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महात्मा गांधी को लेकर सबसे बड़ी पहेली: बापू संत थे या राजनेता?

गांधी जी ने एक बार कहा था- मेरा सबकुछ ले लो मैं रहूंगा. हाथ काट लो, आंख और कान ना रहें तब भी रहूंगा. सिर जाए तब भी कुछ पल रह जाऊं. पर ईश्वर गया कि तब तो मैं उसी दम मरा हुआ हूं

Updated On: Oct 02, 2017 04:03 PM IST

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa
लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों के शोधकर्ता और इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज के संस्थापक सदस्य हैं

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महात्मा गांधी को लेकर सबसे बड़ी पहेली: बापू संत थे या राजनेता?

गांधी संत थे या राजनेता. यह सवाल लोगों को आज तक परेशान करता है. इसके पहले कि आप गांधी के संत या राजनेता होने पर कोई पक्की राय बनाएं आइए, उस इतिहास को खंगालें जहां से इस विवाद की शुरुआत मानी जा सकती है.

‘संत बनकर राजनीति नहीं हो सकती और राजनेता होकर कोई संतई नहीं कर सकता’. गांधी के प्रसंग में इस विचार का नाता उनकी आत्मकथा से है. गांधी ने अपनी आत्मकथा प्रौढ़ उम्र में लिखी. साप्ताहिक नवजीवन में 1925-28 के बीच के समय जब इसका प्रकाशन हुआ, गांधी 50 की उम्र पार कर चुके थे और उनकी दुनियाभर में प्रसिद्धि हो चुकी थी.

गांधी की आत्मकथा और जार्ज ऑरवेल

‘माय एक्सपेरिमेन्टस् विद ट्रूथ’ को देश और दुनिया ने हाथों-हाथ लिया. आत्मकथा को पढ़कर अपने वक्त के मशहूर लेखक जार्ज ऑरवेल के मन में शंका उठी कि गांधी की आत्मकथा में चतुराई है. वो हैं तो घुटे हुए राजनेता लेकिन आत्मकथा उन्होंने अपनी संतई के पक्ष में लिखी है. ऑरवेल को लगता है गांधी का मूल्यांकन उनके इस विरोधाभास पर सवाल उठाकर होना चाहिए कि इन बुजुर्ग ने चटाई पर पालथी मार, प्रार्थना में डूबकर हासिल की जाने वाली ‘अध्यात्म की शक्ति से ब्रिटिश साम्राज्य को कहां तक हिलाया’ और 'राजनीति में घुसकर, जो कि स्वभाव से ही डंडामार है, छल-छद्म से बंधी है अपने सिद्धांतों के साथ कहां तक समझौता किया.'

ऑरवेल को लगता है कि गांधी ने आत्मकथा अपनी संतई के पक्ष में लिखी है क्योंकि वह पाठक को 'याद दिलाती है कि इस संत के भीतर बहुत चतुर और समर्थ आदमी छुपा था जो चाहता तो एक सफल वकील, प्रशासक या फिर बनिया बनकर उभरता.' गांधी को संसारी बनाम संन्यासी के द्वैत में देखने के कारण ऑरवेल को इस बात का मलाल है कि पश्चिम की वामधारा की राजनीति गांधी को अपना ‘अविभाज्य हिस्सा’ मानने लगी है.

शांतिवादी और अराजकतावादी यह देखकर कि ‘गांधी केंद्रीकरण और राजसत्ता की हिंसा के विरोधी हैं, उन्हें अपना मान बैठे हैं.’ और गांधी के सिद्धांतों के सन्यासीपन में छुपे 'मानवता-विरोधी प्रवृतियों' की अनदेखी करते हैं.’ गांधी की संतई पर कटाक्ष करते हुए ऑरवेल लिखते हैं- ‘बेशक, दारू, तंबाकू जैसी चीजों से किसी संत को जरूर ही बचना चाहिए लेकिन संतई ऐसी शै है जिससे मनुष्य-मात्र को बचना चाहिए.’

महात्मा गांधी के साथ जवाहरलाल नेहरू [फोटो: विकिकॉमन]

महात्मा गांधी के साथ जवाहरलाल नेहरू [फोटो: विकिकॉमन]
गांधी की संतई और नेहरू

ऑरवेल जैसे विदेशियों को ही नहीं गांधी की राजनीति के संगी-साथियों को भी गांधी अबूझ लगे तो उसकी बड़ी वजह यही रही कि उन्हें राजनेता बनाम संत के चश्मे से देखा गया. नेहरू ने स्वीकार किया है कि 'गांधी को समझ पाना बहुत मुश्किल है. कभी-कभी उनकी भाषा एक औसत आधुनिक के लिए तकरीबन अबूझ हो जाती है.’

ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने जब वंचित तबकों के लिए पृथक निर्वाचक-मंडल की मंजूरी दी और गांधी ने विरोध में आमरण-अनशन की ठानी तो नेहरू को अचरज हुआ. गांधी के इस फैसले को याद करते हुए उन्होंने लिखा है- 'राजनीतिक प्रश्नों पर उनके धार्मिक और भावुक रूख और इस मामले में बार-बार ईश्वर की दुहाई देने को लेकर मुझे क्रोध आता था. वो तो यह जताते जान पड़ते थे कि ईश्वर ने उन्हें उपवास के दिन के बारे में संकेत किया है. कितनी खराब बात है यह!'

गांधी की संतई और आचार्य कृपलानी

‘संत होकर आधुनिक नहीं हुआ जा सकता और ठीक इसी कारण व्यक्ति की आजादी को अहम मानने वाली लोकतांत्रिक राजनीति भी नहीं की जा सकती’. इस सोच ने गांधी के संगी-साथियों की आंखों में गांधी को अबूझ बनाया. नेहरू के प्रतिस्पर्धियों में से एक आचार्य कृपलानी की गांधी पर लिखी किताब ‘गांधी: हिज लाइफ एंड थॉट’ के एक अध्याय का शीर्षक ‘वॉज गांधीजी मॉडर्न’ बहुत कुछ यही बताता प्रतीत होता है.

कृपलानी गांधी के अन्यतम साथियों में हैं. कहते हैं कि गांधी के ‘गांव-गणराज्य’ के सपने से कांग्रेस को दूर जाता देखकर उन्होंने पार्टी छोड़ी और समाजवादी धारा की राजनीति की जीवन की आखिरी सांस भी उन्होंने साबरमती आश्रम में ली.

नेहरू की पश्चिमी तर्ज की आधुनिकता पर किसी और को कोई शक हो तो हो लेकिन कृपलानी के मन में रंच-मात्र ना था. उन्होंने नेहरू की पश्चिमी काट की आधुनिकता को गांधी की देशज आधुनिकता के बरक्स रखकर चुटकी लेते हुए लिखा है- 'जवाहरलाल के सोच की धारा पश्चिमी थी, उनकी जीवन-दृष्टि दोलायमान थी, कभी भारत की तरफ डोल जाती थी तो कभी पश्चिम की तरफ. जन-साधारण के मुहावरे में व्यक्त गांधीजी के विचार पश्चिम से बहुधा प्रभावित होने के बावजूद मुख्य रूप से भारतीय थे.'

दिलचस्प यह है कि गांधी को आधुनिक बताने के लिए जब वो दलील देते हैं तो उनका मन भी उसी तरह दोलायमान होता है जैसा कि उन्होंने नेहरू के संदर्भ में लक्ष्य किया है. वो गांधी के ‘सत्य’ की खोज को कुछ-कुछ वैसा मान बैठते हैं मानो कोई वैज्ञानिक प्रयोगशाला में बैठकर अणु-परमाणु के गुण-धर्म तलाश रहा हो.

कृपलानी लिखते हैं कि गांधीजी अरूप ईश्वर के विश्वासी थे लेकिन 'क्या ईश्वर में विश्वास तर्कयुक्ति (रैशनलिटी) और विज्ञान (साईंस) के विरुद्ध है? सभी महान वैज्ञानिक नास्तिक हैं. न्यूटन, आइंस्टीन, जे सी बोस, सी वी रमण और कई अन्य ईश्वर में विश्वास के पक्षधर हैं, लेकिन वो प्रयोगशालाओं के भीतर ईश्वर को लेकर नहीं जाते, उनकी खोज सत्य की खोज थी जो कि गांधी के अनुसार ईश्वर है !'

कृपलानी अपने सोच में यह कहते प्रतीत होते हैं कि वैज्ञानिक कभी दावा नहीं करता कि उसने अपनी प्रयोगशाला में अंतिम रूप से सत्य को जान लिया है, इसलिए विज्ञान में प्रयोग लगातार चलते रहता है और गांधी की नजर में भी सत्य प्रयोगों का ही विषय है—इसलिए गांधी भी आधुनिक मनुष्य हैं, किसी अदेखे ईश्वर की बात कहने और करने वाले महात्मा नहीं. इस तर्क की मुश्किल यह है कि वह गांधी के लिखे-कहे से मेल नहीं खाता. गांधी सत्य की अपनी तलाश को ईश्वर की अपनी धारणा की जरूरी हिस्सा बताते हैं.

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गांधी से आप ईश्वर नहीं छीन सकते

गांधी ने डंके की चोट पर अपने को हिंदू कहा था और ऐसा कहने से एक आवाज यह भी निकलती है कि ‘सत्य’ और ‘अहिंसा’ के मूल्य उनके लिए ईश्वर की धारणा के बिना बेमानी हैं. इसका एक प्रमाण है अपने धार्मिक विश्वासों के बारे में उनका वह जवाब जो उन्होंने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उनके प्रश्नों के सिलसिले में दिया था.

गांधी का अपने धर्म, ईश्वर के बारे में धारणा और राजनीति के बारे में यह जवाब छपा ‘कंटेपररी इंडियन फिलॉसफी’ नाम की किताब में. किताब लंदन में साल 1936 में डॉ. राधाकृष्णन के संपादन में छपी. छापने का उद्देश्य था 'पूरब और पश्चिम की श्रेष्ठ प्रतिभाओं के बीच पारस्परिक समझ' बनाना.

इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रतिनिधि दार्शनिक के तौर पर महात्मा गांधी, रबीन्द्र नाथ टैगोर, स्वामी अभेदानंद, हरिदास भट्टाचार्य, के सी भट्टाचार्य, जी सी चटर्जी, आनंद कुमारस्वामी, एन जी दामले, भगवान दास, रास बिहारी दास और सुरेंद्रनाथ दासगुप्ता समेत 25 चिंतकों के आलेख छापे गए. पहला ही तकरीबन 500 शब्दों का आलेख एक वक्तव्य के रूप में गांधी का है. गांधी के इस वक्तव्य को महत्वपूर्ण मानने की वजह है इसका परिवेश.

गांधी ने यह वक्तव्य किसी तात्कालिक राजनीतिक समस्या के दबाव में प्रस्तुत नहीं किया था. ना ही यह वक्तव्य पक्ष-प्रतिपक्ष के वैसे द्वन्द्व का परिणाम है जैसा कि गांधी की किताब हिंद स्वराज में देखने को मिलता है. हिंद-स्वराज के किरदार ‘संपादक’ और ‘पाठक’ के बीच के वाद-विवाद अपने पैनेपन में भले बेजोड़ लगें लेकिन वहां तर्कों का पैनापन प्रतिपक्षी को तर्क के सहारे ध्वस्त करने की मंशा का परिणाम है, सत्य के गहरे अनुसंधान का नहीं. हिंद-स्वराज में घोषित तौर पर द्वंद्व पूरब और पश्चिम के बीच है जबकि ‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ का घोषित उद्देश्य ‘पूरब और पश्चिम के बीच श्रेष्ठतर समझ’ बनाना है.

‘कंटेपररी इंडियन फिलॉस्फी’ के लिए राधाकृष्णन ने गांधी से तीन सवाल पूछे थे- (क) आपका धर्म क्या है, (ख) आप धर्म में कैसे प्रवृत्त हुए और (ग) सामाजिक जीवन पर इसका क्या असर रहा है? प्रश्नों की प्रकृति से ही संकेत मिलते हैं राधाकृष्णन ने गांधी को धर्म-विश्वासी मानकर सवाल किए. गांधी का उत्तर इसके अनुकूल ही था.

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महात्मा गांधी लंदन में

गांधी ने पहले सवाल के जवाब में लिखा 'मैं धर्म से हिंदू हूं जो मेरे लिए मानवता का धर्म है और जिसमें मुझे ज्ञात सारे धर्मों का श्रेष्ठतम शामिल है.' दूसरे प्रश्न के उत्तर में बताया- 'मैं इस धर्म में सत्य और अहिंसा यानी व्यापक अर्थों में प्रेम के रास्ते प्रवृत्त हुआ. यह कहने की जगह कि ‘ईश्वर सत्य है’, हाल-फिलहाल मैंने अपने धर्म को परिभाषित करने के लिए ‘सत्य ईश्वर है’ कहना शुरू किया है. क्योंकि ईश्वर को लोग नकार सकते हैं लेकिन सत्य को नकारा नहीं जा सकता. यहां तक कि मनुष्यों में जो सर्वाधिक अज्ञानी हैं, उनमें भी कुछ सत्य है. हम सब सत्य की कौंध हैं. इस कौंध का सकल-समग्र - यानी अज्ञात सत्य, ही ईश्वर है. मैं अनवरत प्रार्थना के सहारे रोज ही इसके निकट पहुंचता हूं.'

और, तीसरे प्रश्न के उत्तर में गांधी ने सत्य यानी ईश्वर से जुड़ी अपनी राजनीति का खुलासा किया. गांधी ने कहा- 'ऐसे धर्म के प्रति सच्चा होने के लिए प्रत्येक जीवन की अनवरत-अविराम सेवा में स्वयं को निःस्व करना पड़ता है. सत्य का साक्षात्कार जीवन के अनंत सागर में विलीन हुए और इससे तदाकार हुए बिना असंभव है, इसलिए समाज-सेवा से मेरी निवृति नहीं है.'

गांधी के नाम से जुड़ी राजनेता बनाम संन्यासी की जो पहेली आज तक चली आ रही है. अचरज कीजिए कि गांधी कहानी में वह पहेली कहीं है ही नहीं. राजनीति विज्ञानी और राजनेता तो नहीं समझ पाए लेकिन एक साहित्यकार ने गांधी की इस सच्चाई को समझा था. अपनी किताब ‘अकाल-पुरुष गांधी’ साहित्यकार जैनेंद्र ने महात्मा के बारे में लिखा है कि 'गांधी जी ने एक बार कहा मेरा सबकुछ ले लो मैं रहूंगा. हाथ काट लो, आंख और कान ना रहें तब भी रहूंगा. सिर जाए तब भी कुछ पल रह जाऊं. पर ईश्वर गया कि तब तो मैं उसी दम मरा हुआ हूं.'

जैनेंद्र गांधी की इस बात का निष्कर्ष निकालते हुए कहते हैं—‘राजनीति और धर्म में भेद है, विग्रह भी है. लेकिन गांधीजी उन दोनों के अभेद हैं और संग्रह हैं. वह जीवित उदाहरण हैं इस सत्य के कि जीवन संयुक्त, समग्र और सिद्ध है तो वहां जहां वह निस्व (निःस्वार्थ) है. इस मूल निष्ठा को पाकर फिर गांधीजी का बस एक प्रयत्न रहा है. वह यह कि अपने समूचेपन और तन को लेकर उस निष्ठा से तत्सम हो जायें. इस तरह दुनिया में रहकर गांधी जी सदा परीक्षा में हैं और उनके हाथों में राजनीति भी सदा परीक्षा में है.'

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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