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महिलाओं के बारे में खुशवंत सिंह वैसे नहीं थे, जैसे याद किए जाते हैं

खुशवंत को जब ऑनेस्ट मैन ऑफ द इयर का खिताब मिला तो उन्होंने बताया कि वो कलमें चुराते हैं

FP Staff Updated On: Mar 20, 2018 08:35 AM IST

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महिलाओं के बारे में खुशवंत सिंह वैसे नहीं थे, जैसे याद किए जाते हैं

खुशवंत सिंह को लेकर तमाम बातें हो चुकी हैं. उनको ओल्ड डर्टी सरदार की तरह तमाम लोग याद करते हैं. लेकिन खुशवंत की शख्सियत में कई परतें हैं. हालांकि उनके बारे में एक बात बड़ी साफ है. वो बेबाक रहे. चाहे अपने बारे में बात करनी हो, किसी बड़ी शख्सियत के बारे में बोलना हो. धर्म, सेक्स और औरतों की बात हो, खुशवंत सिंह हमेशा बिना किसी लाग-लपेट के ऐसा बोल गए कि लोग उनसे खार खाते रहे.

1998 में उन्हें ऑनेस्ट मैन ऑफ द ईयर का खिताब मिला था. वो बोले वो ईमानदार नहीं हैं. उन्हें कलम चुराने का शौक है औऱ उन्होंने कई सारी कलमों पर हाथ साफ किया है. इसके साथ ही उन्होंने लड़कियों को खुश करने के लिए झूठ भी बोले.

खुशवंत सिंह की महिलाओं को गलत नजरिए से देखने वाली छवि पर उनके बेटे राहुल ने अपने अनुभव साझा किए. 2002 की किताब खुशवंत: तुझसा कहें किसे में राहुल बताते हैं.

आशिक मिजाज बूढ़े की छवि

दिक्कत यह है कि मेरे पिता की, लोगों में खास किस्म की छवि बन गई है, जिसे वे तोड़ना ही नहीं चाहते. यह छवि ऐसे रंगीन-आशिक मिजाज बूढ़े की, जिसे सेक्स के अलावा कुछ सूझता ही नहीं, जो औरतों का दीवाना है और चौंका देने वाले बयानों और अश्लील चुटकुलों से सुर्खियों में बने रहना चाहता है.

उनका बेटा होने के नाते मैं सच्चाई जानता हूं कि उन्हें सेक्स के मामले में हमारे समाज में व्याप्त ढोंग और दोहरे मानदंडों को बेनकाब करने में मजा आता है, लेकिन जहां तक औरतों की चाहत और आशिकमिजाजी का सवाल है, उन्हें खुद अपनी ऐसी छवि बनाने में मजा आता है. वे हमेशा जवान-खूबसूरत औरतों से घिरे रहते हैं और उन्हें यह अच्छा भी लगता है (यह अच्छा किसे नहीं लगता?) लेकिन मैं जानता हूं कि दिल से बहुत ही रूढ़िवादी शख्स हैं.

मैं अपने किशोरावस्था का एक वाकया बताता हूं- हमारे घर की ऊपर की मंजिल पर एक बहुत ही खूबसूरत लड़की रहती थी. वह एक अफगानी राजनयिक की बेटी थी. हम दोनों एक दूसरे की तरफ आकर्षित थे. जब भी उसके माता-पिता बाहर जाते, वह मुझे फोन कर देती की रास्ता साफ है. मैं अपने फ्लैट से निकलकर ऊपर जाती सीढ़ियों में गायब हो जाता. मेरा इस तरह उससे चोरी-छिपे मिलना मेरे पिता से छिपा नहीं था और उन्हें यह कतई पसंद नहीं था.

तुम इन पठानों को जानते नहीं हो, किसी दिन पकड़े गए, तो उस लड़की का पिता तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेगा. एक दिन उन्होंने मुझे डराते हुए कहा. मैं थोड़ा डरा जरूर, लेकिन इतना नहीं कि उसके पीछे जाना छोड़ दूं.

देखते ही करारी झाड़ पिलाई

उससे पहले का ऐसा ही एक किस्सा और है. मैं स्कूल में ही था और हम छात्रों का एक गुट पार्टी में गया था. मैंने अपने माता-पिता से कह दिया था कि मैं समय पर शायद रात के 10 बजे तक लौट आऊंगा लेकिन पार्टी जरा लंबी खिंच गई और मैं आधी रात के आसपास ही लौट पाया लेकिन मेरे लौटने तक जो लड़कियां मेरे साथ थीं, उनके माता-पिता मेरे घर फोन कर चुके थे.

मेरे पिता मेरे पहुंचने तक जगे हुए थे. मुझे देखते ही उन्होंने करारी झाड़ पिलाई. खासकर, मेरे गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के लिए, उनके हिसाब से लड़कियों का ख्याल रखना मेरी जिम्मेदारी थी और मुझे समय पर घर लौटना चाहिए था.

मेरे पिता बेरहमी की हद तक ईमानदार हैं- अपने बारे में भी और दूसरों के बारे में भी. मैंने बेरहम शब्द का इस्तेमाल यहां जानबूझ कर किया है. उनमें छल-कपट या दिखावा बिल्कुल नहीं है. जो शख्स या जो चीज जैसी है, वे वैसा ही कहेंगे, भले ही इससे किसी की भावनाओं को चोट क्यों न पहुंचे.

मिसाल के दौर पर किसी मृत व्यक्ति के संस्मरण या श्रद्धांजलि लिखते समय वे उसकी कमजोरियों व ऐब का उल्लेख करने में नहीं हिचकते. उनका इस धारणा में विश्वास नहीं कि मरे हुए लोगों की आलोचना नहीं करनी चाहिए. वे यह मानते हैं कि एक सार्वजनिक व्यक्ति, भले ही उनका दोस्त ही क्यों न रहा हो, का मूल्यांकन सही-सही होना चाहिए.

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