिली है. हाल ही में सेन्सस ब्यूरो ने धार्मिक आधार पर एक लिस्ट जारी की है. शुरुआती तौर पर भी इस लिस्ट में दिए गए कुछ आंकड़ों के साथ हाथापाई करें तो यह बात सा़फ है कि पोल सैंपल के बल पर चुनावी नतीजों की भविष्यवाणियां खतरों से भरी है.

2011 सेन्सस से एक उदहारण

ये आंकड़े सिर्फ एक जिले या गांव तक सीमित हैं लेकिन एक मोटी बात समझने के लिए काफी है कि, 5 साल पहले के नतीजों के आधार पर हम किसी एक वोट बैंक के बारे में 100 फीसदी विश्वास के साथ अनुमान नहीं लगा सकते.

एक जिले में चुनाव के ठीक एक साल पहले 15-19 उम्र के मुसलमानों की तादाद 0.2% थी. 20 से 34 उम्र के लिए यही आंकड़ा 0.18 फीसदी थी. अब इनमें से कितने लोगों ने 2012 में वोट किया, कितने लोग इस बार रजिस्टर करेंगे, कितनों को नौकरी नहीं मिली और इस वजह से नाखुश हैं, ये सभी फैक्टर चुनावी दंगल में मायने रखते हैं और इसीलिए डाटा एक मुल्क की मानवीय स्थिति को पकड़ नहीं पाता.

भले ही अमेरिका में ट्रम्प की जीत ने दुनिया को चौंका दिया हो लेकिन इतिहास गवाह है कि ट्रम्प की चढ़ाई के लिए 2016 ऐन वक़्त था. उत्तर प्रदेश में भी शायद हमें सामाजिक जानसांख्यिकी और लोगों की नाखुशी से चुनाव नतीजों के बेहतर संकेत मिलेंगे.

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