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जब बापू से बोले मौलाना आजाद- आपका विनोबा तो हाफिज हो गया

विनोबा भावे राजनेता नहीं थे. विनोबा संत थे और एक संत को समझने के लिए स्वयं विश्लेषणकर्ता में विनम्रता, भावुकता और आध्यात्मिकता जैसे तत्व होने ही चाहिए

Avinash Dwivedi Updated On: Sep 11, 2017 12:12 PM IST

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जब बापू से बोले मौलाना आजाद- आपका विनोबा तो हाफिज हो गया

मेरी बहन दसवीं में थी, जब 'सर्व-सेवा-संघ' ने उसके स्कूल में एक कार्यक्रम करवाया. इसमें सभी विद्यार्थियों को 'गीता-प्रवचन' नाम की किताब भी दी गई थी. मैं तब छठी में था और पाठ्यक्रम से अलग चीजें पढ़ने में रस पाता था, इसलिए मैंने तभी से वो पुस्तक हथिया ली थी.

हालांकि तब वो पुस्तक पढ़ने की समझ तो विकसित हुई नहीं थी. इसलिए कुछ पन्ने पढ़ने के बाद न समझ आने पर रख दी गई. पर जब करीब चार साल बाद वो पुस्तक पढ़ी गई तो प्रभावित होकर गीता पढ़ने का मन भी हुआ और विनोबा के तर्कों और व्याख्याओं में विश्वास भी. मैंने फिर गीता और गीता-प्रवचन का तुलनात्मक अध्ययन प्रारम्भ किया. और पाया आचरण में लाने लायक और लोकव्यवहार से जुड़ी कई बातें इसमें हैं.

साथ ही मैं विनोबा के दर्शन की वैज्ञानिक व्याख्या का कायल हो गया. हालांकि यह काम तुरंत नहीं हुआ. ग्रेजुएशन तक कई बार पुस्तक के बहुत से अंश पढ़ने और उद्धृत करने से समझ और चिंतन का विकास हुआ.

इसी बीच किसी ने बताया, विनोबा ने लोकतंत्र का अनुशासन पर्व कहकर आपातकाल का समर्थन किया था. स्वयंसेवक संघ के कुछ नौजवानों की इसी तर्ज पर विनोबा के प्रति आलोचना सुनी कि वो इंदिरा गांधी के प्रति सह्रदय थे, इसीलिए उन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था तो मानो विश्वास ही नहीं हुआ.

इस वक्त तक भूदान के प्रणेता विनोबा संत के बारे में काफी कुछ जानने लगा था. फिर भी मैंने अपना विनोबा के विचारों और उनके कामों को पढ़ना जारी रखा. और पढ़ने के दौरान समझ आया कि विनोबा भावे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े ऐसे व्यक्तित्व हैं जो सबसे ज्यादा गलतफहमियों के शिकार रहे हैं. विनोबा भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा गलत आंकी शख्सियत हैं.

vinoba bhave and nehru

विनोबा भावे नेता नहीं संत थे, ये समझना बहुत जरूरी है

विनोबा भावे राजनेता नहीं थे. विनोबा संत थे और एक संत को समझने के लिए स्वयं विश्लेषणकर्ता में विनम्रता, भावुकता और आध्यात्मिकता जैसे तत्व होने ही चाहिए. पर गलती तब हुई जब स्वार्थी नेताओं को परखने के ऐतिहासिक चश्मे से विनोबा भावे को भी देखने का प्रयास इतिहासकारों ने किया.

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज विनोबा भारत के छात्रों की पाठ्य-पुस्तकों से गायब हैं तो इसके पीछे यह वजह भी जरूर रही है. ये बात भी है कि वर्तमान में संत का चोंगा ओढ़े बहरूपियों का दौर है. जिसमें संत जैसा शब्द अपनी अर्थवत्ता खो रहा है. ऐसे में सच्चे संत पर भी विश्वास कैसे हो?

आदर्श और मूल्य गिरावट की ऐतिहासिक स्थिति में हों तो विनोबा की आदर्शवादी बातें कैसे समझ आएं? ऐसे में विनोबा के विचार ही हैं, जिनका अध्ययन कर उनके प्रति बना दिए गए तमाम पूर्वाग्रह तोड़े जा सकते हैं. उनके जीवन और दर्शन को जानने वाला ही विनोबा को समझ सकता है.

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विनोबा के पिता नरहरि भावे ने अपने तीनों के तीनों बेटों को महात्मा गांधी को दान में दे दिया था. तीनों ही बाल ब्रह्मचारी थे. गांधी के संरक्षण में उनका विकास हुआ और उन्होंने गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. गांधी भी विनोबा को आध्यात्मिक रूप से बहुत काबिल मानते थे.

यही कारण था कि 1940 में गांधी जी की अनुशंसा पर उन्हें पहला सत्याग्रही चुना गया. इसने लोगों के मन में विनोबा को जानने की इच्छा जगाई. गांधी जी ने विनोबा भावे के लिए लिखा था- ‘विनोबा भारतीय स्वाधीनता में विश्वास करते हैं. वे इतिहास के विद्धान हैं. लेकिन उनका मानना है कि भारत के गांवों की वास्तविक आजादी बिना रचनात्मक कार्यक्रमों के असंभव है, और यह रचनात्मक कार्यक्रम खादी है.’

vinoba bhave and gandhi

भाषाओं के जरिए लोगों को सिखाया समर्पण और प्रेम

प्रथम सत्याग्रही चुने जाने और गांधी जी की प्रशंसा के बाद विनोबा की ख्याति पूरे देश में फैल गई. इसके बाद हुए एक के बाद एक कई सत्याग्रह आंदोलनों में हिस्सा लेते हुए विनोबा 1940 से 1941 के बीच तीन बार जेल गए. 1942 में गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन में भी विनोबा भावे कूदे और गिरफ्तार हो गए. जेल में रहने के दौरान उन्होंने पढ़ाई-लिखाई का काम किया. यहीं विनोबा ने ‘गीताई’ पुस्तक पूरी की.

वैलूर जेल में उनके साथ कई प्रांतों के कैदी थे. जो आपस में अंग्रेजी में बात करते थे. विनोबा को यह बुरा लगा. उनका विचार था, आपसी बातचीत के लिए हम अपनी भाषा पर निर्भर क्यों न हो? लोगों को यह संदेश देने के लिए कि वे एक-दूसरे की भाषाएं सीखें, उन्होंने जेल प्रवास के दौरान तमिल, तेलुगु, कन्नड और मलयालम भाषाएं सीखीं. उर्दू वे सेवाग्राम में रहते हुए न केवल सीख चुके थे, बल्कि प्रवीणता भी प्राप्त कर चुके थे. इसी बीच एक मजेदार घटना घटी.

सेवाग्राम में एक मुस्लिम युवक आया. आश्रम की सर्व-धर्म समभाव की नीति के तहत उसे अरबी भाषा सिखाना जरूरी था. लेकिन कोई अरबी पढ़ाने वाला नहीं था. ऐसे में विनोबा ने भरपूर कोशिश से अरबी सीखी. उसके उच्चारण के लिए रोज रेडियो प्रसारण सुने. लेकिन गांधी स्वभावत: हर बात पक्की कर लेते थे सो विनोबा के पढ़ाना शुरू करने से पहले विनोबा की अरबी की जांच के लिए गांधी ने मौलाना अबुल कलाम आजाद को बुलाया. अरबी की परीक्षा लेने के बाद मौलाना आजाद ने गांधी से कहा- ‘बापू, आपका विनोबा तो हाफिज (धार्मिक मुस्लिम) हो गया है.’

सर्वोदय का मंत्र और भूदान की शुरुआत

गांधी के जाने के बाद विनोबा को लोग उनका सच्चा उत्तराधिकारी मानते थे. ऐसे में उन्होंने सभी का कल्याण यानी ‘सर्वोदय’ का नया मंत्र दिया. सर्वोदय के संकल्प को साधने के लिए ‘सर्व-सेवा-संघ’ नामक संगठन की स्थापना की गई. गांधी जी के सपनों को कार्यरूप देने के लिए जितने भी कार्यकर्ता और संगठन उन दिनों देशभर में कार्यरत थे, उन सबका ‘सर्व-सेवा-संघ’ के अंतर्गत विलय कर दिया गया. इसी बीच तेलंगाना में वाम-चरमपंथी हिंसा शुरू हो चुकी थी. विनोबा ने वहां जाने का निश्चय किया.

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तेलंगाना के हिंसारत इलाके में 15 अप्रैल, 1951 को विनोबा ने अपनी पदयात्रा शुरू की. पहले हैदराबाद आए और वहां जेल में बंद वाम-चरमपंथियों से मिले. इनसे विनोबा ने हिंसा और अहिंसा से लेकर, जेल के जीवन तक कई बातें कीं. पदयात्रा करते हुए 18 अप्रैल की सुबह विनोबा नलगोंडा जिले के पोचमपल्ली गांव पहुंचे. यह कम्युनिस्ट चरमपंथियों का गढ़ माना जाता था. गांव में चार खून हो चुके थे. आस-पास के गांवों को मिलाकर दो साल के भीतर इस इलाके में 22 हत्याएं हो चुकी थीं.

विनोबा गांव में पहले हरिजनों की बस्ती में पहुंचे. हरिजनों की गिरी हालत देखी. हरिजनों ने उनसे कहा- ‘हम बहुत गरीब हैं, बेकार हैं. आप हमें थोड़ी जमीन दिलाइये. उस पर मेहनत करके हम अपना पेट भर सकेंगे.’ विनोबा ने उनसे पूछा- ‘कितनी जमीन चाहिए?’ हरिजनों ने कहा- ‘यहां हमारे 40 परिवार हैं. हमें 80 एकड़ जमीन भी मिल जाए, तो बहुत हो.’

विनोबा बोले- ‘सरकार से बात करके आपको जमीन दिलाने की कोशिश करूंगा.’ लेकिन विनोबा जानते थे वो सरकार से शायद ही कोई मदद मांग पाएंगे. सरकारों के काम करने का रवैया उन्हें मालूम था. और एक बार नेहरू उन्हें निराश कर चुके थे.

ऐसे में उन्हें एक बात सूझी. गांव के जो थोड़े लोग उनके सामने खड़े थे, उनसे उन्होंने पूछा- ‘क्या आप में से कोई ऐसे हैं, जो इन हरिजन भाइयों की मदद कर सकें?' इस पर रामचन्द्र रेड्डी नाम के एक सज्जन विनोबा से बोले, 'कृपा कर मेरी 100 एकड़ जमीन का दान आप स्वीकार कीजिए.’ विनोबा की आंखों से आंसू की धारा बह चली. सुननेवाले अपने कानों पर विश्वास नहीं कर पाए. रामचन्द्र रेड्डी ने तुरंत ही लिखकर दिया कि मैं अमुक गांव की अमुक जमीन हरिजनों को दान में देता हूं.

27 जून, 1951 को जब विनोबा अपने पवनार आश्रम (महाराष्ट्र) वापस पहुंचे तो इन 70 दिनों में उन्हें कुल 12 हज़ार एकड़ जमीन भूदान में मिल चुकी थी. इसके बाद करीब दो दशकों तक विनोबा ने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, असम से लेकर गुजरात तक हजारों किमी देशभर में पैदल यात्राएं कीं. और इस दौरान 42 लाख एकड़ जमीन उन्हें भूदान में मिली. इसमें से 15 लाख तो तत्काल ही भूमिहीनों में बांट भी दी गई.

इस दौरान कई लोगों ने आलोचना की कि लोग केवल बंजर, अनुपजाऊ या पथरीली जमीनें ही दान कर रहे हैं. किसी ने कहा कि लोग कम्युनिस्ट-चरमपंथियों के डर से जमीन दान कर रहे हैं. कुछ वामपंथियों ने इसे सर्वहारा क्रांति को नुकसान पहुंचाने वाला कदम बताया. पर विनोबा भूदान में पूरे उत्साह से जुटे रहे.

The Prime Minister Shri Jawaharlal Nehru's Acharya Vinoba Bhave and others at the Kurukshetra Refugees Camp which they visited in April. 1948.

भूदान से ग्रामदान

विनोबा 24 मई, 1952 को उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मंगरोठ गांव पहुंचे. जहां लोगों ने विनोबा को पूरे गांव की ही जमीन कर दी. मंगरोठ गांव के लोगों ने कहा कि हमारा गांव अब एक परिवार बन गया है, इसलिए पूरे गांव का लगान ग्रामसभा एक साथ जमा कर देगी. लेकिन राजस्व विभाग के अधिकारी ने कहा, सरकारी काम ऐसे नहीं होता. इस तरह लगान की इकट्ठा वसूली करने का हमें कोई अधिकार नहीं है.' उन दिनों गोविंद वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. बात उनके पास पहुंची तो उन्होंने फौरन हुक्म जारी किया कि पूरे गांव का लगान इकट्ठा वसूल कर लिया जाए.

ग्रामदान के कॉन्सेप्ट ने जेपी जैसे समाजवादी को भी विनोबा का भक्त बना दिया और जेपी ने इसके लिए अपने 'जीवनदान' की घोषणा कर दी. 1969 तक देशभर में लगभग सवा लाख ग्रामदानी गांव बन चुके थे. इस आंदोलन का नारा था- ‘सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालिकी’. उस समय के दुनिया के सबसे प्रसिद्ध लेखकों में से एक अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर ने कहा था- ‘ग्रामदान पूरब की ओर से आनेवाला सबसे अधिक रचनात्मक विचार है.’

इसी ग्रामदान के प्रति अपना जीवनदान देने वाले जेपी ने एक अनोखा विचार रखा और वह था ‘उद्योग-दान’ का. पूंजीवादी श्रम शोषण का बहुत बड़ा समाधान इसमें छिपा था. विनोबा ने इसे ग्रामदान का ही एक हिस्सा बताते हुए एक सम्मेलन में कहा था- ‘ग्रामदान आन्दोलन का एक उद्देश्य यह भी है कि मिलों और कारखानों के मालिक और व्यापारी और उद्योगपति आदि लोग समाज की साझेदारी के विचार को कबूल करें.

हर सुधार में सरकार की जरूरत नहीं होती

विनोबा हर काम के लिए सरकार पर निर्भरता नहीं चाहते थे. वो काफी सही भी थे क्योंकि आज भी भूदान आंदोलन में मिली जमीनों में से 10 लाख एकड़ जमीन आज भी बिना बंटे ही सरकारी राजस्व विभाग की फाइलों में धूल फांक रही है.

विनोबा भी समझ रहे थे, ऐसा होना तय है. शायद इसलिए उन्होंने 1957 में केरल यात्रा के दौरान लोगों से कहा- ‘मुझे दान-पत्र नहीं, प्राप्ति पत्र दीजिए. आप अपनी जो जमीन भूदान में देना चाहते हैं, उसे आप ही बांट दीजिए, और जिसे आप बांटें, कागज पर उसका हस्ताक्षर और साक्षी का हस्ताक्षर प्राप्त कर लीजिए. यही प्राप्ति पत्र होगा. नहीं तो जमीन यों ही पड़ी रह जाएगी.’

क्या वाकई विनोबा ने आपातकाल का समर्थन किया था?

विनोबा आध्यात्मिक प्रगति के लिए तमाम प्रयोग किया करते थे. 25 दिसंबर, 1974 को इसी क्रम में उन्होंने एक वर्ष के लिए मौन व्रत लिया था. यानि आपातकाल लगने से छ: माह पूर्व ही. ऐसे में जब देश में सत्ता की प्रतिक्रियावादी राजनीति जम रही थी तो विनोबा आध्यात्मिक प्रगति का रास्ता खोज रहे थे.

इसका उन्हें कोई दोष देना उचित नहीं क्योंकि विनोबा मूलतः एक संत थे और अपना नैसर्गिक जीवन जी रहे थे. विनोबा राजनीति से बचकर ही रहते थे. खुद वो किसी चुनाव में वोट डालने नहीं गए. निष्पक्ष विनोबा का स्वभाव कैसा था? इससे पता चलता है कि भूदान आंदोलन के दौरान छोटे से छोटे मदरसे तक उनके रात्रि-विश्राम और प्रवचन के लिए बढ़-चढ़ कर प्रबंध करते थे.

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ऐसे में आपातकाल के दौरान ही केंद्र सरकार के एक विश्वसनीय नेता वसंत साठे (जो बाद में सूचना और प्रसारण मंत्री भी बने) पवनार स्थित विनोबा के आश्रम ब्रह्म विद्या मंदिर पहुंचे. विनोबा मौन थे, और उन्होंने अपना मौन नहीं तोड़ा और इशारों में बातचीत के दौरान अपने पास रखे ग्रंथ महाभारत के उस अध्याय का शीर्षक साठे को दिखाया जिसमें लिखा था- ‘अनुशासन पर्व’.

साठे यही बात ले उड़े. जाने उन्होंने प्रोपेगैंडा को मजबूत करने के लिए इसका सोच-समझ कर प्रयोग किया या आध्यात्मिक दृष्टि न होने के चलते? पर जो भी हो साठे ने आकाशवाणी, दूरदर्शन और अखबारों का खूब इस्तेमाल करते हुए इसे बार-बार प्रचारित किया कि विनोबा ने आपातकाल को ‘अनुशासन-पर्व’ यानि सरकार की दृष्टि में देश को ‘अनुशासन सिखाने का समय’ करार दिया.

यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने देश में जगह-जगह दीवारों पर विनोबा के नाम से बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया- आपातकाल ‘अनुशासन-पर्व’ है. भोले पत्रकारों, प्रतिक्रिया की आग में जल रहे आंदोलनकारियों और यहां तक कि ज्यादातर सर्वोदय कार्यकर्ताओं ने भी साठे के इस मूर्खतापूर्ण बयान को सच मान लिया. इसे बार-बार दुहराया गया और जम कर दुरुपयोग किया गया. आने वाली कई पीढ़ियां आज तक इसे ही सत्य मानती रही हैं.

लोगों ने सच्चे संत की बातों को 'डैमेज कंट्रोल' माना

बाद में जब विनोबा ने ठीक एक साल बाद 25 दिसंबर, 1975 को मौन तोड़ा तो किसी के पूछने पर उन्होंने इस प्रकरण की सच्चाई बताई. पर मीडिया, आंदोलनकारियों और शासन तीनों ने ही इसे 'डैमेज कंट्रोल' का प्रयास माना. जो बेहद सतही और गिरी हुई बात थी. विनोबा ने जो कहा वह अक्षरशः इस प्रकार है -

‘अनुशासन-पर्व’ शब्द महाभारत का है. परंतु उसके पहले वह उपनिषद् में आया है. प्राचीन काल का रिवाज था. विद्यार्थी आचार्य के पास रह कर बारह साल विद्याभ्यास करता था. विद्याभ्यास पूरा कर जब वह घर जाने के लिए निकलता था तब आचार्य अंतिम उपदेश देते थे. उसका जिक्र उपनिषद् में आया है- एतत् अनुशासनम्, एवं उपासित्व्यम् – यानि इस अनुशासन पर आपको जिंदगीभर चलना है....’

विनोबा का कहना था, ‘अनुशासन का अर्थ है – आचार्यों का अनुशासन! ऐसे निर्भय, निर्वैर, निष्पक्ष आचार्य जो मार्गदर्शन देंगे उसका, उनके अनुशासन का विरोध अगर शासन करेगा तो उसके सामने सत्याग्रह करने का प्रसंग आयेगा’

‘आचार्य होते हैं, जिनका वर्णन मैंने किया है गुरु नानक की भाषा में – निर्भय, निर्वैर, और उसमें मैंने जोड़ दिया है निष्पक्ष! और जो कभी अशांत होते नहीं, जिनके मन में क्षोभ कभी नहीं होता. हर बात में शांति से सोचते हैं और जितना सर्वसम्मत होता है विचार, उतना लोगों के सामने रखते हैं.

उस मार्गदर्शन में लोग अगर चलेंगे, तो लोगों का भला होगा और दुनिया में शांति रहेगी. यह अनुशासन का अर्थ है – आचार्यों का अनुशासन! ऐसे निर्भय, निर्वैर, निष्पक्ष आचार्य जो मार्गदर्शन देंगे उसका, उनके अनुशासन का विरोध अगर शासन करेगा तो उसके सामने सत्याग्रह करने का प्रसंग आएगा. लेकिन मेरा पूरा विश्वास है भारत का शासन ऐसा कोई काम नहीं करेगा, जो आचार्यों के अनुशासन के खिलाफ होगा.’

यानि की पूरी बात जानकार पता चलता है कि विनोबा ने साठे से या तो अपने मूल्यों के बारे में कहना चाह रहे थे या फिर इशारों-इशारों में जयप्रकाश नारायण का समर्थन कर रहे थे. और इसी प्रयास में बुरी तरह से प्रोपेगेंडा और राजनीति का शिकार हुए.

आज के मूल्यहीन होते समाज में विनोबा के विचार शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना एक प्राथमिकता होनी चाहिए. फिर चाहे कितने भी गलतफहमियां हों पर जब आप विनोबा के भूदान आंदोलन के जरिए लाभ पाए गरीब किसानों से बात करें तब पता चलता है कि विनोबा आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही स्तरों पर पूर्णत: सफल रहे.

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