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वेलकम 2018: जानिए क्यों खास है आने वाला साल

इस साल ब्रिटिश राज की गुलामी की 150वीं बरसी है...

FP Staff Updated On: Dec 31, 2017 08:04 PM IST

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वेलकम 2018: जानिए क्यों खास है आने वाला साल

भारत के पहले कॉटन मिल की स्थापना के 200 साल

पूरी दुनिया के उद्योग जगत में भारत जिन वजहों से जाना जाता है, उनमें सूती वस्त्र उद्योग सबसे महत्वपूर्ण है. आज दुनिया के टेक्सटाइल इंडस्ट्री के 61 फीसदी हिस्से पर भारत का कब्जा है. लेकिन हमेशा यह स्थिति नहीं थी. वैसे तो प्राचीन काल से ही भारत अपने कपड़ों के लिए दुनियाभर में मशहूर था. लेकिन आधुनिक काल में औद्योगिक क्रांति और ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के बाद भारत ब्रिटेन में स्थित कॉटन मिल्स के लिए सिर्फ कपास का निर्यातक देश बनकर रह गया था. भारत से कपास का निर्यात होता था और ब्रिटेन से इसी कपास से बने सूती कपड़ों का आयात. लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रही.

1818 में भारत में पहली बार कॉटन मिल की स्थापना की गई. कोलकाता के बोरिया में भाप-शक्ति के सहारे चलने वाले कॉटन मिल की स्थापना की गई. इसके बाद 1830 में कोलकाता के ही फोर्ट ग्लोस्टर में कॉटन मिल की स्थापना की गई. इन दोनों मिलों की स्थापना ब्रिटिश लोगों द्वारा की गई थी. साथ ही ये दोनों मिल असफल साबित हुए और चल नहीं पाए. लेकिन इसने आगे की राह दिखाई और 1854 में एक भारतीय कावसजी डावर ने मुंबई में पहले कॉटन मिल की सफल स्थापना की. इसके बाद भारत ने टेक्सटाइल इंडस्ट्री में पीछे मुड़कर नहीं देखा.

ब्रिटिश राज की गुलामी की 150 वीं बरसी

भारत में अंग्रेजी शासन की स्थापना ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा हुई. व्यापार करने आई इस कंपनी ने 1757 में प्लासी की लड़ाई में जीत के साथ भारत में अपने शासन की स्थापना की. ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में शासन करने के लिए एक प्रशासक की नियुक्ति करती थी, जिसे गवर्नर जनरल कहा जाता था. यह गवर्नर जनरल ब्रिटेन के राजा यानी क्रॉउन के प्रति जवाबदेह नहीं होता था.

1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश क्राउन ने भारत की शासन व्यवस्था को अपने हाथों में ले लिया. यानी भारत में कंपनी राज खत्म हुआ और ब्रिटिश राज की शुरुआत हुई. गवर्नर जनरल के पद को समाप्त करके वायसराय का पद बनाया गया जो सीधे ब्रिटिश क्रॉउन का प्रतिनिधि होता था. वायसराय का फ्रेंच भाषा में अर्थ ‘उपराजा’ होता है. यह ब्रिटिश राज 15 अगस्त, 1947 में भारत की आजादी के साथ खत्म हुआ.

नस्लवाद की खिलाफत करने वाले हीरो के शहादत का 50वां साल

दुनियाभर में होने वाले नस्लीय भेदभाव का अहिंसक तरीके से विरोध करने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर की शहादत के 2018 में 50 साल हो जाएंगे. 4 अप्रैल, 1968 को अमेरिका के टेनेंसी राज्य के मेंफिस शहर में तड़के मार्टिन लूथर किंग की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

मार्टिन लूथर किंग जूनियर मानवाधिकारों के सशक्त प्रवक्ता थे. जिस वक्त उनकी हत्या की थी तब वे महज 39 साल के थे.

वैसे तो काले रंग और अफ्रीकन मूल के लोगों को गुलाम बनाने की दास प्रथा का अंत अब्राहम लिंकन ने ही कर दिया था लेकिन काले रंग के लोगों से सार्वजनिक जीवन में भेदभाव जारी था. किंग ने इन्हीं भेदभावों के खिलाफ आवाज उठाई थी. इसके साथ-साथ किंग ने आर्थिक गैर-बराबरी के सवाल को भी अपने आंदोलन का मुख्य मुद्दा बनाया था. इसकी वजह से कई गोरे रंग के लोग भी किंग के आंदोलन की समर्थक बन गए थे. किंग बहुत ही प्रभावशाली ढंग से भाषण देते थे. उनके कई भाषण आज भी लोकप्रिय हैं. किंग सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में भेदभाव के खिलाफ होने वाले आंदोलनों के एक प्रतीक भी हैं.

सबप्राइम-2008

'ज़मीन की कीमत कभी कम नहीं होती', 2008 के पहले दुनिया भर के लोग इस बात में यकीन करते थे. अगर आज भी आपको ऐसा लगता हो तो इस धारणा को बदल लीजिए.

आज से 10 साल पहले अमेरिका में बैंकों ने घर खरीदने के लिए लोन बांटे. लोगों ने कर्ज लेकर अपनी हैसियत से ज्यादा महंगे घर खरीदे. क्योंकि उन्हें लगता था कि उनकी संपत्ति की कीमत ब्याज से ज्यादा हो जाएगी. बाज़ार में मांग ज्यादा थी तो संपत्ति महंगी होती गई.

एक समय के बाद हर कोई ऊंची कीमत पर संपत्ति बेचना चाहता था मगर खरीददार कोई नहीं था. ऐसी स्थिति में लोग बैंक को कर्ज नहीं लौटा पाए. बैंकों ने बदले में वो संपत्ति जब्त कर ली. मगर एक नई समस्या हो गई. बैंको के पास अचल संपत्ति तो थी मगर नकदी नहीं थी. देखते ही देखते बैंक फेल हो गए. इसके बाद जो मंदी आई उसने दुनिया भर के देशों में नौकरियां खत्म कीं. भारत समेत तमाम मुल्कों के शेयर बाज़ार बुरी तरह गिर गए. सबप्राइम संकट को 2018 में 10 साल पूरे हो रहे हैं.

1988 अलकायदा बना

अमेरिकी एजेंसी सीआईए ने पाकिस्तान की आईएसआई के साथ मिलकर अफगानिस्तान से सोवियत संघ को उखाड़ने की योजना बनाई. इस प्लान को ऑपरेशन सायक्लोन नाम दिया गया. इस ऑपरेशन में इस्लामिक कट्टरपंथी अफगान मुजाहिद्दीनों को सशक्त किया गया. 1988 में एक संगठन शुरू हुआ जिसका नाम था 'अल क़ायदा'.

अमेरिका को नहीं पता था कि जिस बिन लादेन और अल कायदा को वो खड़ा कर रहा है वो उसके लिए ही खतरा बन जाएगा. दुनिया भर में आतंक का पर्याय बने अल कायदा कका सिद्धांत है कि प्लानिंग करने में कम से कम लोग हों और उसे पूरा करने में ज्यादा से ज्यादा. 11 सितंबर के हमले के बाद अमेरिका लादेन के खिलाफ सख्त हो गया और 2011 में ऐबटाबाद में उसको मार गिराया.

1988 बेनज़ीर भुट्टो पहली बार प्रधानमंत्री

कहते हैं कि पाकिस्तान को तीन ताकते चलाती हैं- अल्लाह, आर्मी और अमेरिका. इसी पाकिस्तान में 1988 में बेनज़ीर भुट्टो पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. बेनज़ीर का मतलब होता है जैसा कोई दूसरा न हो, बेनज़ीर का पहला कार्यकाल भी ऐसा ही था. देश के दक्षिणपंथी संगठन, तबके सेना प्रमुख असलम बेग, औऱ आईएसआई चीफ हामिद गुल और राष्ट्रपति गुलाम इश्क खान भुट्टो परिवार से दुश्मनी मानते थे. इसके साथ ही एक महिला का वज़ीर-ए-आज़म बन जाना भी बहुतों को बर्दाश्त नहीं था.

एक ओर भुट्टो ने सर पर दुपट्टा रखकर तमाम इस्लामिक पुरातनपंथियों को साधने की कोशिश की, दूसरी ओर उनके सारे बड़े फैसलों को लागू होने से रोका गया. बेनज़ीर ज़िया उल हक़ के शासन में गिरफ्तार राजनीतिक बंदियों को नहीं छुड़वा पाईं. इसी तरह मीडिया से सेंसरशिप हटाने के उनके फैसले को हर संभव तरीके से टाला गया.

1990 आते-आते राष्ट्रपति खान और पीएम बेनज़ीर का टकराव बहुत बढ़ गया. सरकार के तमाम कामों पर खान ने वीटो लगा दिया. इस बीच मुहाजिरों को लेकर हिंसा और अफगानिस्तान में तनाव बढ़ गया. बेनज़ीर के पति ज़रदारी अपने भ्रष्टाचार के चलते मिस्टर 10 परसेंट कहलाए जाने लगे. 1990 में बेनज़ीर सरकार को खान ने आठवें अमेडमेंट के तहत बर्खास्त कर दिया.

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